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मकान मालिक नहीं करा रहा जर्जर घर की मरम्मत? जानें क्या है इसको लेकर कानूनी प्रक्रिया व आपके अधिकार

इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक फैसले के अनुसार जर्जर मकानों में सुरक्षा सर्वोपरि है, लेकिन मकान मालिक को घर रहने लायक और सुरक्षित बनाकर देना ही होगा

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अमित कुमार   
Last Updated- March 29, 2026 | 7:39 PM IST

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने हाल ही में वाराणसी के एक जर्जर मकान से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब बात जन सुरक्षा की हो, तो किराएदारी के अधिकारों के मुकाबले लोगों की जान बचाना ज्यादा जरूरी है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि किराएदार के पास कोई अधिकार नहीं हैं। कोर्ट ने दोहराया कि मकान मालिक की यह जिम्मेदारी है कि वह किराएदार को रहने लायक सुरक्षित घर मुहैया कराए।

मरम्मत की जिम्मेदारी किसकी?

भारत में किराएदारी कानून (Tenancy Law) बहुत स्पष्ट है। घर की मजबूती (स्ट्रक्चरल सेफ्टी), बिजली के फॉल्ट, और प्लंबिंग जैसी बड़ी समस्याओं को ठीक कराना मकान मालिक का काम है। चैंबर्स ऑफ भारत चुघ के पार्टनर मयंक अरोड़ा बताते हैं कि मकान मालिक अनुबंध (Contract) की अस्पष्ट शर्तों की आड़ लेकर इन जरूरी जिम्मेदारियों से पल्ला नहीं झाड़ सकते। वहीं, घर की छोटी-मोटी टूट-फूट की जिम्मेदारी किराएदार की होती है।

जब मकान मालिक बात न माने

अगर मकान मालिक जरूरी मरम्मत कराने से मना कर दे, तो किराएदार खुद काम करवा सकता है, लेकिन इसके लिए कानून के बताए रास्ते पर चलना जरूरी है। एकॉर्ड जूरिस के मैनेजिंग पार्टनर अलेय रिज़वी के मुताबिक, किराएदार मरम्मत पर खर्च किए गए पैसे की कटौती तभी कर सकता है जब समस्या घर में रहने की सुविधा को प्रभावित कर रही हो और मकान मालिक ने लिखित अनुरोध को नजरअंदाज कर दिया हो।

गांधी लॉ एसोसिएट्स के पार्टनर राहील पटेल आगाह करते हैं कि अपनी मर्जी से किराए में कटौती करना जोखिम भरा हो सकता है। इसे कानूनन ‘किराया न देना’ माना जा सकता है और किराएदार को घर खाली करना पड़ सकता है।

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कानूनी प्रक्रिया अपनाना जरूरी

विवादों से बचने के लिए एक्सपर्ट्स ने कुछ कदम सुझाए हैं:

  • लिखित नोटिस: सबसे पहले मकान मालिक को लिखित में सूचना दें और 7 से 30 दिन का समय दें।
  • जरूरी काम ही कराएं: केवल वही मरम्मत कराएं जो घर को रहने लायक बनाने के लिए जरूरी हों। सजावट या कॉस्मेटिक बदलावों के पैसे नहीं मांगे जा सकते।
  • सबूत संभाल कर रखें: मरम्मत के बिल, फोटो और एस्टिमेट की कॉपी सुरक्षित रखें।
  • किराया न रोकें: पूरा किराया बंद करने के बजाय, कोर्ट या नियमों के अनुसार किराए में आनुपातिक बदलाव की मांग करें।

किराएदार कहां करते हैं गलती?

लेगम सोलिस के संस्थापक शशांक अग्रवाल कहते हैं कि अक्सर किराएदार सिर्फ मौखिक बात करते हैं और खर्चों का कोई ठोस सबूत नहीं रखते। दिल्ली हाई कोर्ट की एडवोकेट प्राची दुबे के अनुसार, बिना अनुमति के घर में बदलाव करना या किराया पूरी तरह रोक देना भारी पड़ सकता है। वहीं, व्हाट्सएप जैसे अनौपचारिक संदेशों के बजाय औपचारिक नोटिस देना कानूनी रूप से ज्यादा मजबूत होता है।

First Published : March 29, 2026 | 7:12 PM IST