उद्योग

सिंगूर से बर्नपुर तक: भाजपा के सत्ता में आने से क्या बंगाल बनेगा औद्योगिक हब?

केंद्र और बंगाल में भाजपा की 'डबल इंजन' सरकार से औद्योगिक विकास की नई उम्मीदें जगी हैं। निवेश नीतियों में सुधार और नई योजनाओं से अर्थव्यवस्था संवर सकती है

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ईशिता आयान दत्त   
Last Updated- May 06, 2026 | 1:08 AM IST

यह बात साल 2015 की है जब पश्चिम बंगाल के बर्नपुर में आधुनिक आईआईएससीओ संयंत्र के उद्घाटन समारोह के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की मौजूदगी में साफ लहजे में कहा था कि राजनीति और विकास का आपस में घालमेल नहीं होना चाहिए।

मगर उनकी यह बात समय की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाई। केंद्र-राज्य संबंधों में तनाव और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की नीतियों के कारण बड़े निवेश प्रस्तावों की राह में एक के बाद एक बाधाएं आती रहीं।

अब केंद्र और राज्य दोनों में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के सत्ता में आने के बाद (जो पिछले 50 वर्षों में पहली बार हुआ है) यह सवाल खड़ा हो गया है कि क्या पार्टी उसे मिले शानदार जनादेश के अनुरूप निवेशकों को लुभा पाएगी।

चुनावी वादे

भाजपा का घोषणापत्र वादों से भरा है। इसमें ‘कारोबार सुगमता में सुधार’ और एकल-खिड़की मंजूरी(सिंगल विंडो सिस्टम) प्रणाली के जरिये ‘सिंडिकेट संस्कृति’ को समाप्त कर निवेश के अनुकूल माहौल बनाने का संकल्प लिया गया है।

इस योजना में बंदरगाह आधारित विकास और नीली अर्थव्यवस्था (समुद्री और तटीय संसाधनों का इस्तेमाल कर आर्थिक विकास) को बढ़ावा देने की भी रूप-रेखा का जिक्र किया है। इसमें मत्स्य पालन, जलीय कृषि और समुद्री भोजन प्रसंस्करण पर केंद्रित तटीय आर्थिक क्षेत्र का विकास शामिल हैं। आधुनिक इस्पात संयंत्रों का विकास भी पार्टी के घोषणापत्र में था।

पश्चिम बंगाल में औद्योगिक विकास के ढांचे की बात हो और सिंगूर का जिक्र न हो यह मुमकिन नहीं। सिंगूर वही जगह है जहां पहले नैनो परियोजना आई थी। भाजपा ने वहां एक औद्योगिक पार्क बनाने का प्रस्ताव रखा है, साथ ही राज्य भर में रोजगार सृजन के उद्देश्य से चार प्रमुख औद्योगिक क्षेत्र स्थापित करने की भी बात कही है।

यह फेहरिस्त लंबी है जिसमें औद्योगिक विस्तार से लेकर चाय क्षेत्र को दोबारा पटरी पर लाने का भी खूब जिक्र हुआ है।

मगर उद्योग जगत की सबसे बड़ी उत्सुकता टीएमसी सरकार की कुछ नीतियों में बदलाव में है, खासकर भूमि अधिग्रहण के मामले से जुड़ी हुईं। सिंगूर और नंदीग्राम आंदोलनों के बाद राज्य ने भूमि अधिग्रहण नीतियों से किनारा कर लिया था।

जमीन एक पेचीदा मसला

इंडियन चैंबर ऑफ कॉमर्स (आईसीसी) के महानिदेशक राजीव सिंह ने कहा कि भूमि एक संरचनात्मक बाधा बनी हुई है। उन्होंने कहा,‘उच्च जनसंख्या घनत्व और सीमित उपलब्धता के कारण भूमि अधिग्रहण एक संवेदनशील विषय बना रहेगा।’

हालांकि, उन्होंने आगे कहा कि उद्योग और सरकार को मिलकर काम करने की जरूरत है। सिंह के मुताबिक स्पष्ट नियमों, सुगम प्रक्रियाओं और सुविधापूर्ण दृष्टिकोण को प्राथमिकता दी जानी चाहिए और जबरन अधिग्रहण से बचा जाना चाहिए।

बंगाल में जमीन छोटे-छोटे टुकड़ों में बंटी हुई है। यह वाम मोर्चा सरकार की भूमि सुधार से जुड़े प्रयासों की सफलता का परिणाम है जिसके तहत 34 वर्षों में 30 लाख किसानों को भूमि का पुनर्वितरण किया गया था।

राज्य में लगभग 71.23 लाख किसान परिवार हैं जिनमें 96 प्रतिशत लघु एवं सीमांत किसान हैं। इन छोटे किसानों के पास औसतन मात्र 0.77 हेक्टेयर भूमि है जो बड़े पैमाने की परियोजनाओं की राह में बाधा है। हालांकि, सिंह का कहना है कि बंगाल में 50-100 एकड़ भूमि प्राप्त करना कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।

उद्योग जगत के लिए निर्णायक मोड़?

