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भारत में नया ‘केजीएफ’ दौर, करीब 80 साल बाद नई सोने की खान से उत्पादन हो रहा शुरू

दिलचस्प है कि हुट्टी से पहले शुरू हुई खान, केजीएफ यानी ‘कोलार गोल्ड फील्ड’ (1880) थी। इसी नाम की एक ब्लॉकबस्टर फिल्म के कारण यह खान और मशहूर हो गई।

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शाइन जेकब   
Last Updated- March 27, 2026 | 10:37 AM IST

भारत में आजादी के बाद फिर ‘केजीएफ’ जैसा सुनहरा दौर अगले महीने के मध्य से शुरू होने जा रहा है। दरअसल भारत एक नई खान से सोने के उत्पादन की तरफ कदम बढ़ा रहा है। कर्नाटक में 1947 में आखिरी बार बड़े पैमाने पर सोने की हुट्टी खान शुरू होने के लगभग आठ दशक बाद देश की नई खान से व्यावसायिक उत्पादन शुरू हो जाएगा। यह खान आंध्र प्रदेश के जोन्नागिरि में है।

दिलचस्प है कि हुट्टी से पहले शुरू हुई खान, केजीएफ यानी ‘कोलार गोल्ड फील्ड’ (1880) थी। इसी नाम की एक ब्लॉकबस्टर फिल्म के कारण यह खान और मशहूर हो गई। इस बार सोने की खान का संचालन निजी क्षेत्र की एक कंपनी जियोमैसूर सर्विसेस द्वारा किया जा रहा है। कंपनी सोने का प्रसंस्करण कर इसे जियोमैसूर ब्रांड नाम के तहत सीधे आभूषण कारोबारियों को बेचने की भी योजना बना रही है।

त्रिवेणी अर्थमूवर्स ऐंड लॉयड्स मेटल के प्रबंध निदेशक बी प्रभाकरन ने कहा,‘हमने वाणिज्यिक उत्पादन से पहले औपचारिक परीक्षण शुरू कर दिए हैं और इसमें लगातार प्रगति हो रही है। हमें अप्रैल में वाणिज्यिक उत्पादन शुरू करने की उम्मीद है। वर्ष 2026-27 के अंत तक हम लगभग 600 किलोग्राम सोने का उत्पादन करना चाहते हैं।’ जियोमैसूर अपना उत्पादन बढ़ाकर 2 टन प्रति वर्ष करने की भी योजना बना रही है जिससे यह भारत में सोने का सबसे बड़ा उत्पादक बन जाएगी। हुट्टी में फिलहाल केवल लगभग 1.5 टन प्रति वर्ष सोने का उत्पादन हो रहा है।

जियोमैसूर सेलम की त्रिवेणी अर्थमूवर्स ऐंड लॉयड्स मेटल (71 प्रतिशत) और डेक्कन गोल्ड माइंस (28 प्रतिशत) का संयुक्त उद्यम है। डेक्कन बंबई स्टॉक एक्सचेंज (बीएसई) पर सूचीबद्ध होने वाली पहली और एकमात्र स्वर्ण और महत्त्वपूर्ण खनिज संसाधन कंपनी है।

प्रभाकरन ने कहा,‘जोन्नागिरि स्वर्ण परियोजना स्वतंत्रता के बाद भारत की पहली बड़े पैमाने की निजी सोने की खान है। बिगड़े भू-राजनीतिक मुद्दों के कारण मौजूदा समय में सोने का आयात बहुत महंगा हो गया है। 800 टन से अधिक सोना भारत आ रहा है। अगर इस प्रकार की खान का परिचालन शुरू होता है तो भारत में सोने की उपलब्धता काफी बढ़ जाएगी। कई छोटी खानें भी हैं जिन्हें चालू किया जा सकता है। केजीएफ जैसी खदान फिर शुरू करने पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।’

उद्योग सूत्रों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद झारखंड में एक छोटी सोने की खान में उत्पादन शुरू हुआ मगर उत्पादन न के बराबर और अनियमित था। हालांकि, जोन्नागिरि स्वतंत्रता के बाद पहली बड़ी खान होगी। उन्होंने कहा,‘हमारे पास एक एकीकृत रिफाइनरी है। हम जियोमैसूर को ‘मेड-इन-इंडिया’ ब्रांड के रूप में विकसित करना चाहते हैं। हमने प्रायोगिक आधार पर बिक्री शुरू कर दी है। हम आंध्र प्रदेश के स्थानीय आभूषण कारोबारियों को वरीयता देना चाहते हैं क्योंकि हमारे पास अच्छी गुणवत्ता का सोना है और मुख्य रूप से छोटे आभूषण कारोबारियों को केंद्र में रख रहे हैं।’

क्यों पिछड़ गया भारत?

डेक्कन गोल्ड माइंस के प्रबंध निदेशक हनुमा प्रसाद मोदाली के अनुसार 1970 और 80 के दशक में भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका और ऑस्ट्रेलिया लगभग 5 टन सोने का उत्पादन कर रहे थे। भारत में सोने के उत्पादन में केजीएफ (केजीएफ) की अहम भूमिका थी। मगर 2001 में इस खान से उत्पादन बंद हो गया।

मोदाली ने कहा,‘अगर भारत की मौजूदा स्थिति देखी जाए तो उत्पादन घटकर 1.5 टन रह गया है जबकि चीन लगभग 400 टन, ऑस्ट्रेलिया 350 टन और दक्षिण अफ्रीका लगभग 250 टन सोने का का उत्पादन कर रहा है।’

उन्होंने कहा इसकी प्रमुख वजह अन्वेषण की कमी और सरकारी तंत्र से जुड़ी चुनौतियां थीं। लौह अयस्क, कोयला, जस्ता और तांबे के अन्वेषण पर अधिक ध्यान केंद्रित होने से सोने का उत्पादन कम होता गया। लौह अयस्क, कोयला, जस्ता बढ़ती अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्वपूर्ण थे। हालांकि, 1990 के दशक में निजी कंपनियों द्वारा अन्वेषण के लिए इस क्षेत्र को खोल दिया गया था मगर नौकरशाही की बाधाओं ने मंजूरी में और देरी कर दी।

मोदाली ने कहा,‘भारत में पर्याप्त मात्रा में सोने का उत्पादन किया जा सकता है क्योंकि देश में कम से कम 100 टन का भंडार है। जियोमैसूर नए निवेशकों को सोने की परियोजनाओं में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित करेगी’। डेक्कन के किर्गिस्तान और फिनलैंड में सोने की खदान परियोजनाएं हैं। कंपनी के पास अहम खनिज भंडार भी हैं जिनमें छत्तीसगढ़ में निकल, मोजाम्बिक में लीथियम और स्पेन में टंगस्टन के भंडार शामिल हैं। इस बेहद कम उत्पादन को भारत के सोने के आयात के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए। वर्ष 2025 में सोने के आयात में भारी उछाल आई और यह लगभग 59 अरब डॉलर तक पहुंच गया। मजबूत मांग और रिकॉर्ड कीमतें इसके मुख्य कारण थे।

First Published : March 27, 2026 | 10:37 AM IST