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शबरीमला पर केंद्र की बड़ी दलील, क्या बदलेगा नियम?

केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि मंदिरों में प्रवेश प्रतिबंध केवल महिलाओं तक सीमित नहीं होते

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भाविनी मिश्रा   
Last Updated- April 10, 2026 | 8:39 AM IST

केंद्र सरकार ने गुरुवार को उच्चतम न्यायालय से कहा कि मंदिरों में प्रवेश पर प्रतिबंध हमेशा महिलाओं के खिलाफ नहीं होते। सरकार ने ऐसे उदाहरण गिनाए जहां पुरुषों को भी प्रवेश नहीं मिलता। केंद्र का तर्क था कि शबरीमला मंदिर में लागू प्रतिबंध को केवल लैंगिक दृष्टि से नहीं देखा जाना चाहिए।

केंद्र की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि 2018 के फैसले, जिसमें शबरीमला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश की अनुमति दी गई थी, का आधार ‘लैंगिक पदानुक्रम’ की धारणा रही। उन्होंने कहा, ‘मैंने ऐसे मंदिरों के उदाहरण दिए हैं जहां पुरुषों को प्रवेश नहीं मिलता। देवी भगवती के मंदिरों में आस्था और परंपराओं के आधार पर कुछ व्यवस्थाएं हैं। ऐसे मंदिर भी हैं जहां पुरुष पुजारियों पर महिला श्रद्धालुओं के चरण धोने का धार्मिक दायित्व है।

देश के एकमात्र ब्रह्मा मंदिर पुष्कर ब्राह्मा मंदिर में विवाहित पुरुषों के प्रवेश पर रोक है। केरल में एक ऐसा मंदिर भी है, जहां पुरुष महिलाओं के वेश में जाते हैं। वे ब्यूटी पार्लर जाकर साड़ी पहनते हैं और परिवार की महिलाएं उन्हें तैयार करती हैं। वहां केवल पुरुष ही जाते हैं। इसलिए इसे पुरुष केंद्रित या महिला केंद्रित आस्था का प्रश्न नहीं कहा जा सकता। इस मामले में यह परंपरा महिला केंद्रित है।’

ये दलीलें नौ न्यायाधीशों की संविधान पीठ के समक्ष दी गईं, जिसकी अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत कर रहे थे। यह पीठ धार्मिक स्वतंत्रताओं से जुड़े व्यापक संवैधानिक प्रश्नों पर विचार कर रही है। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने पूजा स्थलों में खुलेपन के महत्त्व पर जोर दिया। उन्होंने कहा, ‘यदि कोई कहे कि यह मेरी धार्मिक प्रथा है और केवल मेरा ही संप्रदाय मंदिर में आए, अन्य कोई नहीं तो यह हिंदू धर्म के लिए अच्छा नहीं है।’

First Published : April 10, 2026 | 8:39 AM IST