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पश्चिम एशिया में संघर्ष के कारण आपूर्ति बाधित होने से कच्चे तेल की कीमतों में तेजी को देखते हुए पेट्रोल और डीजल की कीमतों में इजाफा हो सकता है। सरकारी तेल मार्केटिंग कंपनियों को पेट्रोल, डीजल और तरलीकृत पेट्रोलियम गैस (एलपीजी) की बिक्री पर होने वाला नुकसान बढ़कर 30,000 करोड़ रुपये प्रति महीना हो गया है।
पिछले दो हफ्तों में ईंधन की कीमतों में बदलाव को लेकर सरकार का आधिकारिक रुख भी बदल गया है। पहले सरकार घरेलू उपभोक्ताओं को राहत देने के मकसद से कीमतों में संभावित बढ़ोतरी की बात से साफ तौर पर इनकार कर रही थी मगर अब वह यह मान रही है कि अब तक की कोशिश’ रही है कि कीमतों में कोई बढ़ोतरी न हो।
अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध और होर्मुज स्ट्रेट के बंद होने के कारण कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से पार पहुंचने के बावजूद तेल कंपनियों ने देश में ईंधन की खुदरा कीमतों में कोई बदलाव नहीं किया है। एक विशेषज्ञ के अनुसार यह फैसला अब भारतीय अर्थव्यवस्था की सेहत और कंपनियों के मुनाफे पर भारी पड़ रहा है।
केपीएमजी में ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन और रसायन विभाग के वैश्विक प्रमुख अनीश दे ने कहा, ‘होर्मुज स्ट्रेट पहले कभी बंद नहीं हुआ था और मौजूदा हालात दुनिया के लिए अभूतपूर्व है। हालांकि युद्ध हमारी सीमाओं पर नहीं हो रहा है फिर भी यह हमारी मुख्य ऊर्जा आपूर्ति श्रृंखला को प्रभावित कर रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था की ताकत है कि देश अब तक इसका सामना करने में सक्षम रहा है लेकिन लंबे समय से समस्या बनी रहने की वजह से अब स्थिति बिगड़ रही है।’
8 मई को अंतर-मंत्रालय संवाददाता सम्मेलन में पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय की संयुक्त सचिव सुजाता शर्मा ने कहा था कि तेल मार्केटिंग कंपनियों की वित्तीय स्थिति पर दबाव पड़ रहा है क्योंकि वे लगातार कम दरों पर ईंधन बेच रही हैं। शर्मा ने कहा कि भारत सरकार ने अब तक ग्राहकों के लिए कीमतें स्थिर रखने की कोशिश की है।
केपीएमजी के अनीश दे ने कहा कि कच्चे तेल की मौजूदा कीमतें और कंपनियों को हो रहे नुकसान को देखते हुए पेट्रोल और डीजल के दाम में 20 फीसदी की बढ़ोतरी जरूरी है। हालांकि कीमतों में इतनी बड़ी बढ़ोतरी की संभावना कम ही है।
केपीएमजी में ऊर्जा, प्राकृतिक संसाधन और रसायन विभाग के वैश्विक प्रमुख अनीश दे ने कहा, ‘कच्चे तेल की बढ़ी कीमतों का भार ग्राहकों पर नहीं डाला गया जिससे राजकोषीय गुंजाइश कम होती जा रही है और तेल कंपनियों की बैलेंस शीट पर भी दबाव बढ़ रहा है और उनकी जमा पूंजी भी खत्म हो रही है। इस वजह से उनकी सुरक्षात्मक स्थिति बहुत कमजोर हो गई है। हम पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने में जितना देर करेंगे या दरों को जितना कम रखेंगे, समस्या उतनी बढ़ती जाएगी और अर्थव्यवस्था की प्रतिस्पर्धात्मकता को कमजोर होगी।’
ब्रोकरेज फर्म कोटक इंस्टीट्यूशनल इक्विटीज ने अप्रैलज के आखिर एक रिपोर्ट में कहा था कि पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु सहित अन्य राज्यों में चुनावों के बाद देश में ईंधन की खुदरा कीमतें 25 से 28 रुपये प्रति लीटर तक बढ़ सकती हैं। यह अनुमान भारतीय क्रूड बास्केट के 120 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंचने और पेट्रोल-डीजल की बिक्री पर कम मार्जिन को देखते हुए लगाया गया था। तेल मंत्रालय ने इस रिपोर्ट को ‘फर्जी खबर’ करार देते हुए आरोप लगाया था कि इसका मकसद जनता के बीच डर और घबराहट पैदा करना है।