तेल की बढ़ती कीमतों के बीच सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए 27 मार्च से पेट्रोल और डीजल पर 10 रुपये प्रति लीटर एक्साइज ड्यूटी घटा दी है। इस फैसले से आम लोगों को राहत जरूर मिली है, लेकिन इसके पीछे की पूरी कहानी कहीं ज्यादा जटिल है और इसका असर कई स्तर पर दिख रहा है।
इस कटौती से ऑयल मार्केटिंग कंपनियों पर दबाव कुछ कम हुआ है। पहले डीजल पर करीब 81.9 रुपये और पेट्रोल पर 26 रुपये प्रति लीटर का भारी घाटा था। अब यह घटकर 17 से 28 रुपये प्रति लीटर रह गया है। यानी कंपनियों की स्थिति थोड़ी सुधरी है, लेकिन वे अभी भी पूरी तरह फायदे में नहीं पहुंची हैं और उन्हें आगे भी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा।
सरकार ने एक तरफ एक्साइज ड्यूटी घटाई है, तो दूसरी तरफ रिफाइनरी कंपनियों पर विंडफॉल टैक्स फिर से लागू कर दिया है। डीजल पर 21.5 रुपये प्रति लीटर और एयरक्राफ्ट फ्यूल पर 29.5 रुपये प्रति लीटर टैक्स लगाया गया है। हालांकि तेल निकालने वाली अपस्ट्रीम कंपनियों को इस बार टैक्स से बाहर रखा गया है। इससे साफ है कि सरकार संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है।
एक्साइज ड्यूटी में कटौती का सीधा असर सरकार की कमाई पर पड़ा है। अनुमान है कि हर 15 दिन में करीब 7,000 करोड़ रुपये का नुकसान होगा। वहीं विंडफॉल टैक्स से सिर्फ करीब 1,500 करोड़ रुपये की कमाई होने की उम्मीद है। यानी राहत देने की कीमत सरकार को खुद चुकानी पड़ रही है।
विंडफॉल टैक्स लगने से रिफाइनरी कंपनियों के मुनाफे में कुछ कमी आएगी, खासकर डीजल जैसे उत्पादों में। फिर भी मौजूदा हालात में उनकी कमाई अभी भी मजबूत बनी हुई है। खास बात यह है कि रिलायंस इंडस्ट्रीज की एसईजेड रिफाइनरी इस टैक्स के दायरे से बाहर रह सकती है, जिससे उसे फायदा मिल सकता है।
एमके की रिपोर्ट के अनुसार, अगर कंपनियों को पूरी तरह संतुलन में आना है, तो या तो कच्चे तेल की कीमत लगभग 75 डॉलर प्रति बैरल तक आनी होगी या फिर पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 20 रुपये प्रति लीटर से ज्यादा की बढ़ोतरी करनी पड़ेगी। मौजूदा स्थिति में यह दोनों ही आसान नहीं दिखते।
रिपोर्ट में अपस्ट्रीम कंपनियों को लेकर थोड़ी सावधानी बरती गई है, लेकिन उनकी वैल्यूएशन आकर्षक बताई गई है। वहीं रिलायंस जैसी कंपनियां अभी भी मजबूत स्थिति में हैं क्योंकि उनके मार्जिन पहले के मुकाबले बेहतर बने हुए हैं।