अंबत्तूर में ऑटो पार्ट्स के प्रमुख आपूर्तिकर्ता डेलकोसिस की एक इकाई में कार्यरत कर्मचारी। (फोटो: Delcosys)
अंबात्तूर औद्योगिक एस्टेट के आसपास से गुजरने वाले लोगों का ध्यान धातुओं की खनखनाहट की आने वाली लगातार आवाज ओर आकर्षित हो जाता है। इसे दक्षिण एशिया का सबसे बड़ा लघु उद्योग एस्टेट माना जाता है जो करीब 1,430 एकड़ में फैला हुआ है। इस औद्योगिक केंद्र के भीतर जाने पर हवा में पेंट, ग्रीस, तेल और रसायनों की एक तीखी गंध का
एहसास होता है जो इस इलाके की खास पहचान बन गई है। यहां मौजूद लगभग 1,800 इकाइयों में से अधिकतर प्रमुख आपूर्तिकर्ता हैं जो एशिया के डेट्रॉयट के रूप में चेन्नई की पहचान बनाए रखने में अहम भूमिका निभाते हैं। यह शहर भारत के 30 फीसदी से अधिक वाहन उद्योग और करीब 35 फीसदी हिस्सा समेटे हुए है। हालांकि इस क्षेत्र ने कोविड-19, बाढ़ और यहां तक कि जीएसटी के दौर में मंदी का भी सामना किया है। मगर अब पश्चिम एशिया में जंग के कारण एक ऐसे संकट से जूझ रहा है जो उसके नियंत्रण से बाहर है।
बिज़नेस स्टैंडर्ड ने पत्त्रवक्कम में एक हीट ट्रीटमेंट इकाई चेन्नई ऑटो हीट इंडस्ट्री का दौरा किया। उसके निदेशक आर. शेखर पहले से ही अपने कर्मचारियों के साथ वाणिज्यिक तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) के स्टॉक के बारे में चर्चा कर रहे थे। यह कारखाना पहले 10 दिनों के एलपीजी स्टॉक पर चलता था लेकिन अब कोई स्टॉक नहीं बचा है।
अंबात्तूर क्षेत्र में पश्चिम एशिया संकट का सबसे अधिक प्रभाव हीट ट्रीटमेंट उद्योग पर पड़ा है। शेखर ने कहा, ‘पहले हम हर महीने लगभग 150 सिलिंडर की खपत करते थे। मार्च में यह घटकर 100 सिलिंडर रह गई। अप्रैल में हम केवल परिचालन जारी रखने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक ऐसा उद्योग है जिसे एलपीजी की जरूरत होती है और हमारे पास कोई दूसरा विकल्प नहीं है।’ चेन्नई ऑटो हीट इंडस्ट्री देश के एक सबसे बड़े कार निर्माता के लिए टियर-3 आपूर्तिकर्ता है।
शेखर की कंपनी इस समस्या से उबरने के लिए हर संभव प्रयास कर रही है लेकिन उसे कोई खास सफलता नहीं मिल पाई है। कंपनी मार्च तक एक ही एलपीजी डीलर से खरीदारी करती थी लेकिन अब वह तीन डीलरों से गैस की खरीद कर रही है। साथ ही वह निजी क्षेत्र की कंपनियों से भी गैस हासिल करने की कोशिश कर रही है। मार्च से लागत काफी बढ़ चुकी है जो उसके मुनाफे को काफी प्रभावित कर रही है।
उन्होंने कहा, ‘पहले 19 किलोग्राम का सिलिंडर करीब 1,500 रुपये में मिलता था जो अब लगभग 3,000 रुपये में मिल रहा है। इससे हमारे खर्च दोगुना हो गया है। सरकार घरेलू एलपीजी को पहली प्राथमिकता दे रही है। हमने कुछ ग्राहकों से कहा है कि इस संकट से उबरने तक डिलिवरी का समय बढ़ा दिया जाए।’
अंबात्तूर आगाह करता है जो लोग पश्चिम एशिया में युद्ध को केवल एलपीजी संकट के तौर पर देखते हैं। पूरी मूल्य श्रृंखला पर इस संकट का व्यापक प्रभाव पड़ रहा है।
अंबात्तूर इंडस्ट्रियल एस्टेट मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (एआईईएमए) के अध्यक्ष जी रविचंद्रन ने कहा, ‘युद्ध शुरू होने के बाद इस्पात, एल्युमीनियम और तांबे जैसे कच्चे माल की कीमतों में 30 से 40 फीसदी की वृद्धि हुई है। कुछ कच्चे माल स्टॉक में हैं ही नहीं। ऐसे में अगर संकट जारी रहा तो वाहन उद्योग निश्चित तौर पर उससे प्रभावित होगा।’
मैन्युफैक्चरिंग का कार्यालय है जो ट्रक और कार इंजन के कलपुर्जों की प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। डेक्लोसिस के मुख्य कार्याधिकारी एम. बालचंद्रन श्रमबल किल्लत जैसे बेहद चिंताजनक मुद्दे की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा, ‘चूंकि 5 किलोग्राम के एलपीजी सिलिंडर उपलब्ध नहीं हैं। ऐसे में हमें उत्तर और पूर्वी भारत से कर्मचारी नहीं मिल पा रहे हैं जो हमारा प्रमुख कार्यबल बनाते हैं। अधिकांश इकाइयां 50-60 फीसदी कर्मचारियों के साथ काम कर रही हैं।’ डेक्लोसिस ने खाना पकाने के लिए डीजल स्टोव उपलब्ध कराते हुए एक नई पहल की है लेकिन यह कर्मचारियों को बरकरार रखने के लिए पर्याप्त नहीं है।
