उद्योग

भारत में 4 साल में 0 से 12 सेमीकंडक्टर प्लांट, अश्विनी वैष्णव ने बताई पूरी रणनीति

धोलेरा में बनने जा रही हाईटेक फैक्ट्री! Micro-LED टेक्नोलॉजी से क्या बदलेगा?

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सुरजीत दास गुप्ता   
Last Updated- May 25, 2026 | 8:50 AM IST

सरकार ने इंडियन सेमीकंडक्टर मिशन (आईएसएम) के तहत निर्धारित लगभग 76,000 करोड़ रुपये में से ज्यादातर रकम का इस्तेमाल कर लिया है। इस बारे में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने सुरजीत दास गुप्ता को एक ईमेल इंटरव्यू में बताया कि इस साल माइक्रो-एलईडी (लाइट एमिशन डायोड) पैनल और माइक्रो चिपों से जुड़ी कई परियोजनाएं शुरू होंगी। संपादित अंश …

अपनी सेमीकंडक्टर नीति के तहत सरकार ने हाल में भारत में माइक्रो-एलईडी तकनीक लाने के लिए एक परियोजना को मंजूरी दी है। देश के लिए यह कितनी महत्त्वपूर्ण है?

गुजरात के धोलेरा में डिस्प्ले फैब को हाल में मिली मंजूरी भारत के डिस्प्ले इकोसिस्टम के लिए एक उल्लेखनीय अवसर है। ग्लोबल डिस्प्ले इंडस्ट्री में ज्योमेट्री का आकार तेजी से घट रहा है – 300 माइक्रोन से घटकर 70 माइक्रोन तक। टीवी और स्मार्टफोन को बड़े पैमाने पर अपनाने के लिए असली अहम मोड़ 50 माइक्रोन है। 50 माइक्रोन पर माइक्रो-एलईडी, एलसीडी (लिक्विड क्रिस्टल डिस्प्ले) और ओएलईडी (ऑर्गेनिक एलईडी) के साथ सीधे प्रतिस्पर्धी बन जाते हैं, चाहे बात यूजर अनुभव की हो या कीमत की।

धोलेरा संयंत्र में मिनी- एलईडी और माइक्रो- एलईडी दोनों ही टेक्नॉलजी का इस्तेमाल किया जाएगा। मिनी- एलईडी के दो चिपों का आकार होगा- 50 माइक्रोन गुणा 100 माइक्रोन, और 75 माइक्रोन गुणा 125 माइक्रोन। माइक्रो- एलईडी चिप का आकार 30 माइक्रोन गुणा 60 माइक्रोन होगा। उम्मीद है कि धोलेरा संयंत्र से पहली माइक्रो- एलईडी स्क्रीन लगभग 22 महीनों में बनकर तैयार हो जाएंगी।

चूंकि शुरुआती निवेश कम है, तो क्या सरकार इसके विस्तार होने पर और अधिक सहायता देने के लिए तैयार है?

माइक्रो-एलईडी आज की टेक्नॉलजी है और भारत के पास इसमें आगे बढ़ने का मौका है। हम चरणबद्ध तरीका अपना रहे हैं- टेक्नॉलजी को साबित करना, आपूर्ति श्रृंखला बनाना, वर्कफोर्स को ट्रेनिंग देना और फिर इसका विस्तार करना। हम खुद को एक भरोसेमंद और दीर्घावधि पार्टनर के तौर पर स्थापित कर रहे हैं। इस लक्ष्य के साथ हम 2035 तक सेमीकंडक्टर निर्माण करने वाले दुनिया के शीर्ष देशों में शामिल होने की राह पर हैं। डिस्प्ले निर्माण इस सफर का एक अहम हिस्सा है।

क्या भारत इस तकनीक को स्वदेशी रूप से विकसित कर सकता है या इसके लिए ल्यूमेंस जैसी अन्य कंपनियों के साथ गठजोड़ जरूरी होगा?

धोलेरा संयंत्र के लिए क्रिस्टल मैट्रिक्स ने तकनीक के हस्तांतरण हेतु ल्यूमेंस के साथ गठजोड़ किया है। क्रिस्टल मैट्रिक्स इस तकनीक को विकसित करने के लिए शोध एवं विकास (आरऐंडडी) में निवेश करेगी, जिसकी शुरुआत उत्पादन शुरू होने के साथ ही हो जाएगी।

आईएसएम के लिए आवंटित लगभग 76,000 करोड़ रुपये में से अधिकांश राशि के उपयोग में आ जाने के बाद जब सभी परियोजनाएं पूरी तरह से शुरू हो जाएंगी, तब भारत किस तरह की फैब/ओएसएटी (आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली और टेस्ट) क्षमता हासिल कर पाएगा?

आईएसएम शुरू करने के बाद से सिर्फ चार साल में भारत में सेमीकंडक्टर संयंत्रों की संख्या शून्य से बढ़कर अब 12 हो गई है। दो संयंत्र (माइक्रोन और केन्स के) वाणिज्यिक उत्पादन कर रहे हैं। तीसरा संयंत्र जुलाई में और चौथा इस साल के आखिर तक उत्पादन शुरू कर देगा। भारत का पहला फैब 2028 तक धोलेरा में बनकर तैयार हो जाएगा।

जब दूसरे देश भारत के मुकाबले कई गुना ज्यादा सब्सिडी दे रहे हैं, तो क्या सेमीकॉन 2.0 के शुरू होने के बाद भी हम नुकसान वाली स्थिति में रहेंगे?

हमारे देश की कई प्रतिस्पर्धी प्राथमिकताएं हैं। हमने स्पष्ट कर दिया है कि यह 20 साल का सफर है। हम धैर्य वाले निवेश पर दांव लगा रहे हैं, न कि किसी छोटी अवधि की सब्सिडी की दौड़ में हैं।

क्या हम सर्वर निर्माण को बढ़ावा दे रहे हैं, जो डेटा केंद्रों का अहम हिस्सा हैं? इस दिशा में अब तक कितनी प्रगति हुई है?

डेल और एचपीई ने वैश्विक मानकों के अनुरूप ‘मेड इन इंडिया’ सर्वर का उत्पादन बढ़ा दिया है। नेटवेब और वीवीडीएन जैसी हमारी घरेलू कंपनियां इस क्षेत्र में शुरुआती घरेलू चैंपियन के तौर पर उभर रही हैं।

First Published : May 25, 2026 | 8:50 AM IST