उद्योग

खाड़ी युद्ध की मार: भारत का 20% धातु स्क्रैप आयात ठप, रिसाइकलिंग उद्योग की बढ़ी मुश्किलें

पश्चिम एशिया युद्ध के कारण भारत का 20% धातु स्क्रैप आयात बाधित हुआ है। माल ढुलाई और बीमा लागत बढ़ने से एल्यूमीनियम और अन्य धातुओं की कीमतें बढ़ गई हैं

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साकेत कुमार   
Last Updated- March 27, 2026 | 10:47 PM IST

पश्चिम एशिया में चल रहे संघर्ष का भारत के धातु स्क्रैप आयात पर भी गहरा असर पड़ा है। धातु स्क्रैप आयात का लगभग पांचवां हिस्सा इस युद्ध के कारण बाधित हो गया है। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध को चार सप्ताह हो गए हैं। इस संकट की वजह से जेबेल अली और अबू धाबी जैसे प्रमुख खाड़ी बंदरगाहों के बंद होने के बाद देश में रिसाइकलिंग उद्योग की लागत बढ़ गई है, क्योंकि माल ढुलाई दरों में तेज उछाल आया है। बीमा संबंधी बाधाएं अलग से खड़ी हो गईं और आपूर्ति-श्रृंखला भी गड़बड़ा गई है।

मटेरियल रीसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के प्रतिनिधियों और उद्योग जगत के अधिकारियों ने बिजनेस स्टैंडर्ड को बताया किपूरे खाड़ी क्षेत्र में व्यवधान पैदा होने से माल की आवाजाही रुक गई है और निर्यातकों को टर्मिनलों पर पहले से ही खड़े कंटेनरों को वापस लेना पड़ा है। एसोसिएशन के वरिष्ठ उपाध्यक्ष और मेटको वेंचर्स एलएलपी के प्रबंध भागीदार, धवल शाह ने कहा, ‘पश्चिम एशिया से हमारा लगभग 20 से 22 प्रतिशत आयात बाधित हुआ है। इसका मतलब है कि लगभग पांच लाख टन सामग्री फंस गई है।’

मटेरियल रीसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के देशभर में 1,800 पंजीकृत सदस्य हैं, जिनमें अधिकांश क्षेत्रीय व्यापार संघ शामिल हैं। एसोसिएशन का दावा है कि वह रिसाइकलिंग उद्योग में 250,000 श्रमिकों को रोजगार देने वाले 25,000 लघु और मध्यम उद्यमों का प्रतिनिधित्व करता है।

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शाह ने यह भी कहा कि पश्चिम एशिया न केवल एक आपूर्तिकर्ता है, बल्कि अमेरिका, यूरोप और एशिया के बीच व्यापार प्रवाह को जोड़ने वाला महत्त्वपूर्ण पारगमन (ट्रांस-शिपमेंट) हब भी है। यही वजह है कि युद्ध का असर वैश्विक स्तर पर पड़ रहा है। धवल शाह ने बताया कि माल ढुलाई की लागत में भी तेज उछाल आया है, क्योंकि जहाजों को संघर्ष प्रभावित मार्गों के बजाय दूर से गुजारा जा रहा है। इसका सीधा असर क्षमता पर पड़ा है और माल ढुलाई लागत एवं समय दोनों बढ़ गया है।

जो माल ढुलाई दर संघर्ष से पहले प्रति कंटेनर 200-300 डॉलर पर थी, वह बढ़कर अब 2,000 डॉलर तक पहुंच गई है, जबकि यूरोप के लिए निर्यात शिपमेंट की लागत लगभग 1,200 डॉलर से बढ़कर लगभग 3,000 डॉलर प्रति कंटेनर हो गई है। उन्होंने यह भी कहा कि जहाजों को केप ऑफ गुड होप जैसे लंबे मार्गों से गुजारा जा रहा है। इससे न केवल ईंधन लागत बढ़ रही है, बल्कि अधिक समय भी लग रहा है।

मटेरियल रीसाइक्लिंग एसोसिएशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष संजय मेहता ने कहा कि कुछ चुनिंदा निर्यातकों की वजह से मूल्य निर्धारण का दबाव और बढ़ गया है। वैश्विक कंटेनर यातायात के 65-70 प्रतिशत पर इनका नियंत्रण है।

मेहता ने कहा कि वैश्विक समुद्री बीमाकर्ताओं ने कुछ मार्गों से गुजरने वाले जहाजों पर कवरेज देना बंद कर दिया है। पहले से जिनके साथ करार था उनसे वे यह कवरेज वापस ले रहे हैं। उन्होंने कहा कि लगभग 8 से 10 वैश्विक कंपनियों द्वारा नियंत्रित समुद्री बीमा बाजार ने सलाह जारी करते हुए स्पष्ट कह दिया है कि विशिष्ट समुद्री मार्गों से गुजरने वाले माल को कवर नहीं किया जा सकता है। मेहता ने कहा, ‘बीमा के बिना सामग्री नहीं ले जाई जा सकती।’ इससे परेशानी और बढ़ गई है और उन्होंने कहा कि इस उद्योग से जुड़े लोगों ने सरकार से हस्तक्षेप की मांग की है।

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मेहता ने कहा कि इस व्यवधान के कारण स्क्रैप की कीमतों में 25 से 30 डॉलर प्रति टन या लगभग 6 से 7 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उन्होंने कहा कि सबसे ज्यादा एल्यूमीनियम प्रभावित हुआ है, जिसकी कीमतों में लगभग 15 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। निर्यातकों को बंदरगाहों से कंटेनरों को वापस लेने और माल रखने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इससे कार्यशील पूंजी फंस गई है और वित्तीय दबाव बढ़ गया है।

First Published : March 27, 2026 | 10:47 PM IST