हर्ष गोयनका, संजीव गोयनका, हर्ष नेवतिया और रघुपति सिंघानिया सहित कई बड़ी औद्योगिक हस्तियों का कहना है कि यह जनादेश बंगाल के उद्योग जगत के लिए एक अहम पड़ाव साबित हो सकता है। आईसीसी के सिंह ने कहा कि यह जनादेश उद्योग जगत के लिए बड़ी राहत है। उन्होंने आगे कहा, ‘केंद्र और राज्य के बीच नीतिगत तालमेल से निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा और वे एक बार फिर बंगाल की ओर रुख करेंगे। कई कंपनियां राज्य से बाहर यानी गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में अपना कारोबार फैला रही थीं।’

बंगाल चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री ने कहा कि वह ऐसे माहौल की उम्मीद करता है जो निवेशकों के विश्वास को मजबूत करे, कारोबार करना सुगम बनाए और राज्य में औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और नीतिगत स्थिरता को बढ़ावा दे। उन्होंने कहा, ‘पश्चिम बंगाल की पूरी आर्थिक क्षमता को उजागर करने के लिए रचनात्मक शासन और सहयोगात्मक विकास महत्त्वपूर्ण बने हुए हैं।’

मोतीलाल ओसवाल की एक रिपोर्ट में कहा गया है कि पहली बार कोई दक्षिणपंथी विचारधारा रखने वाला राजनीतिक दल (जो आर्थिक विकास की हिमायती समझी जाती है) सरकार बनाएगा। विकास, निवेश और कई अन्य महत्त्वपूर्ण आर्थिक मापदंडों में बंगाल राष्ट्रीय औसत से पिछड़ रहा था। रिपोर्ट में कहा गया है,‘अब ‘दोहरे इंजन’ वाली सरकार के लाभों के साथ राज्य की आर्थिक ताकतें उभरेंगी और अगले पांच वर्षों में अधिक निवेश आकर्षित करेंगी।’

हालांकि, पश्चिम बंगाल में आखिरी बार 1972 से 1977 के बीच राज्य और केंद्र दोनों में एक ही पार्टी सत्ता में थी (सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री थे और कांग्रेस केंद्र में थी)। जब वामपंथियों ने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) का समर्थन किया तो कुछ हद तक आपसी तालमेल दिखा और उसका फायदा भी मिला था।

मई 2011  जब सत्ता परिवर्तन हुआ तब उद्योग एवं आंतरिक व्यापार संवर्द्धन विभाग (डीपीआईआईटी) के अनुसार प्रस्तावित निवेश के मामले में पश्चिम बंगाल लगभग 2.78 लाख करोड़ डॉलर के साथ अग्रणी राज्य था जो ओडिशा (लगभग 1.68 लाख करोड़ डॉलर) और तमिलनाडु (लगभग 26,992  करोड़ डॉलर) से आगे था। ये आंकड़े एक ऐसे दौर को परिलक्षित करते हैं जब बुद्धदेव भट्टाचार्य के शासनकाल में उद्योग जगत प्रमुखता से उभरा था।

पिछले पांच वर्षों के आंकड़े कुछ इस प्रकार रहे हैं। वर्ष 2021 में 27 औद्योगिक उद्यम ज्ञापनों (आईईएम) के तहत लगभग 5,535 करोड़ डॉलर के प्रस्तावित निवेश हुए। वर्ष 2022 में, 26 आईईएम के तहत कुल निवेश लगभग 4,532 करोड़ डॉलर रहा और 2023 में 37 आईईएम के तहत कुल निवेश लगभग 6,486 करोड़ डॉलर रहा। वर्ष 2024 में पश्चिम बंगाल 31 आईईएम के साथ पांचवें स्थान पर रहा और प्रस्तावित निवेश बढ़कर लगभग 39,306 करोड़ डॉलर हो गया। मगर ले दिसंबर 2025 तक 4,199 करोड़ रुपये के निवेश की प्रस्तावित योजनाएं थीं।

First Published : May 6, 2026 | 1:07 AM IST