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Kanwar Yatra 2024: कांवड़ यात्रा का क्या महत्व है, किन रास्तों से भक्त करते हैं यात्रा? जानें हर बात

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कांवड़ यात्रा भगवान शिव की आराधना करने के लिए की जाती है। यह एक बहुत बड़ा विश्वास और भक्ति का कार्य है, जो भक्तों और भगवान शिव के बीच के मजबूत रिश्ते को दिखाता है।

Last Updated- July 24, 2024 | 4:41 PM IST
Kanwar Yatra 2024

हर साल होने वाली कांवड़ यात्रा इस साल शुरू होने से पहले ही विवादों में घिर गई। उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों ने रेस्तरां वालों को उनके नाम दुकान पर लगाने का आदेश दिया था, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी।

कांवड़ यात्रा क्या है?

कांवड़ यात्रा हिंदू कैलेंडर के सावन महीने में मनाई जाती है। यह एक बहुत पुरानी परंपरा है, जिसमें शिव भक्त पैदल चलकर गंगा नदी के किनारे स्थित धार्मिक स्थलों पर जाते हैं और वहां से पवित्र गंगा जल लेकर आते हैं। इस जल को फिर शिवलिंग पर चढ़ाया जाता है।

हिंदू धर्म के अनुसार, भगवान शिव के भक्त भगवान परशुराम ने सबसे पहले सावन के महीने में कांवड़ यात्रा की थी। मान्यता है कि उन्होंने गंगा जल शिवलिंग पर चढ़ाया था। तब से ही शिव भक्त यह परंपरा निभा रहे हैं। कांवड़ यात्रा में सिर्फ पुरुष ही नहीं, बल्कि महिलाएं भी शामिल होती हैं।

कांवड़ यात्रा भगवान शिव की आराधना करने के लिए की जाती है। यह एक बहुत बड़ा विश्वास और भक्ति का कार्य है, जो भक्तों और भगवान शिव के बीच के मजबूत रिश्ते को दिखाता है। यात्रा के दौरान, कांवड़िए बांस से बनी एक लाठी लेकर चलते हैं, जिसके दोनों सिरों पर जल लेने के लिए घड़े बंधे होते हैं। गंगा जल भरने से पहले, वे गंगा में डुबकी भी लगाते हैं।

कांवड़िए आमतौर पर पैदल चलते हैं, कुछ तो पैरों में जूते भी नहीं पहनते। वे मानते हैं कि घड़े (कांवड़) को जमीन नहीं छूना चाहिए और धूल से दूषित नहीं होना चाहिए, क्योंकि इससे पवित्र पानी दूषित हो सकता है।

कांवड़ियों में एक खास समूह होता है, जिन्हें दक कांवड़िए कहा जाता है। ये लोग गंगा जल को अपने घर ले जाते हैं और अपने स्थानीय मंदिरों में शिवलिंग पर चढ़ाते हैं। सभी कांवड़िए पूरे सावन महीने में मांस नहीं खाते।

इस यात्रा से बहुत सारे लोगों को फायदा होता है। हजारों की संख्या में ढाबे, कपड़े बेचने वाले, फल बेचने वाले, कांवड़ बेचने वाले और दूसरे दुकानदारों को हर साल इस यात्रा से फायदा होता है। साल 2023 में, सिर्फ हरिद्वार से ही 4.07 करोड़ कांवड़िए, जिनमें से 21 लाख महिलाएं थीं, गंगा जल ले गए थे।

कांवड़ यात्रा: रूट और गाइडलाइन

कांवड़ यात्रा के चार मुख्य रास्ते हैं: हरिद्वार, गंगोत्री, गौमुख और सुल्तानगंज से देवघर। हरिद्वार वाला रास्ता सबसे ज्यादा लोकप्रिय है, जहां भक्त हरिद्वार से ऋषिकेश के नीलकंठ महादेव मंदिर या उत्तर प्रदेश के बागपत के पुरा महादेव मंदिर जाते हैं।

कुछ भक्त गंगा के उद्गम स्थल गौमुख से अपनी यात्रा शुरू करते हैं और अपनी-अपनी मंजिल तक जाते हैं। एक और महत्वपूर्ण रास्ता गंगोत्री है, जहां भक्त गंगाजल को काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी या झारखंड के बैद्यनाथ धाम ले जाते हैं। इन रास्तों के अलावा, कुछ भक्त सुल्तानगंज से गंगा का पानी लेकर देवघर के बैद्यनाथ मंदिर जाते हैं। हालांकि, कांवड़ियों के लिए कई और रास्ते भी हैं।

सरकारी दिशा-निर्देशों के अनुसार, तीर्थयात्रियों को समूह में यात्रा करनी चाहिए और एकांत जगहों से बचना चाहिए। उन्हें शिष्टाचार बनाए रखना चाहिए और किसी भी तरह के गलत व्यवहार से बचना चाहिए। साथ ही, उन्हें कूड़ा-कचरा न फैलाने और कचरे को सही जगह डालना चाहिए।

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First Published - July 24, 2024 | 4:41 PM IST

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