लंबे समय से दबाव झेल रहे माइक्रोफाइनेंस सेक्टर के लिए अब धीरे-धीरे राहत के संकेत दिखाई देने लगे हैं। ब्रोकरेज फर्म एंटीक स्टॉक ब्रोकिंग की रिपोर्ट के मुताबिक NBFC-MFI कंपनियों के कारोबार से जुड़े आंकड़े अब धीरे-धीरे बेहतर होते दिख रहे हैं। माइक्रोफाइनेंस इंडस्ट्री नेटवर्क (MFIN) के आंकड़ों के अनुसार वित्त वर्ष 2026 की तीसरी तिमाही में लोन डिस्बर्समेंट सालाना आधार पर 33 प्रतिशत और तिमाही आधार पर 11 प्रतिशत बढ़ा। इसके चलते सेक्टर का कुल एसेट अंडर मैनेजमेंट (AUM) तिमाही आधार पर 2 प्रतिशत बढ़कर लगभग 1.34 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया। खास बात यह है कि लगातार छह तिमाहियों की गिरावट के बाद पहली बार बढ़ोतरी दर्ज की गई है, जिससे यह संकेत मिलता है कि सेक्टर धीरे-धीरे कमजोरी के दौर से बाहर निकल सकता है।
रिपोर्ट के मुताबिक कर्ज चुकाने में होने वाली शुरुआती देरी के मामलों में भी कुछ सुधार देखने को मिला है। PAR 31-60 और PAR 61-90 जैसे शुरुआती डिफॉल्ट संकेतक तिमाही आधार पर करीब 30 बेसिस पॉइंट घटे हैं, जबकि PAR 91-180 में करीब 110 बेसिस पॉइंट का सुधार हुआ है। इससे संकेत मिलता है कि लंबे समय से दबाव झेल रही माइक्रोफाइनेंस कंपनियों की वित्तीय स्थिति अब धीरे-धीरे स्थिर होने लगी है।
हालांकि सेक्टर की स्थिति अभी पूरी तरह बेहतर नहीं हुई है। रिपोर्ट के अनुसार माइक्रोफाइनेंस कंपनियों के ग्राहकों की संख्या अभी भी घट रही है। तीसरी तिमाही में ग्राहकों की संख्या तिमाही आधार पर 3 प्रतिशत और सालाना आधार पर 19 प्रतिशत कम हो गई। इसका मतलब है कि AUM में जो बढ़ोतरी हुई है, वह नए ग्राहक बढ़ने की वजह से नहीं, बल्कि हर ग्राहक को दिए जाने वाले लोन की औसत राशि बढ़ने से हुई है।
रिपोर्ट में एक और बड़े जोखिम की ओर ध्यान दिलाया गया है। पहले भी देखा गया है कि राज्य चुनावों के समय माइक्रोफाइनेंस लोन की वसूली पर असर पड़ता है। 2021 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में माइक्रोफाइनेंस लोन की स्थिति काफी बिगड़ गई थी। अब 2026 में इन तीनों राज्यों में फिर चुनाव होने हैं, इसलिए इन इलाकों में कर्ज चुकाने के रुझान पर खास नजर रखी जाएगी।
सेक्टर के सामने एक नई चुनौती बिहार सरकार का प्रस्तावित माइक्रोफाइनेंस बिल है। यह बिल कर्नाटक में 2025 में लाए गए अध्यादेश की तरह है और कुछ मामलों में उससे भी ज्यादा सख्त माना जा रहा है। इसमें कर्ज लेने वालों की सुरक्षा के लिए कई नियम प्रस्तावित किए गए हैं। जैसे सभी लेंडर्स का अनिवार्य रजिस्ट्रेशन, कुल ब्याज को मूल रकम के 100 प्रतिशत तक सीमित करना और एक ग्राहक को अधिकतम दो माइक्रोफाइनेंस कंपनियों से ही लोन लेने की अनुमति देना।
रिपोर्ट के मुताबिक Microfinance कंपनियों के कुल लोन पोर्टफोलियो का करीब 14 प्रतिशत हिस्सा बिहार से आता है, इसलिए अगर यह बिल लागू होता है तो इसका असर पूरे सेक्टर पर पड़ सकता है।
एंटीक की रिपोर्ट के मुताबिक Microfinance Sector में सुधार के शुरुआती संकेत जरूर दिख रहे हैं, लेकिन स्थिति अभी पूरी तरह मजबूत नहीं हुई है। बिहार का नया बिल, 2026 में होने वाले राज्य चुनाव और वैश्विक तनाव के कारण ग्रामीण आय पर पड़ने वाला असर सेक्टर के लिए नई चुनौतियां पैदा कर सकता है। ऐसे में आने वाले समय में माइक्रोफाइनेंस कंपनियां तेजी से लोन बढ़ाने के बजाय वसूली सुधारने और जोखिम कम रखने पर ज्यादा ध्यान दे सकती हैं।