प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की डिप्टी गवर्नर पूनम गुप्ता ने मंगलवार को कहा कि भारत की वृद्धि को कम करके आंका जा रहा है, और वृद्धि में देश के निवेश के योगदान को अनदेखा किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि भारत को स्वाभाविक रूप से उपभोग-संचालित अर्थव्यवस्था के रूप में वर्णित किया जाता है और वृद्धि में निवेश के योगदान को लगातार कम आंका या नज़रअंदाज़ किया जाता है।
नैशनल काउंसिल ऑफ अप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च (एनसीएईआर)की ओर से आयोजित एक संगोष्ठी और चर्चा के दौरान गुप्ता ने कहा कि अर्थव्यवस्था पारंपरिक अनुमानों से कहीं अधिक गैर-मुद्रास्फीतिकारी वृद्धि क्षमता वाली हो सकती है। गुप्ता ने कहा कि देश ने 7 प्रतिशत से अधिक की मजबूत वृद्धि दर देखी है और महंगाई दर भी सामान्य रही है।
उन्होंने कहा कि यह इस तथ्य की ओर इशारा करता है कि भारत की वृद्धि क्षमता अधिक है। उन्होंने क्षमता उपभोग 75 प्रतिशत के करीब रहने का हवाला देते हुए कहा कि यह उस स्तर के करीब नहीं है, जिससे यह संकेत मिलता हो कि अर्थव्यवस्था की वृद्धि की संभावनाएं खत्म हो गई हैं।
इसी चर्चा के दौरान अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के एशिया प्रशांत विकास के निदेशक कृष्ण श्रीनिवासन ने कहा कि भारत सहित एशिया शुल्क झटके के बाद अब एक नए ऊर्जा झटके के दौर में प्रवेश कर रहा है और लगातार चल रहे संकटों के कारण राजकोषीय गुंजाइश कम रह गई है।
श्रीनिवासन ने चेतावनी दी कि युवाओं की बढ़ती बेरोजगारी, वित्तीय स्थिति कमजोर होने और असमान रूप से एआई को अपनाए जाने से इस क्षेत्र में बड़ी ढांचागत समस्या हो सकती है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि भारत को प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को आकर्षित करने और सुधार में निवेश जारी रखने के लिए अधिक प्रयास करने की जरूरत है।
उन्होंने तर्क दिया कि कॉरपोरेट बैलेंस शीट और बैंक बैलेंस शीट दोनों ही अभी अच्छी स्थिति में है, ऐसे में निवेश अपेक्षा से अधिक होना चाहिए। उन्होंने कहा कि एफडीआई आकर्षित करने के मामले में भारत बहुत बेहतर कर सकता है।