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देश का दूरसंचार क्षेत्र डीजल के प्रमुख उपभोक्ताओं में से एक है। यह क्षेत्र अधिक परिचालन खर्च के लिए कमर कस रहा है। इसकी वजह 21 मार्च से तेल विपणन कंपनियों के औद्योगिक उपयोगकर्ताओं को बेचे जाने वाले थोक डीजल की कीमत में 22 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी करना है। तेल की
वैश्विक कीमतों में उछाल के कारण हुई इस वृद्धि ने दिल्ली जैसे बाजारों में डीजल की कीमत को प्रति लीटर 109.59 रुपये तक पहुंचा दिया है।
सलाहकार कंपनी पीडब्ल्यूसी इंडिया में पार्टनर और प्रमुख (दूरसंचार) विनिश बावा ने कहा, ‘डीजल की बढ़ती कीमतें विशेष रूप से टावर कंपनियों के मामले में निकट अवधि में लागत का दबाव पैदा करेंगी। इसकी वजह यह है कि ग्रामीण और ग्रिड पर कम निर्भरता वाले इलाकों में डीजल की अब भी ऊर्जा के परिचालनगत व्यय में खासी हिस्सेदारी होती है।’
काउंटरपॉइंट रिसर्च के शोध विश्लेषक सिद्धांत कैली ने कहा, ‘भारत में डीजल की बढ़ती कीमतों का असर उन इलाकों में सबसे ज्यादा होता है, जहां दूरसंचार टावर ग्रिड गैर-भरोसेमंद आपूर्ति की वजह से डीजल पर बहुत ज्यादा निर्भर रहते हैं। बिजली खुद में परिचालन व्यय का खासा हिस्सा होती है और ऐसे अंचलों में डीजल उस का अहम हिस्सा बन जाता है। हालांकि यह सेक्टर की लागत को मौलिक रूप से तो नहीं बदलता है, लेकिन फिर भी इससे परिचालन व्यय में खासी वृद्धि होती है।’
ईवाई के अनुमानों के अनुसार दूरसंचार सेवा प्रदाता अपनी कुल नेटवर्क लागत का लगभग 37 प्रतिशत भाग बिजली और ईंधन पर खर्च करते हैं, जो 25,872 करोड़ रुपये से अधिक है। ईवाई इंडिया के प्रमुख (बाजार और दूरसंचार) प्रशांत सिंघल ने कहा कि डीजल की लागत में 10 प्रतिशत की वृद्धि से दूरंसचार कंपनियों की बिजली और ईंधन लागत में अनुमानतः 543 करोड़ रुपये की वृद्धि हो जाएगी।
दूरसंचार टावर प्रदाता दूरदराज के उन इलाकों में टावरों को बिजली देने के लिए डीजल जनरेटर (डीजी) सेट चलाने के लिए डीजल पर निर्भर रहते हैं, जहां ग्रिड की बिजली नहीं है। दूरसंचार टावरों का निरंतर संचालन सुनिश्चित करने के लिए डीजी सेटों का उपयोग उन ग्रामीण स्थानों पर बैक-अप आपूर्ति के रूप में भी किया जाता है, जहां ग्रिड की बिजली कभी आती है और कभी चली जाती है। दूरसंचार टावरों को निर्बाध बिजली आपूर्ति वॉयस और डेटा कनेक्टिविटी के लिए महत्त्वपूर्ण होती है, जिसके बिना मोबाइल फोन सेवा काम नहीं करेगी।
अनुमानों के अनुसार यह क्षेत्र सालाना 5 से 9 अरब लीटर डीजल की खपत करता है। देश भर में 8,54,662 से ज्यादा टावर हैं, जिन्हें पैसिव इन्फ्रास्ट्रक्चर कहा जाता है। लेकिन ये सभी ग्रिड बिजली से जुड़े हुए नहीं हैं।
ब्रुकफील्ड के निवेश वाली अल्टियस टेलीकॉम इन्फ्रास्ट्रक्चर ट्रस्ट और भारती समूह के निवेश वाली इंडस टावर्स भारत की सबसे बड़ी टावर कंपनियां हैं और ये दोनों बाजार के बड़े हिस्से पर काबिज हैं। ये कंपनियां रिलायंस जियो, भारती एयरटेल और वोडाफोन आइडिया जैसी दूरसंचार सेवा प्रदाताओं को अपने रेडियो एक्सेस नेटवर्क उपकरण चलाने के लिए टावरों पर स्थान लीज पर देती हैं, जिसे ऐक्टिव इन्फ्रास्ट्रक्चर कहा जाता है।
कंपनियों ने रविवार शाम तक बिजनेस स्टैंडर्ड के सवालों का जवाब नहीं दिया। अलबत्ता विश्लेषकों ने कहा कि डीजल की कीमतों में वृद्धि पर्यावरण अनुकूल ऊर्जा विकल्पों के उपयोग की दिशा में बढ़ने की रफ्तार तेज कर सकती है, जो कई वर्षों से जारी है। टावर प्रदाता जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए दूरसंचार बुनियादी ढांचे को बिजली प्रदान करने के वास्ते सौर सेल, बैटरी चालित समाधान और हाइब्रिड समाधानों का उपयोग कर रहे हैं।