अमेरिका ने दवा सेक्टर में बड़ा कदम उठाते हुए कई पेटेंटेड दवाओं और उनके कच्चे माल पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का फैसला किया है। ICICI सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के मुताबिक यह फैसला ग्लोबल फार्मा इंडस्ट्री के लिए बड़ा बदलाव ला सकता है। हालांकि फिलहाल भारतीय कंपनियों को थोड़ी राहत मिली है, क्योंकि जेनेरिक दवाओं और बायोसिमिलर को एक साल के लिए इस टैरिफ से बाहर रखा गया है।
रिपोर्ट के अनुसार कुल करीब 203 अरब डॉलर के फार्मा इंपोर्ट में से सिर्फ एक हिस्से पर ही ज्यादा असर पड़ेगा। करीब 22 अरब डॉलर के उत्पादों पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगेगा, जबकि बाकी पर 10 से 15 प्रतिशत के बीच टैरिफ लग सकता है। सिंगापुर, भारत और चीन से आने वाले कुछ प्रोडक्ट्स पर इसका ज्यादा असर पड़ सकता है।
हालांकि जिन कंपनियों ने अमेरिका के साथ खास समझौते किए हैं, उन्हें इस टैरिफ से छूट भी मिल सकती है।
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जिन देशों के साथ अमेरिका के पहले से ट्रेड एग्रीमेंट हैं, जैसे जापान, यूरोप, दक्षिण कोरिया और ब्रिटेन, उन्हें कम टैरिफ देना होगा। इसी तरह जिन कंपनियों ने अमेरिका में दवाओं का प्रोडक्शन बढ़ाने का वादा किया है, उन्हें भी कम टैरिफ का फायदा मिल सकता है।
इससे साफ है कि अमेरिका उन कंपनियों को बढ़ावा देना चाहता है जो अपने प्लांट वहीं लगाएं।
भारत के लिए फिलहाल सबसे बड़ी राहत यह है कि जेनेरिक दवाएं और बायोसिमिलर इस टैरिफ से बाहर रखे गए हैं। इससे भारतीय दवा कंपनियों पर तुरंत बड़ा असर नहीं पड़ेगा, क्योंकि भारत का बड़ा एक्सपोर्ट इन्हीं सेगमेंट में होता है।
सन फार्मा जैसी कंपनी पर भी असर सीमित रहने की उम्मीद है, क्योंकि उसके ज्यादातर खास दवाओं का उत्पादन ऐसे देशों में होता है जहां टैरिफ कम है। हालांकि कुछ दवाओं पर असर पड़ सकता है जो भारत या कनाडा में बनती हैं।
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि आने वाले समय में भारतीय CDMO यानी कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए चुनौती बढ़ सकती है। अभी भारत और चीन में दवा बनाने की लागत अमेरिका के मुकाबले काफी कम है, लेकिन 100 प्रतिशत टैरिफ लगने से यह फायदा काफी कम हो सकता है।
अगर ऐसा होता है, तो ग्लोबल कंपनियां धीरे-धीरे अपने प्रोडक्शन को अमेरिका या यूरोप शिफ्ट कर सकती हैं। इससे भारत में नए प्रोजेक्ट्स आने की रफ्तार धीमी पड़ सकती है।
हालांकि तुरंत बड़ा बदलाव मुश्किल है, क्योंकि दवा उद्योग में उत्पादन शिफ्ट करना आसान नहीं होता। इसमें समय, क्षमता और रेगुलेटरी मंजूरी की जरूरत होती है। लेकिन लंबे समय में यह फैसला ग्लोबल सप्लाई चेन को बदल सकता है। खास तौर पर GLP-1 जैसी नई दवाओं की सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है, क्योंकि बड़ी कंपनियां अब अपने सोर्सिंग को लोकल करने की कोशिश कर सकती हैं।
अभी के लिए भारतीय फार्मा कंपनियों को राहत जरूर मिली है, लेकिन यह राहत अस्थायी है। अगर भविष्य में जेनेरिक दवाओं को भी टैरिफ के दायरे में लाया गया, तो असर ज्यादा गहरा हो सकता है। इसलिए यह फैसला आने वाले समय में भारतीय फार्मा सेक्टर के लिए एक बड़ा जोखिम बन सकता है।