facebookmetapixel
Advertisement
राज्य की प्रतिक्रिया और अभिव्यक्ति की सीमाएं testtestभारत का डिफेंस प्रोडक्शन ऑल-टाइम हाई पर, FY26 में15.6% बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ पर पहुंचाHCL Tech के नतीजों की तारीख तय, 13 जुलाई को आएगा रिपोर्ट कार्ड; डिविडेंड पर भी होगा फैसलारिटर्न कहीं और, निवेश कहीं और! क्या सही फंड चुन रहे हैं निवेशक? एक्सपर्ट से समझेंAI के दम पर नई छलांग की तैयारी में Coforge? शेयर में 50% तक तेजी की उम्मीद, एक्सपर्ट्स बुलिशकच्चा तेल सस्ता हो रहा है, फिर पेट्रोल-डीजल क्यों नहीं?20 लाख रुपये से ज्यादा पैकेज वाली नौकरियों में उछाल, ब्रोकरेज ने बताए 4 पसंदीदा IT स्टॉक्सJio IPO का इंतजार खत्म! ₹4 अरब के मेगा IPO की तैयारी तेज, जल्द दाखिल होंगे ड्राफ्ट पेपरसरकार के आदेश के खिलाफ Telegram का पलटवार, Delhi HC पहुंची याचिकाब्राजील में पेट्रोल से 70% सस्ता, भारत में सिर्फ 20%: क्या फ्लेक्स-फ्यूल बनेगा हिट? बता रहे एक्सपर्ट

सरकारी बैंकों में प्रमोशन की उलझन: नियमों के आगे बेबस होती प्रतिभा

Advertisement

एक अधिकारी की कहानी जो प्रेरणा बन सकती थी, पर बन गई चेतावनी

Last Updated- April 17, 2025 | 10:57 PM IST
Bank Nifty strategy today

मार्च का महीना सूचीबद्ध बैंकों के कर्मचारियों के लिए मुश्किल महीना होता है क्योंकि नियामक और निवेशक दोनों उनकी बैलेंसशीट पर कड़ी नजर रखते हैं, मसलन बैंक की ऋण परिसंपत्ति में कितनी वृद्धि हुई और मौजूदा संदर्भ में जमा पोर्टफोलियो कैसा रहा है। मुनाफा, परिसंपत्ति की गुणवत्ता और अन्य व्यावसायिक मापदंड जैसे कि शुद्ध ब्याज मार्जिन और शुल्क आय आदि भी जांच के दायरे में होते हैं।

मार्च का महीना बैंकरों के लिए पदोन्नति का समय होने की वजह से भी महत्त्वपूर्ण होता है। आमतौर पर पदोन्नति के लिए साक्षात्कार मार्च महीने के मध्य में होते हैं और महीने के अंत तक परिणाम आ जाते हैं। मैं यहां सरकारी बैंकरों की बात कर रहा हूं। सामान्य परिस्थितियों में पदोन्नति के साक्षात्कार में चार लोगों का एक पैनल होता है जिसमें बैंक के प्रबंध निदेशक, भारतीय रिजर्व बैंक का एक नामित व्यक्ति, बैंक के बोर्ड में सरकार का एक नामित व्यक्ति और एक बाहरी विशेषज्ञ होते हैं जो उम्मीदवारों से सवाल-जवाब करते हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के एक बड़े बैंक के कर्मचारियों ने हाल ही में सहायक महाप्रबंधकों से उप महाप्रबंधकों के पद पर पदोन्नति प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर चिंता जताई है, क्योंकि कुछ अधिकारियों को खराब प्रदर्शन के गंभीर आरोपों के बावजूद पदोन्नत किया गया था। यह खबर, बैंकिंग मुद्दों पर केंद्रित समाचार पोर्टल ने दी है। एक अधिकारी द्वारा आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी में भी खुलासा हुआ कि पदोन्नति प्रक्रिया में खामियां हैं।

इस तरह की खबरें पदोन्नति के लिए अपनाए गए मानकों और निर्णय लेने की प्रक्रिया पर सवाल खड़े करती हैं। समाचार पोर्टल की रिपोर्ट के मुताबिक पदोन्नत हुए कुछ अधिकारियों के ऊपर मुकदमे किए गए हैं, उनकी छवि खराब है या उनका पिछला प्रदर्शन खराब रहा है।

अब मैं आपको एक अन्य बड़े सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक में मुख्य महाप्रबंधक (सीजीएम) के पद की पदोन्नति के दावेदार रहे एक महाप्रबंधक के बारे में बताता हूं। हाल तक, केवल भारतीय स्टेट बैंक में ही यह पद था लेकिन अब सभी सरकारी बैंकों में सीजीएम होते हैं। हालांकि उनकी संख्या बैंक के आकार पर निर्भर करती है।

मैं जिस सज्जन की बात कर रहा हूं वह 54 वर्ष की आयु में महाप्रबंधक के रूप में पदोन्नत हुए थे। मार्च 2022 में उन्हें उत्तरी भारत में एक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक (आरआरबी) का अध्यक्ष नियुक्त किया गया था। यह एक बड़ा आरआरबी था जिसकी परिसंपत्ति 37,000 करोड़ रुपये थी और कुल कारोबार 60,000 करोड़ रुपये था। इस आरआरबी की 1,400 शाखाएं, 22 क्षेत्रीय कार्यालय और कम से कम 2 करोड़ ग्राहक थे। उन्हें आरआरबी का अध्यक्ष इसलिए बनाया गया क्योंकि वे अपने काम में अच्छे थे और उनका करियर बेदाग था।

