अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते संघर्ष का असर अब भारत की पेट्रोकेमिकल आपूर्ति श्रृंखला पर गंभीर रूप से दिखने लगा है। इससे पॉलिमर (प्लास्टिक कच्चे माल) की कीमतें रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच गई हैं और ओडिशा सहित कई राज्यों में प्लास्टिक प्रसंस्करण उद्योग लगभग ठप होने की स्थिति में आ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, देशभर में 50 प्रतिशत से अधिक इकाइयों ने उत्पादन बंद कर दिया है।
उद्योग से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, पॉलिप्रॉपलीन (पीपी), हाई डेंसिटी पॉलिएथिलीन (एचडीपीई), लिनियर लो-डेंसिटी पॉलिएथिलीन (एलएलडीपीई), पॉलिविनाइल क्लोराइड (पीवीसी) और पीईटी रेजिन जैसे प्रमुख पॉलिमर की कीमतों में 68 से 78 प्रतिशत तक की भारी बढ़ोतरी हुई है। इसके साथ ही कच्चे माल की उपलब्धता में भी अनिश्चित आ गई है।
उदाहरण के तौर पर, एचडीपीई की कीमत 28 फरवरी को लगभग 91,452 रुपये प्रति टन थी, जो 11 मार्च तक बढ़कर 1,34,452 रुपये हो गई (करीब 68 फीसदी वृद्धि)। इसी तरह एलएलडीपीई 90,952 रुपये से बढ़कर 1,33,952 रुपये, पीवीसी 89,000 रुपये से बढ़कर 1,14,000 रुपये (78 फीसदी वृद्धि) और पीपी 1,00,384 रुपये से बढ़कर 1,46,384 रुपये (69 फीसदी वृद्धि) हो गई।
कीमतों में आई अचानक उछाल और आपूर्ति की अनिश्चितता ने उद्योग को गंभीर संकट में डाल दिया है। भारत में प्लास्टिक प्रसंस्करण क्षेत्र में करीब 50,000 इकाइयां हैं जिनमें से 85 प्रतिशत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योग (एमएसएमई) हैं। यह उद्योग लगभग 50 लाख लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार देता है और करीब 12.5 अरब डॉलर का निर्यात करता है।
जगदंबा पॉलिमर्स लिमिटेड के प्रबंध निदेशक चंद्र प्रकाश भरतिया ने कहा, ‘कुछ ही दिनों में पॉलिमर की 70 प्रतिशत से अधिक कीमतें बढ़ना अभूतपूर्व है। इसके कारण हजारों एमएसएमई इकाइयां उत्पादन जारी नहीं रख पा रही हैं और देशभर में 50 प्रतिशत से अधिक छोटी इकाइयों ने उत्पादन रोक दिया है। कई विनिर्माण कंपनियां पहले से तय आपूर्ति अनुबंधों के कारण बढ़ी लागत ग्राहकों पर नहीं डाल पा रही हैं।’
ओडिशा प्लास्टिक पाइप विनिर्माण संगठन के अध्यक्ष संग्राम दास ने बताया कि राज्य में तीन-चौथाई से अधिक परिचालन इकाइयां उत्पादन बंद कर चुकी हैं क्योंकि कच्चा माल या तो मिल नहीं रहा है या इतनी महंगी कीमत पर मिल रहा है कि उत्पादन करना संभव नहीं है।
हरि प्लास्ट के प्रबंध निदेशक (एमडी) दास ने कहा, ‘उत्पादन अब अव्यवहारिक हो चुका है। अगर हम अपनी इकाई चलाना भी चाहते हैं तब कच्चा माल ही उपलब्ध नहीं है या फिर उसकी कीमत हमारी क्षमता से बाहर है।’ कई सूक्ष्म एवं लघु उद्योगों ने उत्पादन में भारी कटौती कर दी है। जहां पहले कुछ इकाइयां 100 टन प्रति माह उत्पादन करती थीं, अब वह घटकर 20 टन तक रह गया है।
बालासोर में नियो पाइप्स के एमडी शुभेंद्र प्रसाद दास ने कहा, ‘हमारे कारखाने में अब पांच में से केवल एक मशीन चल रही है और रोजाना एक टन से भी कम उत्पादन हो रहा है। कच्चा माल कुछ ही दिनों का बचा है और इसके बाद हमें अपनी इकाई बंद करनी होगी।’ कुछ कंपनियों ने पूरी तरह उत्पादन बंद कर दिया है। भुवनेश्वर की एक कंपनी वैलेंनटिना पाइप्स के प्रबंध निदेशक निकुंज छोत्रे ने बताया, ‘हमने कुछ दिनों से उत्पादन बंद कर दिया है। कीमतों और आपूर्ति को लेकर कोई स्पष्टता नहीं है, ऐसे में उत्पादन जारी रखना घाटे का सौदा है।’
बड़ी कंपनियां भी इससे अछूती नहीं हैं। ओरि प्लास्ट और हरि प्लास्ट जैसी बड़ी इकाइयों में उत्पादन 50 से 70 प्रतिशत तक घट गया है जहां क्रमश: 1200 टन और 650 टन उत्पादन की क्षमता रही है। उद्योग के अनुसार, जहां कच्चे माल की कीमत 70 प्रतिशत तक बढ़ी है, वहीं तैयार उत्पादों की कीमत केवल 10-15 प्रतिशत ही बढ़ाई जा सकी है, जिससे मुनाफा लगभग खत्म हो गया है ऐसे में परिचालन वित्तीय आधार पर व्यवहारिक नहीं रह गया है।
कोलकाता मुख्यालय वाले ओरि प्लास्ट के मुख्य परिचालन अधिकारी (सीओओ) पी के दवे ने कहा, ‘हमने घाटे को कम करने के लिए उत्पादन में कमी करनी शुरू की है। हालांकि हमने उत्पाद की लागत में थोड़ी बढ़ोतरी की है और मांग में भी कमी आई है। हालात बेहद अनिश्चित है।’
प्लास्टिक प्रसंस्करण उद्योग, पैकेजिंग, (कुल खपत का 41 फीसदी) एफएमसीजी, स्वास्थ्य, वाहन, कृषि, बुनियादी ढांचा, उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुओं और औद्योगिक तथा इंजीनियरिंग पुर्जों के लिए अहम आपूर्तिकर्ता है। उद्योग से जुड़े अहम अधिकारियों का कहना है कि अगर यह संकट लंबे समय तक बना रहा तब इसका नकारात्मक असर आपूर्ति श्रृंखला, महंगाई और औद्योगिक उत्पादन पर भी पड़ेगा। भरतिया ने कहा, ‘इस क्षेत्र में अभूतपूर्व दबाव है, बिना तत्काल समर्थन के कई इकाईयां इस चरण में नहीं रह सकती हैं।’
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए ऑल इंडिया प्लास्टिक्स मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एआईपीएमए) ने केंद्र सरकार से तुरंत राहत देने की मांग की है। संगठन ने चेतावनी दी है कि अगर जल्द कदम नहीं उठाए गए तब बड़े पैमाने पर उद्योग बंद हो सकते हैं और बेरोजगारी बढ़ सकती है। एआईपीएमए ने बताया कि 1 मार्च से 11 मार्च के बीच पॉलिमर की कीमतें पांच बार बढ़ाई गईं, जिसका भार एमएसएमई इकाइयां न तो सहन कर पा रही हैं और न ही ग्राहकों पर डाल पा रही हैं।