भारत का सरकारी बॉन्ड यानी जी-सेक (Government Securities) बाजार लगातार बड़ा होता जा रहा है। रिजर्व बैंक (RBI) के आंकड़ों के मुताबिक 8 जून तक यह बाजार करीब 123.5 लाख करोड़ रुपये का हो चुका है। सरकार अपनी ज्यादातर उधारी पहले से ही देश के बैंकों, बीमा कंपनियों, पीएफ और पेंशन फंड जैसे घरेलू निवेशकों के जरिए जुटा लेती है। इसके बावजूद सरकार विदेशी निवेशकों को आकर्षित करने के लिए लगातार कदम उठा रही है। हाल ही में सरकार ने विदेशी निवेशकों को सरकारी बॉन्ड से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर टैक्स छूट देने का फैसला किया है। इसके अलावा, फुली एक्सेसिबल रूट (FAR) के तहत उपलब्ध बॉन्ड की संख्या भी बढ़ाई गई है।
वित्त मंत्रालय की सार्वजनिक ऋण प्रबंधन रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2025 तक सरकारी बॉन्ड के सबसे बड़े खरीदार बैंक थे। कुल बकाया सरकारी सिक्योरिटीज में उनकी हिस्सेदारी 34.31 प्रतिशत थी। इसके बाद बीमा कंपनियों की हिस्सेदारी 25.89 प्रतिशत और आरबीआई की 14.52 प्रतिशत थी। यानी इन तीनों के पास मिलाकर सरकारी बॉन्ड बाजार का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा है। दूसरी तरफ विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की हिस्सेदारी सिर्फ 2.96 प्रतिशत थी, जो काफी कम मानी जाती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकारी बॉन्ड सिर्फ सरकार के लिए उधारी जुटाने का जरिया नहीं हैं, बल्कि पूरे वित्तीय सिस्टम की नींव माने जाते हैं। सरकारी बॉन्ड की यील्ड के आधार पर बैंकों के कर्ज, कॉरपोरेट बॉन्ड और दूसरे वित्तीय उत्पादों की कीमत तय होती है।
ग्लोबल कंसल्टेंसी कंपनी डेक्सियन के इंडिया हेड और वाइस प्रेसिडेंट कुमार राजगोपालन का कहना है, “एक बड़ा और ज्यादा सक्रिय सरकारी बॉन्ड बाजार कीमतों के बेहतर निर्धारण में मदद करता है। इससे पूरी पूंजी बाजार व्यवस्था को फायदा मिलता है।”
उनके मुताबिक भारत को अपने बॉन्ड बाजार को और गहरा, विविध और वैश्विक बनाना होगा। राजगोपालन कहते हैं, “विदेशी निवेशक जोखिम को अलग नजरिए से देखते हैं। उनके निवेश की अवधि और ट्रेडिंग के तरीके भी अलग होते हैं। इससे बाजार में तरलता बढ़ती है और बॉन्ड की कीमतों का बेहतर निर्धारण हो पाता है।”
वित्त मंत्रालय का भी मानना है कि अगर निवेशकों का बेस बड़ा होगा तो बाजार कुछ चुनिंदा घरेलू संस्थानों पर कम निर्भर रहेगा और किसी भी झटके को बेहतर तरीके से झेल पाएगा।
प्राइस वाटरहाउस एंड कंपनी एलएलपी के पार्टनर नेहल संपत कहते हैं, “डेट मार्केट में ज्यादा विदेशी निवेश आने से सरकार की उधारी लागत कम हो सकती है। इसके अलावा, इक्विटी बाजार से पैसा निकलने की स्थिति में संतुलन बनाने, रुपये पर दबाव कम करने और डेट मार्केट को मजबूत करने में भी मदद मिल सकती है।”
विदेशी निवेश बढ़ाने की रणनीति का एक बड़ा हिस्सा भारत के सरकारी बॉन्ड को दुनिया के प्रमुख बॉन्ड इंडेक्स में शामिल कराना भी है। भारतीय सरकारी बॉन्ड 2024 में जेपी मॉर्गन के गवर्नमेंट बॉन्ड इंडेक्स-इमर्जिंग मार्केट्स में शामिल हो चुके हैं। इसके बाद इन्हें एफटीएसई रसेल के इमर्जिंग मार्केट्स गवर्नमेंट बॉन्ड इंडेक्स में भी जगह मिली।
अब सरकार और नियामक ब्लूमबर्ग ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल होने की कोशिश कर रहे हैं। बाजार के जानकारों का अनुमान है कि अगर भारत इस इंडेक्स में शामिल हो जाता है तो करीब 25 अरब डॉलर का विदेशी निवेश देश में आ सकता है।