बालचंद्रन ने कहा, ‘इस्पात की कीमतें बढ़ गई हैं और निकल जैसे रसायन के दाम भी तेजी से बढ़े हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि प्लास्टिक सेबनी वस्तुओं की कीमतों में अभूतपूर्व इजाफा हुआ है। इससे उद्योग के अस्तित्व पर असर पड़ रहा है।’
पिछले सप्ताह उनकी कंपनी ने जब उच्च-गुणवत्ता वाली प्लास्टिक ट्रे खरीदने की कोशिश की तो उसकी लागत करीब 250 रुपये प्रति किलोग्राम के मुकाबले बढ़कर 350 रुपये के पार पहुंच चुकी थी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि खुदरा विक्रेताओं का कहना है कि अगर संकट जारी रहा तो कीमत जल्द ही 400 से 450 रुपये के पार पहुंच सकती है। उन्होंने भी इस बात से सहमति जताई कि अंबात्तूर को जो कुछ भी प्रभावित करेगा उससे धीरे-धीरे वाहन उद्योग के प्रमुख मूल उपकरण निर्माता (ओईएम) भी प्रभावित हो जाएंगे।
अंबात्तूर टीवीएस मोटर, होंडा मोटरसाइकल ऐंड स्कूटर, ओला इलेक्ट्रिक मोबिलिटी, एमजी मोटर, ह्युंडै, टाटा मोटर्स, मारुति सुजूकी, निसान, महिंद्रा और यामाहा इंडिया जैसे प्रमुख वाहन विनिर्माताओं को प्रेसिजन, मशीनीकृत और फोर्ज्ड कलपुर्जों की आपूर्ति करता है। अम्बत्तुर की कंपनियों का कुल राजस्व 3,000 से 3,500 करोड़ रुपये होने का अनुमान है।
एवन सील्स के प्रबंध निदेशक एएन गिरीशण किर्लोस्कर, सुगुना, शार्प और सीआरआई पंप सहित प्रमुख वाटर पंप विनिर्माताओं के लिए एक टियर-1 आपूर्तिकर्ता हैं। मौजूदा परिस्थिति में उनकी मुश्किलें भी बढ़ गई हैं। गिरीशण ने कहा, ‘अंबात्तूर में शायद 5 फीसदी कंपनियां एलपीजी पर निर्भर हैं जिनके पास फर्नेंस हैं। मेरे एक कारखाने में प्रीमियम गुणवत्ता वाले सिंटर्ड कार्बन का उत्पादन होता है जो काफी मजबूत और छिद्रयुक्त सामग्री है। एलपीजी किल्लत के कारण मुझे वहां संचालन बंद करना पड़ा और कर्मचारियों को अन्य इकाइयों में स्थानांतरित करना पड़ा।’
सिंटर्ड कार्बन का उपयोग वाटर पंपों में किया जाता है। अब कंपनी ने ग्राहकों से उसी उत्पाद के डाउनग्रेडेड संस्करण को स्वीकार करने का अनुरोध किया है। उन्होंने कहा, ‘मेरी मुख्य फैक्टरी प्रभावित नहीं हुई है क्योंकि मैंने उत्पाद की गुणवत्ता को डाउनग्रेड कर दिया है।’
अय्यप्पन कंडासामी की हाइब्रिड ऑटो कास्ट एल्युमीनियम और जिंक प्रेशर डाई-कास्ट घटकों की एक प्रमुख प्रिसिजन विनिर्माता है। कंडासामी भी एल्युमीनियम किल्लत के कारण बेहद चिंतित हैं। खबरों के अनुसार, होर्मुज स्ट्रेट में एल्युमीनियम ले जाने वाले लगभग 170 मालवाहक जहाज फंसे हुए थे। दुनिया के एक सबसे बड़े
एल्युमीनियम स्मेल्टर बहरीन की अल्बा ने बढ़ती लागत के मद्देनजर डिलिवरी पर फोर्स मेज्योर घोषित कर दिया है। उसने होर्मुज स्ट्रेट से शिपिंग करने में अपनी असमर्थता का हवाला देते हुए उत्पादन में 19 फीसदी की कटौती की है। उन्होंने कहा, ‘संकट के बाद कीमतों में 240 रुपये प्रति किलो से बढ़कर लगभग 365 रुपये प्रति किलो हो गई है जो 50 फीसदी से अधिक की वृद्धि है। स्क्रैप भी बाजार में उपलब्ध नहीं है। फिलहाल एल्युमीनियम अलॉय की भारी कमी है।’
एल्युमीनियम आपूर्तिकर्ताओं ने इन इकाइयों को क्रेडिट देना भी बंद कर दिया है जो पहले एक महीने के बाद भुगतान करती थीं। कंडासामी ने कहा, ‘अब हम इसे कैश-ऐंड-कैरी मॉडल पर खरीद रहे हैं।’ उन्होंने यह भी कहा कि भले ही वह उत्पाद प्राप्त कर लें, बिहार और ओडिशा के श्रमिक एलपीजी संकट के कारण वापस चले गए हैं, जिससे पता चलता है कि मानव संसाधन संकट एक और भी बड़ी चिंता है।
हब से बाहर निकलते ही धातु की खड़खड़ाहट और मशीनों की गूंज धीरे-धीरे फीकी पड़ती जाती है। मगर बालचंद्रन के शब्द कानों में गूंजते रहते हैं कि कोविड हो या युद्ध काम चलता ही रहेगा। अंबात्तूर टिका रहेगा।