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IBC में बड़ा सुधार: NCLAT को 3 महीने में निपटाने होंगे केस, प्रवर समिति की सभी शर्तें मंजूर

सरकार ने आईबीसी विधेयक में प्रवर समिति के सुझावों को शामिल करते हुए एनसीएलएटी के लिए तीन महीने की समय-सीमा और सीमा-पार दिवाला जैसे बड़े सुधार लागू किए हैं

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रुचिका चित्रवंशी   
Last Updated- March 29, 2026 | 10:45 PM IST

सरकार ने पिछले सप्ताह संसद में पेश दिवाला और ऋणशोधन अक्षमता संहिता (आईबीसी) विधेयक में प्रवर समिति की सभी सिफारिशों को स्वीकार कर लिया है। एक शीर्ष सरकारी अधिकारी ने यह जानकारी दी।  उन्होंने बताया कि कॉर्पोरेट कार्य मंत्रालय ने प्रवर संसदीय समिति द्वारा सुझाए गए सभी सुझावों को शामिल कर लिया है, जिसमें राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीली न्यायाधिकरण (एनसीएलएटी) के लिए समय-सीमा निर्धारित करना भी शामिल है। इसके प्रमुख सुधारों की राह प्रशस्त होगी।

आईबीसी विधेयक में समूह और सीमा-पार दिवाला तथा बड़े कॉरपोरेशंस के लिए प्रीपैकेज्ड दिवाला सहित प्रमुख सुधारों के साथ संहिता के एक पूर्ण पुनर्गठन प्रस्ताव किया गया है। इसने एक नई धारा जोड़कर महत्त्वपूर्ण सुधार किए हैं, जो दिवाला समाधान प्रक्रिया के तहत ऋणदाताओं को व्यक्तिगत या कॉर्पोरेट गारंटर की संपत्तियों को हस्तांतरित करने की अनुमति देता है। 

संसद में 16 दिसंबर, 2025 को पेश की गई रिपोर्ट में भाजपा सांसद बैजयंत पांडा की अध्यक्षता वाली समिति ने कहा है कि संशोधन विधेयक में एनसीएलएटी के लिए कोई विशेष वैधानिक समय-सीमा पेश नहीं की गई है, और अपीली न्यायाधिकरण के लिए एक स्पष्ट वैधानिक समय-सीमा दिए जाने का सुझाव दिया था। समिति ने कहा है कि विधेयक में बदलाव कर एक नई धारा शामिल की जानी चाहिए। इसने कहा, ‘राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीली न्यायाधिकरण आवेदन मिलने की तारीख से 3 महीने के भीतर अपील निपटाएगा।’

यह विधेयक शुक्रवार को लोकसभा में पारित होने और आगे विचार के लिए पेश किया गया। 

अधिकारी ने कहा, ‘संहिता में पारदर्शिता बढ़ाने के लिए कुछ अतिरिक्त उपायों के साथ प्रवर समिति के सुझावों को भी शामिल किया गया है।’ प्रवर समिति ने अपनी रिपोर्ट में सरकार से कहा है कि स्पष्ट विधायी मार्गदर्शन प्रदान करने के लिए सीमा-पार दिवाला ढांचे के मूल सिद्धांतों को सीधे संहिता के भीतर संहिताबद्ध किया जाए और भारत के अद्वितीय संस्थागत वातावरण के अनुरूप समूह दिवाला ढांचे को तैयार किया जाए।

समिति ने आईबीसी के कुछ प्रावधानों को अपराध की श्रेणी से बाहर करने, कम मतदान सीमा के साथ प्रभावी और सुलभ क्रेडिटर इनीशिएटेड इंसॉल्वेंसी रिजॉल्यूशन प्रॉसेस (सीआईआईआरपी) सुनिश्चित करने सहित अन्य सिफारिशें भी की हैं। इन सुझावों को एमसीए द्वारा संशोधित विधेयक में शामिल किया गया है।

इस बहुप्रतीक्षित विधेयक पर 2023 से चर्चा हो रही है। इसमें राज्य या केंद्र सरकारों द्वारा उठाए गए दावों के संबंध में एक महत्त्वपूर्ण स्पष्टीकरण लाया है, जिसमें कहा गया है कि ऐसे दावों के लिए पक्षों के बीच केवल तभी संविदात्मक समझौता होने पर उन्हें सुरक्षित लेनदार माना जाएगा और आईबीसी में स्वतः उच्च प्राथमिकता नहीं मिलेगी। 

First Published : March 29, 2026 | 10:44 PM IST