भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल | फाइल फोटो
भारत ने विश्व व्यापार संगठन (WTO) में इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन पर टैरिफ न लगाने वाले ग्लोबल मोरेटोरियम को दो साल के लिए बढ़ाने पर अपनी सहमति जताई है। हालांकि, अमेरिका इसे स्थायी बनाने की मांग पर अड़ा हुआ है। ये बात कैमरून में चल रही WTO की बैठक से जुड़ी है। पिछले कुछ दिनों से ये मुद्दा काफी गरमा गया था।
भारत के वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने गुरुवार को कैमरून में हुई बैठक में साफ कहा था कि इस मोरेटोरियम को स्थायी रूप से बढ़ाने की अमेरिका की कोशिश पर गंभीरता से फिर से विचार करने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि इसमें सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि इसका असर विकासशील देशों पर पड़ सकता है। लेकिन शुक्रवार देर रात भारत ने WTO सदस्यों को बताया कि वो दो साल के एक्सटेंशन के लिए तैयार है। डिप्लोमैटिक सूत्रों के मुताबिक ये भारत की पोजीशन में पहला बड़ा बदलाव है।
ये मोरेटोरियम करीब तीन दशक से चला आ रहा है। इसमें इलेक्ट्रॉनिक ट्रांसमिशन जैसे डिजिटल डाउनलोड, सॉफ्टवेयर, ऑनलाइन सर्विसेज आदि पर कस्टम ड्यूटी नहीं लगाई जाती। हर बार WTO की मिनिस्टेरियल मीटिंग से पहले इसे अगली मीटिंग तक बढ़ा दिया जाता था। अब ये मार्च में खत्म होने वाला है। अगर इसे नहीं बढ़ाया गया तो कई देश ड्यूटी लगा सकते हैं, जिससे क्रॉस-बॉर्डर डिजिटल ट्रेड पर असर पड़ेगा।
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बिजनेस लीडर्स का कहना है कि इस मोरेटोरियम को बढ़ाना बहुत जरूरी है। इससे अनिश्चितता खत्म होगी और कंपनियां भरोसे के साथ निवेश कर सकेंगी। माइक्रोसॉफ्ट के कस्टम्स एंड ट्रेड अफेयर्स डायरेक्टर जॉन बेस्सेक ने कहा कि डिजिटल इकोनॉमी में अनिश्चितता का मतलब निवेश में हिचकिचाहट है। अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट, ऐपल जैसी बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियां चाहती हैं कि नियम स्थिर रहे, ताकि डिजिटल ट्रेड पर अचानक टैरिफ का बोझ न पड़े।
अमेरिका की तरफ से ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव जैमिसन ग्रीर ने गुरुवार को साफ कर दिया कि वो किसी भी अस्थायी एक्सटेंशन में दिलचस्पी नहीं रखते। उनके अनुसार केवल स्थायी मोरेटोरियम ही अमेरिकी बिजनेस को जरूरी सुरक्षा दे सकता है। वहीं अफ्रीकी, कैरेबियन और पैसिफिक (ACP) ग्रुप ने दो साल के एक्सटेंशन का प्रस्ताव दिया है। कुछ सदस्य पांच से दस साल तक का मध्य मार्ग निकालने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ये भी तय नहीं कि अमेरिका या भारत इसे मानेगा या नहीं।
कई विकासशील देशों का मानना है कि ये मोरेटोरियम उन्हें संभावित टैक्स रेवेन्यू से वंचित रखता है। वे कहते हैं कि इस पैसे से वे अपने देश में विकास के काम कर सकते थे। ट्रांसनेशनल इंस्टीट्यूट की सोफिया स्कासेरा का कहना है कि इस मोरेटोरियम से सभी देशों का डिजिटल इकोनॉमी में विकास नहीं हुआ। बल्कि ये कुछ बड़े खिलाड़ियों को ही फायदा पहुंचा रहा है। उनके अनुसार ये एक सुरक्षित समुद्र जैसा बन गया है जो केवल बड़े जहाजों वाले कुछ देशों की रक्षा कर रहा है।
ये पूरा मुद्दा WTO की प्रासंगिकता की परीक्षा बन गया है। पिछले साल टैरिफ से जुड़ी व्यापार अशांति, मिडिल ईस्ट संघर्ष से शिपिंग और एनर्जी प्राइस में उथल-पुथल के बाद अब ये देखना है कि मंत्री लोग कुछ ठोस फैसला ले पाते हैं या नहीं। नॉर्वे के विदेश मंत्री एस्पेन बार्थ ईडे ने कहा कि कुछ देशों के लिए मोरेटोरियम को काफी समय तक बढ़ाना काफी अहम है। इससे साबित होगा कि WTO अभी भी काम कर रही है और मिनिस्टर्स कुछ डिलीवर कर सकते हैं।
अभी भी अमेरिका और भारत के बीच काफी दूरी बनी हुई है। तीन वरिष्ठ डिप्लोमैट्स के अनुसार दोनों देशों की पोजीशन दूर-दूर हैं। Yaounde में चल रही WTO की इस बैठक में क्या फैसला होता है, ये ग्लोबल डिजिटल ट्रेड के भविष्य पर असर डालेगा।
(रॉयटर्स के इनपुट के साथ)