प्रतीकात्मक तस्वीर
सरकारी प्रतिभूतियों से मिलने वाले ब्याज और पूंजीगत लाभ पर विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) को आयकर से छूट देने के फैसले से ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज के प्रमुख सूचकांक ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में भारतीय सॉवरिन प्रतिभूतियों के शामिल होने की संभावना बढ़ गई है। ब्लूमबर्ग के इस सूचकांक की समीक्षा इस महीने के मध्य में प्रस्तावित है।
इस साल जनवरी में ब्लूमबर्ग सर्विसेज इंडेक्स (बीआईएसएल) ने परिचालन और बाजार बुनियादी ढांचे से जुड़े मुद्दों की और जांच-पड़ताल की जरूरत का हवाला देते हुए भारत के सरकारी बॉन्ड को अपने वैश्विक सूचकांक में शामिल करने का फैसला टाल दिया था।
सूत्रों ने बताया कि बॉन्ड बाजार को सुदृढ़ बनाना सरकार की मुख्य नीतिगत प्राथमिकता बनी हुई है। उन्होंने कहा कि सरकार यह समझती है कि व्यापक और ज्यादा लिक्विड बॉन्ड बाजार के लिए घरेलू बैंकों और बीमा कंपनियों जैसे निवेशक तक सीमित न हों बल्कि उनमें वैश्विक संस्थागत निवेशक भी शामिल हों। ये निवेशक लंबे समय के लिए निवेश करते हैं और ज्यादा जोखिम उठाने की क्षमता रखते हैं। उनके पास बड़ी मात्रा में स्थिर पूंजी उपलब्ध होती है।
हालांकि विदेशी संस्थागत निवेशकों की ब्याज और पूंजीगत प्राप्तियों से होने वाली कमाई पर अभी तक के कर नियमों की वजह से सरकारी बॉन्ड पर कर के बाद मिलने वाला रिटर्न कम हो जाता था। इसकी तुलना अन्य उभरते बाजारों के सरकारी बॉन्ड के रिटर्न से करें तो भारत में प्रभावी रिटर्न कम था। वैसे, कई उभरते बजारों के सरकारी बॉन्ड पहले से ही इस सूचकांक का हिस्सा हैं। इसलिए वैश्विक सॉवरिन प्रतिभूति बाजार में भारत के सरकारी बॉन्ड को सही मायने में प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए संरचनात्मक नुकसान को दूर करना जरूरी था।
बार्कलेज के विश्लेषकों ने कहा कि कर छूट महत्त्वपूर्ण है और इस कदम से भारत की वास्तविक यील्ड में सुधार होगा। बार्कलेज ने एक नोट में कहा, ‘सबसे अहम बात यह है कि इससे बॉन्ड सूचकांक में शामिल होने में आ रही संरचनात्मक बाधा भी दूर होती है। पूर्ण पहुंच मार्ग (एफएआर) के विस्तार और निवेश से जुड़ी पाबंदियों में ढील को सूचकांक प्रदाता सकारात्मक रूप से देख सकते हैं।’
सूत्रों के मुताबिक कर सुधार का मुख्य मकसद भारतीय सरकारी प्रतिभूतियों में विदेशी निवेश के लिए ज्यादा प्रतिस्पर्धी और निवेशक अनुकूल माहौल देना, सॉवरिन बॉन्ड बाजार को मजबूत करना और वैश्विक सूचकांक में शामिल होने के लिए भारत की दावेदारी को मजबूत करना है।
सूचकांक को ट्रैक करने वाले फंड और सक्रिय वैश्विक बॉन्ड निवेशक, निवेश का फैसला लेने से पहले भारत की सरकारी प्रतिभूतियों पर मिलने वाले कर बाद रिटर्न की तुलना दूसरे बाजारों के समान निवेश साधनों से करते हैं। यह छूट वैश्विक निवेशकों के लिए भारत के सॉवरिन बॉन्ड के रिटर्न को ज्यादा आकर्षक बनाएगी, तथा सेकंडरी मार्केट में लिक्विडिटी और मूल्य निर्धारण को बढ़ावा देगी।
आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा, ‘एक अहम बात जिस पर नजर रखनी होगी, वह है ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल किए जाने की संभावित घोषणा। एफपीआई के लिए सरकारी प्रतिभूतियों पर कर हटाए जाने के बाद सूचकांक में शामिल होने की संभावना बेहतर हुई है, जिससे नियमों का पालन करना आसान हो गया है।’
एफएआर के तहत प्रतिभूति की सूची में 15, 30 और 40 साल की परिपक्वता वाले नए सरकारी बॉन्ड को शामिल करने से निवेश की संभावना भी बेहतर हुई है।
भारतीय स्टेट बैंक के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने एक रिपोर्ट में कहा, ‘इससे सरकारी प्रतिभूतियों के लिए एफपीआई की मांग बढ़ेगी, सरकार की उधारी लागत कम होगी और बॉन्ड में बेहतर लिक्विडिटी आएगी, साथ ही रुपये को भी कुछ सहारा मिलेगा। इन उपायों से बड़े वैश्विक बॉन्ड सूचकांक में भारत को शामिल करने का पक्ष और मजबूत हो सकता है।’
सरकार ने बैंक फॉर इंटरनैशनल सेटलमेंट्स को सरकारी प्रतिभूतियों में निवेश से होने वाले ब्याज और पूंजीगत लाभ पर भी कर में छूट दी है। इस साल प्रतिभूति बाजार में विदेशी निवेशकों की भागीदारी में सुधार के संकेत दिखे हैं।
बैंक ऑफ बड़ौदा की अर्थशास्त्री दीपान्विता मजूमदार ने कहा, ‘शुक्रवार को आरबीआई द्वारा रीपो दर को यथावत बनाए रखने से 10 वर्षीय बॉन्ड की यील्ड 7 फीसदी से थोड़ा नीचे आ गई। इसके अलाव विदेशी संस्थागत निवेशकों के ऋण साधनों से होने वाली ब्याज की कमाई पर पूंजीगत लाभ कर और विदहोल्डिंग कर में छूट के उपायों से भी यील्ड पर सकारात्मक असर पड़ा है।’