पश्चिम एशिया में हालात अगले एक और महीने तक यूं ही बेतरतीब रहे तो देश के दवा उद्योग को 75 करोड़ डॉलर तक का नुकसान हो सकता है। दवा उद्योग के प्रतिनिधियों एवं विश्लेषकों का कहना है कि आपूर्ति तंत्र में व्यवधान से दवा उद्योग को नुकसान उठाना पड़ सकता है। शुरुआत में माना जा रहा था कि पश्चिम एशिया संकट से उत्पन्न व्यवधान अस्थायी है जिससे नुकसान लगभग 15-20 करोड़ डॉलर तक सिमट कर रह जाएगा।
दवा उद्योग के एक प्रतिनिधि ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया कि मगर अब नुकसान अधिक रहने की आशंका है। ईरान और अमेरिका-इजरायल दोनों तरफ से ताबड़तोड़ हमलों को देखते हुए आपूर्ति श्रृंखला लंबे समय तक प्रभावित रहने की आशंका है।
फार्मास्युटिकल एक्सपोर्ट्स प्रमोशन काउंसिल ऑफ इंडिया (फार्मेक्सिल) के अध्यक्ष नमित जोशी ने कहा,‘अगर यह युद्ध अप्रैल के अंत तक जारी रहा तो इसका प्रभाव कम से कम छह महीने तक दिख सकता है। इससे 50 करोड़ से 75 करोड़ डॉलर तक का नुकसान हो सकता है।’
भारत ने पश्चिम एशिया और उत्तरी अफ्रीका (वाना) क्षेत्र को 1.75 अरब डॉलर मूल्य के दवा उत्पादों का निर्यात किया जो वित्त वर्ष 2024-25 में भारत के कुल 30.38 अरब डॉलर के दवा निर्यात का लगभग 5.7 प्रतिशत था। वित्त वर्ष 2025 में भारत के प्रमुख निर्यात गंतव्य संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) (37.85 करोड़ डॉलर), मिस्र (21.28 करोड़ डॉलर), सऊदी अरब (21.17 करोड़ डॉलर) और इराक (22.84 करोड़ डॉलर) थे।
मुंबई स्थित एंटोड फार्मा के मुख्य कार्यकारी अधिकारी (सीईओ) निखिल मसुरकर ने कहा,‘वाना क्षेत्र और अफ्रीका के कुछ हिस्से भारतीय दवा उत्पादों के लिए महत्त्वपूर्ण बाजार हैं। इन क्षेत्रों में भू-राजनीतिक अस्थिरता के कारण माल ढुलाई की उपलब्धता, भुगतान चक्र और वितरक भंडार इन्वेंट्री नियोजन में अस्थायी अस्थिरता आ सकती है।’
अधिकारियों का कहना है कि बढ़ते माल ढुलाई और बढ़ती बीमा लागत के कारण सख्त मूल्य निर्धारण संरचनाओं या निविदा-आधारित अनुबंधों पर काम करने वाले छोटे निर्यातकों के मार्जिन पर दबाव पड़ सकता है।
मसुरकर ने कहा,‘कुछ मामलों में निर्यातकों को वितरकों के साथ दीर्घकालिक संबंध बनाए रखने के लिए लॉजिस्टिक लागत में वृद्धि का कुछ हिस्सा स्वयं वहन करना पड़ सकता है।’ हालांकि, दवा आवश्यक उत्पाद होने के कारण शीर्ष-स्तरीय लाभ पर प्रभाव सीमित हो सकता है मगर छोटे निर्यातकों के लिए लाभ पर दबाव अधिक रह सकता है। दवा निर्माता भी उत्पादन लागत में वृद्धि से जूझ रहे हैं क्योंकि फार्मा सॉल्वेंट और पैकेजिंग आपूर्ति श्रृंखला कच्चे तेल एवं गैस पर अत्यधिक निर्भर है।
जोशी ने कहा,‘इन क्षेत्रों में किसी भी प्रकार की रुकावट सक्रिय दवा सामग्री (एपीआई) और पैकेजिंग उद्योगों को बुरी तरह प्रभावित करेगी जिससे निर्यात और घरेलू उत्पादन दोनों पर प्रभाव पड़ेगा।’
मसुरकर ने कहा कि वर्तमान में दवा उद्योग में कुछ श्रेणियों में उत्पादन लागत लगभग 3 से 7 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसका असर अणु के प्रकार, आपूर्तिकर्ता के भौगोलिक क्षेत्र और मौजूदा खरीद अनुबंधों के आधार पर भिन्न होता है। उन्होंने कहा,‘समय के साथ कंपनियां मार्जिन स्थिर करने के लिए मूल्य निर्धारण में तब्दीली कर सकती है या अधिक अनुकूल माल परिवहन मार्गों का विकल्प चुन सकती हैं।’विशेषज्ञों का कहना है कि इस समस्या से निपटने के लिए भारत और खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के बीच एक समर्पित स्वास्थ्य सुरक्षा गलियारा (जिसमें हरित-चैनल लॉजिस्टिक्स शामिल हो) बेहतर आपूर्ति सुनिश्चित कर सकता है।
ओमनीएक्टिव हेल्थ टेक्नोलॉजीज के कार्यकारी अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक संजय मारीवाला ने कहा,‘इन उपायों के साथ ही एक संयुक्त युद्ध-जोखिम बीमा तंत्र और आवश्यक दवाओं के लिए एक गतिशील माल ढुलाई समतुल्यता कोष भी होना चाहिए।’ उन्होंने आगे कहा कि पश्चिमी बंदरगाहों पर तीन महीने का निर्यात बफर अनिवार्य करने से अल्पकालिक झटकों को झेलने में मदद मिलेगी जबकि सीमा शुल्क, बंदरगाहों और उद्योग को एकीकृत करने वाला रियल टाइम डिजिटल कंट्रोल टावर टावर सक्रिय रूप से मार्ग में बदलाव सुनिश्चित कर सकता है।