हालिया आंकड़े बताते हैं कि सरकार के नए कदमों का असर भी दिखने लगा है। क्लियरिंग कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (CCIL) के मुताबिक FAR के तहत विदेशी निवेशकों की सरकारी बॉन्ड में हिस्सेदारी 3 जून के 3.23 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 10 जून तक 3.32 लाख करोड़ रुपये हो गई। यानी सिर्फ एक हफ्ते में करीब 8,795 करोड़ रुपये का इजाफा हुआ।
विशेषज्ञों के मुताबिक विदेशी निवेशकों के लिए सबसे बड़ी चिंता मुद्रा जोखिम यानी करेंसी रिस्क है। विदेशी निवेशक अपने रिटर्न को डॉलर, यूरो या येन जैसी मुद्राओं में मापते हैं। ऐसे में अगर भारतीय रुपया कमजोर हो जाए तो बॉन्ड से मिलने वाला अच्छा रिटर्न भी कम पड़ सकता है।
कुमार राजगोपालन कहते हैं, “विदेशी निवेशक आज भी अपनी कमाई को डॉलर, यूरो या येन के हिसाब से देखते हैं। इसलिए भारतीय बॉन्ड का आकर्षक रिटर्न भी रुपये में उतार-चढ़ाव के कारण प्रभावित हो सकता है।”
पिछले एक साल में रुपये पर दबाव बढ़ा है। 20 मई को रुपया डॉलर के मुकाबले 96.86 के रिकॉर्ड निचले स्तर तक पहुंच गया था। बाद में इसमें कुछ सुधार हुआ और 10 जून को यह 95.27 प्रति डॉलर पर बंद हुआ। ऐसे में विदेशी निवेशकों के लिए मुद्रा जोखिम एक बड़ी चिंता बनी हुई है।
नेहल संपत का कहना है कि विदेशी निवेशकों के लिए लंबे समय से दो बड़ी समस्याएं थीं- विदेशी निवेश पर सीमाएं और टैक्स का बोझ। हाल तक विदेशी निवेशकों को सरकारी बॉन्ड से मिलने वाले ब्याज पर 20 प्रतिशत विदहोल्डिंग टैक्स देना पड़ता था। इसके अलावा, शॉर्ट टर्म कैपिटल गेन पर 30 प्रतिशत और लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर 12.5 प्रतिशत टैक्स लगता था।
संपत कहते हैं, “डेट सिक्योरिटीज पर मिलने वाला रिटर्न पहले ही अपेक्षाकृत कम होता है। ऐसे में अतिरिक्त टैक्स निवेशकों के लिए चुनौती को और बढ़ा देता था।” इसी वजह से सरकार ने हाल ही में टैक्स छूट देकर विदेशी निवेशकों के लिए निवेश को ज्यादा आकर्षक बनाने की कोशिश की है।
सिर्फ टैक्स ही नहीं, बल्कि बाजार से जुड़ी कुछ तकनीकी प्रक्रियाएं भी विदेशी निवेशकों के लिए परेशानी का कारण थीं। इसी साल ब्लूमबर्ग इंडेक्स सर्विसेज ने भारतीय बॉन्ड को अपने ग्लोबल एग्रीगेट इंडेक्स में शामिल करने का फैसला टाल दिया था। कंपनी ने सेटलमेंट प्रक्रिया, रजिस्ट्रेशन नियम, टैक्स से जुड़ी बाद की प्रक्रियाओं और बाजार के बुनियादी ढांचे को लेकर कुछ चिंताएं जताई थीं।
हालांकि, वैश्विक निवेश बैंक बार्कलेज का मानना है कि हालिया टैक्स सुधारों से भारतीय बॉन्ड की आकर्षकता बढ़ी है और ग्लोबल इंडेक्स में शामिल होने की राह आसान हुई है। वहीं एसबीआई के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि इन सुधारों से सरकारी बॉन्ड की मांग बढ़ सकती है, लंबी अवधि वाले बॉन्ड में तरलता सुधर सकती है और समय के साथ सरकार की उधारी लागत भी कम हो सकती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अपने सरकारी बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों का दबदबा नहीं चाहिए। देश के पास पहले से मजबूत घरेलू निवेशक आधार मौजूद है। जरूरत सिर्फ इतनी है कि बाजार में निवेशकों की विविधता बढ़े और बाजार ज्यादा सक्रिय और कुशल बने।
कुमार राजगोपालन का मानना है कि अगले 10 वर्षों में अगर सरकारी बॉन्ड बाजार में विदेशी निवेशकों की हिस्सेदारी 8 से 15 प्रतिशत के बीच पहुंचती है तो यह भारत के लिए एक संतुलित और बेहतर स्थिति होगी। उनके मुताबिक इससे बाजार को विदेशी निवेश का फायदा भी मिलेगा और घरेलू संस्थानों की मजबूत भूमिका भी बनी रहेगी।