हालांकि कई अन्य महाप्रबंधक भी इस भूमिका के योग्य थे लेकिन कई लोग आरआरबी में जाने के लिए उतने उत्साहित नहीं होते हैं। हालांकि इस सज्जन ने बड़े अधिकारियों के आदेश का पालन किया। वह अपने पूरे परिवार के साथ उत्तर भारत में स्थानांतरित हो गए। उस वर्ष आरआरबी ने 67 करोड़ रुपये का शुद्ध मुनाफा दर्ज किया जो इसके पिछले वर्ष से 21 फीसदी अधिक था। इसकी जमाओं में 8 फीसदी और ऋण में 10 फीसदी की वृद्धि हुई। शुद्ध फंसे कर्ज 7.53 फीसदी से घटकर 6.07 फीसदी हो गए।

लेकिन उनके एक वर्ष के कार्यकाल में कुछ ऐसा हुआ जिसकी कीमत वह महाप्रबंधक अब तक चुका रहे हैं। आगे पदोन्नति में उन्हें नजरअंदाज किया गया। आखिर क्यों? ऐसा सिर्फ 8.45 मिनट का एक वीडियो 6.75 लाख रुपये की लागत से बनाने की खातिर हुआ। इसमें 18 फीसदी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) जोड़ने पर बैंक के लिए वीडियो की लागत करीब 8 लाख रुपये थी।

हुआ कुछ यूं कि आरआरबी का नियामक, राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक (नाबार्ड) वीडियो के जरिये ‘वित्तीय समावेशन में प्रगति के लिए डिजिटल नवाचार’ को दर्शाना चाहता था जिसे जनवरी 2023 में कोलकाता में जी20 के वित्तीय समावेशन से जुड़ी वैश्विक भागीदारी की पहली बैठक में दिखाया जाना था। इस वीडियो को जी20 शिखर सम्मेलन में शिरकत कर रहे अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधिमंडल के सामने दिखाया जाना था जिसमें ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ की उपलब्धियों और ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं की प्रगति को भी दिखाना था।

आखिर नाबार्ड ने इस काम के लिए इसी आरआरबी को क्यों चुना? असल में, इस वीडियो के शूट किए जाने से कई महीने पहले उस सज्जन ने सितंबर 2022 में पुणे के कॉन्क्लेव में एक शोध पत्र की प्रस्तुति दी जिससे सभी प्रभावित हुए और इसमें आरआरबी के सभी प्रमुख, प्रायोजक बैंकों के शीर्ष प्रबंधन के लोग और वित्त मंत्रालय के अधिकारियों ने भी हिस्सा लिया था। अक्टूबर में इस सज्जन को इंडियन बैंक्स एसोसिएशन ने आरआरबी के लिए पांच वर्षीय योजना का मसौदा तैयार करने वाली पांच सदस्यीय समिति का सदस्य बनाया। दिसंबर में आरआरबी के लिए आईटी मंच को मजबूत करने से जुड़ी एक अन्य समिति में भी इन्हें सदस्य बनाया गया।

इस आरआरबी को नाबार्ड से दिसंबर 2022 के तीसरे हफ्ते में एक ईमेल मिला जिसमें इस तरह का वीडियो तैयार करने की बात थी। इस वीडियो को 1 जनवरी तक तैयार कर लेना था और इसे 9-11 जनवरी 2023 को कोलकाता में जी20 की बैठक में दिखाना था। समय कम था और वीडियो को दिखाने से पहले नाबार्ड, वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग की मंजूरी भी चाहिए थी।

आरआरबी ने मुंबई की तीन एजेंसियों से बात की और आखिर में एक एजेंसी को चुना। आरआरबी ने एजेंसी से फीस भी कम कराई। नाबार्ड और वित्त मंत्रालय दोनों को यह फिल्म पसंद आई। इसे बिना किसी एडिटिंग के जी20 की बैठक में दिखाया गया। नाबार्ड ने उस सज्जन की तारीफ करते हुए पत्र भी भेजा। लेकिन बात यहीं खत्म नहीं हुई।

इसके बाद विजिलेंस की जांच शुरू हुई कि आखिर उस सज्जन ने सरकारी बैंक के निविदा नियमों का पालन क्यों नहीं किया? उन्होंने इस फिल्म के लिए स्थानीय एजेंसी के बजाय मुंबई की एजेंसी क्यों चुनी? आरआरबी को फिल्म पर इतने पैसे खर्च करने की क्या जरूरत थी? आदर्श तरीका तो यह था कि बैंक एक निविदा जारी करता और 21 दिनों तक इंतजार करता और फिर सबसे कम बोली लगाने वाले का चयन किया जाता। लेकिन कम समय और बोर्ड को सूचना दिए जाने के दिशानिर्देशों के अभाव का कोई तर्क कारगर नहीं रहा।

उस सज्जन के खिलाफ जनवरी 2023 में शिकायत दर्ज की गई। यह मामला अब भी चल रहा है। बेहतर प्रदर्शन के बाद भी उनकी पदोन्नति नहीं हो सकी। इस कहानी का सबक यही है कि बैंक के नियमों का अनुसरण करें कोई नई पहल करने की कोशिश न करें। इस तरह की सतर्कता की बेडि़यों के साथ सरकारी बैंक भला कभी निजी बैंकों से प्रतिस्पर्द्धा कर पाएंगे?

Advertisement
First Published - April 17, 2025 | 10:57 PM IST

संबंधित पोस्ट

Advertisement
Advertisement
Advertisement