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RBI का बड़ा कदम: बैंक बोर्डों के नियम तर्कसंगत बनाएगा भारतीय रिजर्व बैंक

इसका मकसद बोर्डों को नीतियों व रणनीतिक मसलों पर सक्षम बनाना और उनके परिचालन संबंधी मसलों के बोझ को कम करना है

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सुब्रत पांडा   
Last Updated- April 08, 2026 | 10:52 PM IST

भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) बैंकों के बोर्डों के लिए दिशानिर्देशों में संशोधन करने और उन्हें तर्कसंगत बनाने की योजना पर काम कर रहा है। इसका मकसद बोर्डों को नीतियों व रणनीतिक मसलों पर सक्षम बनाना और उनके परिचालन संबंधी मसलों के बोझ को कम करना है।

रिजर्व बैंक के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने कहा, ‘सभी मौजूदा दिशानिर्देशों की व्यापक समीक्षा के बाद हमने बैंक बोर्डों के समय का बेहतर इस्तेमाल सुनिश्चित करने के लिए इनमें संशोधन करने और इन्हें तर्कसंगत बनाने का प्रस्ताव किया है।’ रिजर्व बैंक ने कहा है कि वह जल्द ही सार्वजनिक परामर्श के लिए मसौदा दिशानिर्देश जारी करेगा।

मल्होत्रा ने कहा, ‘बोर्डों से यह सुनने में आ रहा था कि उनके सामने परिचालन संबंधी कई मसले आ रहे हैं, जिससे वे वास्तविक नीति और रणनीतिक मामलों पर ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। यही कारण है कि हम इस बदलाव के लिए कदम उठा रहे हैं।’

रिजर्व बैंक ऐसे समय में कदम उठा रहा है, जब हाल में एचडीएफसी बैंक के पूर्व अंशकालिक चेयरमैन अतनु चक्रवर्ती ने बैंक में कुछ ऐसे मामलों का हवाला देते हुए इस्तीफा दे दिया था, जो उनके मूल्यों और नैतिकता के अनुरूप नहीं थे। सूत्रों ने बताया कि बैंक के प्रबंधन और पूर्व चेयरमैन के बीच संबंध बेहतर नहीं थे, जिसकी वजह से उन्होंने अचानक पद छोड़ दिया।

इस मसले पर रिजर्व बैंक ने चिंताएं खारिज करते हुए कहा कि एचडीएफसी बैंक के आचरण या प्रशासन के सिलसिले में चिंता की कोई बड़ी बात नहीं है। बैंक के पास बेहतर पूंजी है। उसकी वित्तीय स्थिति संतोषजनक है और उसके पास पर्याप्त नकदी है। यह भी बताया गया कि बैंक घरेलू तौर पर बैंकिंग प्रणाली के लिहाज से महत्त्वपूर्ण बैंक (डी-एसआईबी) है, जिसकी वित्तीय स्थिति सुदृढ़ है, जिसका पेशेवर रूप से संचालित बोर्ड है और जिसके पास सक्षम प्रबंधन टीम है।

एक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक के वरिष्ठ बैंकर ने कहा कि एचडीएफसी बैंक की घटना के कारण रिजर्व बैंक यह कदम नहीं उठा रहा है। यह मसला कुछ समय से चल रहा है, क्योंकि रिजर्व बैंक को बैंकों से यह फीडबैक मिल रहा है कि हर साल बोर्डों के निरीक्षण के लिए उन्हें अधिक मद जोड़नी पड़ती हैं।

इसी तरह कंपनी अधिनियम और एलओडीआर (लिस्टिंग ऑब्लिगेशन्स ऐंड डिस्क्लोजर रिक्वायरमेंट्स) आवश्यकताओं के तहत अन्य नियामक भी बोर्डों की समीक्षा के लिए आइटम जोड़ते रहते हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे में बैंक के बोर्डों पर अनुपालन का बोझ बढ़ गया है। उन्होंने आगे कहा, ‘नियामकों के समक्ष उठाई गई एक आम चिंता यह है कि बोर्ड के सामने बहुत सारे मामले रखे जाते हैं। इसलिए वह रणनीति पर पर्याप्त ध्यान नहीं दे पाता।

बोर्ड नियामकीय जरूरतें पूरी करने में ही लगे रहते हैं कि क्या प्रस्तुत किया जाना है, किसकी समीक्षा करनी है या किसका अनुमोदन करना है। इनमें से ज्यादातर अनुपालन संबंधी मसले होते हैं।’

उन्होंने कहा कि बोर्डों को अभी इंतजार करना होगा और देखना होगा कि रिजर्व बैंक वास्तव में बोर्ड के दायरे से क्या हटाता है। उसके बगैर स्थिति का आकलन करना संभव नहीं है। लेकिन अगर पर्याप्त राहत मिलती है तो यह फायदेमंद होगा, क्योंकि बोर्डों पर कुल बोझ कुछ हद तक कम हो जाएगा।

रिजर्व बैंक के मुताबिक बैंक बोर्डों के समक्ष रखे जाने वाले मसले रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों के हिसाब से बोर्ड द्वारा ही प्राथमिकता के आधार पर तय किए जाते हैं। बहरहाल रिजर्व बैंक ने कुछ नीतियों और मसलों को बोर्ड के समक्ष मंजूरी के लिए रखना अनिवार्य भी किया है।

इसमें कहा गया है कि बोर्डों को अपने समय का प्रभावी ढंग से उपयोग करने और रणनीति व जोखिम पर अधिक ध्यान देने और गुणात्मक जुड़ाव की सुविधा के लिए उसने ऐसे सभी निर्देशों की व्यापक समीक्षा की है।

First Published : April 8, 2026 | 10:46 PM IST