प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा इस तिमाही में अब तक खुले बाजार परिचालन (ओएमओ) के जरिये 3.5 लाख करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड की भारी भरकम खरीदारी से बैंकों के ट्रेजरी (बॉन्ड की खरीद-बिक्री) कारोबार से जुड़ा घाटा कम होने की उम्मीद है। इसके अलावा स्विच ऑक्शन से भी बैंकों को मदद मिलने की उम्मीद है। बॉन्ड यील्ड में उछाल (खासकर फरवरी के अंत में शुरू हुए पश्चिम एशिया संकट के कारण) बैंकों के ट्रेजरी कारोबार पर असर हुआ है।
10 वर्ष की अवधि की सरकारी प्रतिभूतियों पर यील्ड जनवरी से अब तक 35 आधार बढ़ चुकी है। अकेले मार्च में में इसमें 28 आधार अंक की बढ़ोतरी दर्ज की गई। चालू तिमाही के दौरान 5 वर्ष की अवधि के सरकारी बॉन्ड और 15 वर्ष की अवधि के बॉन्ड पर यील्ड क्रमशः 34 आधार अंक और 32 आधार अंक तक बढ़ गई है।
सरकारी बैंकों और कुछ बड़े निजी क्षेत्र के बैंकों को अभी भी कुछ मार्क-टू-मार्केट नुकसान (कागजी नुकसान) का सामना करना पड़ सकता है मगर जिन बैंकों ने ओएमओ खरीद या स्विच ऑपरेशन में भाग लिया है वे इसे कम करने की बेहतर स्थिति में होंगे।
एक बॉन्ड कारोबारी ने कहा,‘नुकसान तो होगा ही क्योंकि मौजूदा यील्ड 2022 में देखे गए उच्चतम स्तर के करीब हैं जब आरबीआई ब्याज दरें बढ़ा रहा था। जिन बॉन्ड की बिक्री अब तक नहीं हुई है उनमें अधिकांश अब घाटे में होंगे।’
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अधिकारी ने आगे कहा कि अगर बैंकों ने आरबीआई द्वारा बॉन्ड खरीदने के दौरान मुनाफा कमाया होता तो शुद्ध आधार पर वे अभी भी घाटे में हो सकते थे लेकिन नुकसान कम किया जा सकता था। उन्होंने कहा कि प्रभावी रूप से मार्क-टू-मार्केट नुकसान का एक बड़ा हिस्सा आरबीआई द्वारा वहन किया गया है। अगर ये ओएमओ नहीं हुए होते तो आज बाजार में भारी नुकसान होता।’
शुक्रवार को 10 वर्ष की सरकारी बॉन्ड की यील्ड 6.94 प्रतिशत पर पहुंच गई। पिछले साल मार्च के अंत में 10 वर्ष के सरकारी बॉन्ड पर यील्ड 6.58 प्रतिशत थी।
जानकारों का कहना है कि आरबीआई की तरफ से बॉन्ड खरीदारी ने नुकसान कम करने में अहम भूमिका निभाई है। अनुमान है कि केंद्रीय बैंक ने चालू वित्त वर्ष में लगभग 9 लाख करोड़ रुपये मूल्य के बॉन्ड खरीदे हैं जिन पर यील्ड मौजूदा स्तरों से लगभग 25 आधार अंक कम है।
एक बॉन्ड कारोबारी ने कहा,‘हाल में यील्ड में आई उछाल को देखते हुए कुछ बैंक खासकर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक और कुछ बड़े निजी बैंक इस तिमाही में बॉन्ड कारोबार में नुकसान उठा सकते हैं। हालांकि, यह घाटा काफी अधिक रहने की संभावना नहीं है। जिन संस्थानों ने ओएमओ खरीद या स्विच ऑपरेशन में भाग लिया है उन्हें कुछ राहत मिल सकती है, जबकि अन्य को अपने ट्रेजरी खातों पर दबाव का सामना करना पड़ सकता है।’
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इस तिमाही में दो चरणों में सरकारी बॉन्ड यील्ड में उतार-चढ़ाव दिखे। शुरू में नरमी का रुझान रहा और फिर इसमें तेज उछाल आई। जनवरी और फरवरी की शुरुआत में बेंचमार्क 10-वर्ष की अवधि के बॉन्ड पर यील्ड 6.65 प्रतिशत से 6.70 प्रतिशत के दायरे में कारोबार करती रही। फरवरी की शुरुआत में मौद्रिक नीति समिति की बैठक के बाद तत्काल बॉन्ड खरीदारी से जुड़े समर्थन की कमी और ब्याज दर में कटौती के अंतिम दौर में पहुंचने की उम्मीद से बाजार की भावना पर असर हुआ जिससे यील्ड में मामूली वृद्धि हुई।