प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
वैश्विक फार्मास्युटिकल कंपनियां जीएलपी-1 उपचारों के लिए आपूर्ति श्रृंखला सुनिश्चित करने के लिए चीन और जापान में निवेश तेजी कर रही हैं। दूसरी ओर भारत की मधुमेह से पीड़ित बड़ी आबादी इसे दीर्घावधि वाला प्रमुख बाजार तो बनाती है, लेकिन फिलहाल अधिक मूल्य वाला बाजार नहीं बनाती।
यह अंतर एशिया के मेटाबोलिक दवा बाजार की संरचनात्मक वास्तविकता को उजागर करता है। हालांकि भारत मधुमेह के 10 करोड़ से अधिक रोगियों के साथ बड़ा बाजार है, लेकिन खर्च उठाने की क्षमता और महंगे उपचारों की कम पैठ के कारण व्यावसायिक अवसर सीमित बने हुए हैं। इसके विपरीत चीन और जापान में रोगियों की बड़ी संख्या है, दमदार मूल्य निर्धारण है, वहां नई दवाओं को तेजी से अपनाया जाता है और अधिक विकसित प्रतिपूर्ति प्रणाली है।
बीएनपी पारिबा रिसर्च के मुताबिक भारत का जीएलपी-1 बाजार फिलहाल लगभग 1,000 करोड़ रुपये होने का अनुमान है। यह बीमारी के बड़े बोझ के बावजूद उसके शुरुआती चरण की प्रकृति को भी दिखाता है। इसका इस्तेमाल अभी तक महानगरों में ही हुआ है। इलाज की ज्यादा लागत के कारण इसे अधिक लोग नहीं अपना पा रहे हैं।
सेमाग्लूटाइड का पेटेंट खत्म होने के बाद हाल में कीमतों में गिरावट आई है। फिर भी जीएलपी-1 दवाएं मधुमेह के सामान्य इलाज के मुकाबले काफी महंगी हैं। नवाचार वाले ब्रांडों का महीने के उपचार का खर्च पहले लगभग 8,800 से 16,400 रुपये था। लेकिन जेनेरिक दवाओं के आने से कीमतें तेजी से घटीं और ब्रांड और खुराक के हिसाब से यह लगभग 1,300 से 4,500 रुपये प्रति माह रह गया।
बाजार अनुसंधान क्षेत्र की कंपनी फार्मारैक के आंकड़ों से पता चलता है कि जीएलपी-1 उपचार भारत की एंटी-डायबिटिक श्रेणी को नया आकार देने लगा है। यह प्रीमियमाइजेशन और इलाज में बदलाव के जरिये मूल्य वृद्धि में योगदान दे रहा है। अलबत्ता इसे अपनाने का कारण सामान्य बाजार विस्तार के बजाय स्पेशलिटी का इस्तेमाल है।
इसके उलट मधुमेह के लगभग 14 करोड़ मरीजों वाला चीन और लगभग 1.1 करोड़ मरीज वाला जापान ज्यादा फायदेमंद बाजार हैं। ये अनुमान इंटरनैशनल डायबिटीज फेडरेशन के आंकड़ों पर आधारित हैं। चीन में मधुमेह की दवाओं का बाजार लगभग 15 से 20 अरब डॉलर तक है। दूसरी ओर जापान दुनिया भर में प्रति मरीज सबसे ज्यादा खर्च करने वाले बाजारों में से एक बना हुआ है, जिसे दमदार प्रतिपूर्ति का समर्थन हासिल है।
मरीजों की संख्या और बाजार मूल्य के बीच यह अंतर निवेश संबंधी निर्णयों को आकार दे रहा है। दवा और स्वास्थ्य सेवा के आंकड़ों का विश्लेषण करने वाली ब्रिटेन की फर्म ग्लोबलडेटा के अनुसार दवा कंपनियां भौगोलिक हिसाब से ज्यादा से ज्यादा विनिर्माण नेटवर्क बना रही हैं। इसका मकसद है अधिक मूल्य वाले बाजारों को सेवा देना, नीतिगत दबावों को संभालना और आपूर्ति श्रृंखला के जोखिमों को कम करना। इस रुझान को मौजूदा भू-राजनीतिक उथल-पुथल से और अधिक बढ़ावा मिला है जो लॉजिस्टिक के वैश्विक मार्गों पर असर डाल रही है।
इलाई लिलि इस बदलाव में सबसे आगे है। ग्लोबलडेटा और कंपनी के खुलासों के अनुसार कंपनी अगले 10 साल में चीन में 3 अरब डॉलर के निवेश की योजना बना रही है ताकि वह मुंह से ली जाने वाली ठोस-खुराक वाली दवाओं का स्थानीय स्तर पर विनिर्माण कर सके। इनमें उसकी जीएलपी-1 दवा ओरफोरग्लिपरोन भी शामिल है। वह जापान में अपनी इकाई के विस्तार पर 20 अरब येन का निवेश भी कर रही है।