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हीरा उद्योग में फैले भ्रम को दूर करने की सरकारी कवायद

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वैश्विक बाजार में मांग की कमी और रूस पर जी 7 देशों के प्रतिबंध के कारण निर्यात और आयात दोनों में गिरावट आयी है।

Last Updated- December 06, 2024 | 7:23 PM IST
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देश का हीरा उद्योग पिछले कुछ सालों से घरेलू और वैश्विक बाजार में चुनौतियों का सामना कर रहा है। वैश्विक बाजार में मांग की कमी और रूस पर जी 7 देशों के प्रतिबंध के कारण निर्यात और आयात दोनों में गिरावट आयी है। जबकि घरेलू बाजार में भ्रामक जानकारी और नकली हीरों के कारण ग्राहक की दिलचस्पी घटी है। हीरा उद्योग में स्पष्टता लाने के लिए सरकार की तरफ से एक मसौदा तैयार किया जा रहा है जिसका उद्योग जगत ने स्वागत किया है।

हीरा उद्योग बुरे दौर से गुजर रहा है। इस सच्चाई को सरकार भी स्वीकार कर रही है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने राज्यसभा में जानकारी देते हुए बताया कि हीरा क्षेत्र पिछले तीन साल से प्रमुख निर्यात गंतव्यों में मांग में कमी और रूसी मूल के हीरों पर जी 7 प्रतिबंधों जैसे आपूर्ति संबंधी वजहों के कारण चुनौतियों का सामना कर रहा है। वित्त वर्ष 2023-24 में हीरे का निर्यात घटकर 18.37 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया जो 2021-22 में 25.48 अरब अमेरिकी डॉलर था। पिछले वित्त वर्ष में आयात भी घटकर 23 अरब अमेरिकी डॉलर रह गया, जबकि 2021-22 में यह 28.86 अरब अमेरिकी डॉलर था। गोयल ने बताया कि अक्टूबर 2020 के नेशनल काउंसिल ऑफ एप्लाइड इकोनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर) रत्न और आभूषण अध्ययन के अनुसार, हीरा उद्योग में लगभग 18,036 कंपनियां और 8,19,926 कर्मचारी हैं।

हीरा उद्योग में टर्मिनोलॉजी का कोई तय मानक न होने और पर्याप्त डिस्क्लेमर न होने के कारण भ्रम की स्थिति बन जाती है। विशेष रूप से प्राकृतिक एवं प्रयोगशाला में निर्मित हीरों के बीच के फर्क को लेकर असमंजस देखने को मिलता है। हीरा उद्योग में उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा के लिए व्यापक दिशानिर्देशों का मसौदा तैयार करने के उद्देश्य से हाल ही में सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी (सीसीपीए) ने संबंधित पक्षों से विमर्श किया था। इसका उद्देश्य भ्रम दूर करना, स्पष्ट टर्मिनोलॉजी बनाना और मार्केटिंग में नैतिकता को बढ़ावा देना है।

भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) की व्यवस्था है कि प्राकृतिक हीरे के लिए सिर्फ डायमंड शब्द का प्रयोग किया जाना चाहिए। इसके अलावा अन्य सभी के हीरे के मामले में उसके साथ उसके बनने की प्रक्रिया के आधार पर सिंथेटिक, कल्चर्ड या अन्य उपयुक्त शब्दों का प्रयोग होना चाहिए। प्रस्तावित दिशानिर्देशों में सभी हीरों के लिए लेबल एवं प्रमाणीकरण पर जोर दिया गया है। साथ ही प्रयोगशाला में बनने वाले हीरों के लिए नैचुरल या जेनुइन जैसे भ्रामक शब्दों के प्रयोग को रोकने की बात कही गई है। इसमें हीरा जांचने वाली प्रयोगशालाओं के मानकीकरण एवं नियमन के लिए एक्रेडिटेशन सिस्टम लाने का सुझाव भी दिया गया है।

हीरा उद्योग में फैले भ्रम को दूर करने के लिए सरकार की तरफ से तैयार किये गए मसौदे का उद्योग जगत ने स्वागत किया है। नेचुरल डायमंड काउंसिल की प्रबंध निदेशक (इंडिया एंड मिडिल ईस्ट) रिचा सिंह ने कहा कि बढ़ती अपारदर्शिता और भ्रामक टर्मिनोलॉजी को देखते हुए हम पिछले डेढ़ साल से जीजेईपीसी के साथ मिलकर काम कर रहे हैं और इस क्षेत्र में ज्यादा पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। सभी हीरों को प्रमाणित करने और उन पर लेबल लगाने के सेंट्रल कंज्यूमर प्रोटेक्शन अथॉरिटी के प्रस्ताव को हमारा पूरा समर्थन है। इससे गलत जानकारियों पर लगाम लगेगी और प्राकृतिक हीरे एवं अन्य वैकल्पिक हीरों के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकेगा।

प्राकृतिक हीरों का हमेशा से गहरा सांस्कृतिक महत्व रहा है। हीरे समृद्धि के प्रतीक होते हैं। ग्राहकों को विश्वास बना रहे इसके लिए स्पष्ट मानकों का होना जरूरी है। वामन हरि पेठे ज्वेलर्स के आशीष पेठे ने कहा कि हीरा उद्योग के लिए स्पष्ट दिशा निर्देश लाने के सीसीपीए का प्रस्ताव उचित कदम है। मौजूदा हालात को देखते हुए ऐसे कदम बहुत जरूरी हैं। इन दिशानिर्देशों से न केवल पारदर्शिता आएगी बल्कि सभी तरह के भ्रम भी दूर होंगे और उपभोक्ता सही विकल्प चुन सकेंगे, क्योंकि वह जो खरीदेंगे, वह पूरी तरह से प्रमाणित और गुणवत्तापूर्ण होगा।इस कदम से उद्योग से जुड़ी कई लोगों की चिंताएं दूर होंगी और ज्यादा पारदर्शी हीरा उद्योग का आधार तैयार होगा। इस प्रस्ताव को लागू करने से हम प्राकृतिक हीरे की विरासत का उत्सव हमेशा मनाते रह सकेंगे।

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First Published - December 6, 2024 | 7:23 PM IST

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