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पश्चिम एशिया की लड़ाई की वजह से बढ़ती इनपुट लागत के कारण इस साल हिंदुस्तान जिंक की जिंक उत्पादन लागत में प्रति टन 50 से 60 डॉलर का इजाफा हो सकता है। अलबत्ता कंपनी वृद्धि के अगले चरण को रफ्तार दे रही है। मार्च तिमाही के रिकॉर्ड मुनाफे के बाद हिंदुस्तान जिंक के मुख्य कार्य अधिकारी अरुण मिश्र ने साकेत कुमार को बताया कि कंपनी 50 से 60 करोड़ डॉलर वाले पूंजीगत व्यय कार्यक्रम की तैयारी कर रही है। इसका लक्ष्य 3 से 4 साल में धातु उत्पादन को दोगुना करना है। साथ ही चांदी और महत्त्वपूर्ण खनिजों के कारोबार का विस्तार करना है। संपादित अंश …
हम 3 से 4 साल में 10 टन धातु उत्पादन से 20 टन तक पहुंचना चाहते हैं। 10 टन के स्तर पर हम 8,00,000 टन जिंक का उत्पादन करते हैं। 20 लाख टन के स्तर पर अकेले जिंक उत्पादन ही लगभग 16 लाख टन तक बढ़ जाएगा। इससे हम दुनिया की सबसे बड़ी जिंक उत्पादक बन जाएंगे। हम अधिक दक्षता वाली आधुनिक इकाइयां भी लगा रहे हैं, जिससे हमारी उत्पादन लागत कम होगी। वर्तमान में 10 लाख टन के स्तर हमने 70 प्रतिशत अक्षय ऊर्जा की योजना बनाई है। 20 लाख टन के स्तर पर हम इसे 80 से 90 प्रतिशत तक ले जाएंगे। कालांतर में निवेशक 1,200 टन से 1,500 टन के बीच चांदी उत्पादन की उम्मीद कर सकते हैं।
समस्या पूरी तरह से पहली छमाही में थी। पिछले साल हम अपना नया रोस्टर, आर6 स्थापित कर रहे थे। हमें उम्मीद थी कि यह 1 अप्रैल से चालू हो जाएगा। अगर ऐसा होता, तो हमारे पास अतिरिक्त कैल्सीन होता और हम उत्पादन को प्रभावित किए बिना पुराने रोस्टर को क्रमबद्ध रूप से बंद कर सकते थे। अलबत्ता आर6 में देरी हुई। इससे ऐसी स्थिति पैदा हुई कि नया रोस्टर तैयार नहीं था, जबकि पुराने रोस्टर पहले से ही शटडाउन के लिए जा रहे थे। इससे पहली छमाही में उत्पादन का नुकसान हुआ। दूसरी छमाही तक आर6 चालू हो गया था। हमारे पास अतिरिक्त कैल्सीन था, पूरी कामबंदी को ठीक से निपटा लिया गया था और हमने पहले ही कहा था कि हम रिकॉर्ड उत्पादन करेंगे। हमने ठीक वैसा ही किया।
वित्त वर्ष 27 के दौरान हमने जिंक लागत 975 से 1,000 डॉलर प्रति टन रहने का अनुमान लगाया है। इसमें पश्चिम एशिया से संबंधित लगभग 50 से 60 डॉलर प्रति टन का जोखिम प्रीमियम शामिल है। अगर भू-राजनीतिक स्थिति में सुधार होता है, तो हम अनुमान के निचले स्तर पर प्रदर्शन करने में सक्षम होंगे। ग्रेड की चुनौतियों को भी ध्यान में रखना होगा।
इसके कई पहलू हैं। सबसे पहले, हमारे ग्राहकों पर इसका सिलसिलेवार असर पड़ रहा है। उदाहरण के लिए यदि प्रोपेन गैस की कीमतें तीन गुना बढ़ जाती हैं, तो कुछ छोटे ग्राहक इन लागतों को वहन नहीं कर पाएंगे। इससे घरेलू मांग प्रभावित हो सकती है। यदि घरेलू मांग कमजोर होती है, तो हमें अधिक निर्यात करना पड़ सकता है। निर्यात से प्राप्तियां घरेलू बिक्री की तुलना में कम होती हैं और माल ढुलाई लागत अधिक होती है। दूसरा, हमारे आपूर्तिकर्ता अधिक इनपुट लागत का सामना कर रहे हैं, यह बात अंततः हमारी खरीद लागत को प्रभावित करती है। तीसरा, हमारी अपनी खरीद पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है। कोयला, प्रोपेन गैस, डीजल और विस्फोटक जैसी वस्तुएं उपलब्धता और लागत दोनों ही लिहाज से प्रभावित हो रही हैं। वर्तमान में सामग्रियां उपलब्ध हैं, लेकिन कुछ मामलों में पिछली लागत से लगभग तीन गुना अधिक लागत पर। इस अनिश्चितता को देखते हुए, हमारा उद्देश्य स्पष्ट है। हमें निर्बाध उत्पादन बनाए रखना होगा।
हमने सरकारी नीलामी के जरिये कई ब्लॉक पहले ही सुरक्षित कर लिए हैं। इनमें आंध्र प्रदेश में एक टंगस्टन ब्लॉक, उत्तर प्रदेश में एक दुर्लभ खनिज ब्लॉक और अरुणाचल प्रदेश में एक मैंगनीज ब्लॉक शामिल हैं। अगले पांच वर्षों में हमारा उद्देश्य अपने पोर्टफोलियो में कम से कम तीन नए खनिज जोड़ना है।