राजनीति

ममता के खास सिपहसालार से भाजपा के CM तक: जानें शुभेंदु अधिकारी के प्रचंड सियासी उत्थान की कहानी

ममता बनर्जी के पूर्व सहयोगी शुभेंदु अधिकारी ने भवानीपुर में दीदी को हराकर और हिंदुत्व कार्ड खेलकर बंगाल की सत्ता पर भाजपा का परचम लहराया है

Published by
ईशिता आयान दत्त   
Last Updated- May 08, 2026 | 9:39 PM IST

वर्ष 2021 में पश्चिम बंगाल विधान सभा चुनाव में ममता बनर्जी ने ऐसा राजनीतिक दांव खेला जो उनकी पार्टी के कई लोगों की नजर में एक बड़ा जोखिम था। ममता ने भवानीपुर जैसी सुरक्षित सीट छोड़ कर अपने सहयोगी से कट्टर विरोधी बने शुभेंदु अधिकारी को चुनौती देने का फैसला कर लिया और नंदीग्राम से चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। पश्चिम बंगाल की राजनीति में थोड़ी सी भी दिलचस्पी रखने वाले लोगों के लिए नंदीग्राम कोई अनजाना नाम नहीं है। यह वही जगह है जहां से जमीन अधिग्रहण के खिलाफ आंदोलन शुरू हुआ था और जिसने ममता बनर्जी को राज्य की सत्ता के शीर्ष पर बैठाया था।

ममता का राजनीतिक दांव वाकई दमदार था मगर नतीजा निराशाजनक रहा। वह मात्र 1,956 वोटों के मामूली अंतर से हार गईं। हालांकि, उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को पश्चिम बंगाल में जबरदस्त जीत हासिल हुई थी। अब पांच साल बाद अधिकारी ने भी वही किया जो ममता ने किया था। उन्होंने ममता के खिलाफ भवानीपुर से अपनी किस्मत आजमाने का ऐलान कर दिया।  यह विधान सभा क्षेत्र ममता का गढ़ था।

जो नतीजा आया उसने सियासी हलचल मचा दी। अधिकारी ने भवनीपुर में ममता को 15,105 मतों से शिकस्त देकर एक दिग्गज नेता के रूप में अपनी छवि मजबूत कर ली। इस चुनाव में न केवल अधिकारी ने ममता को हराया बल्कि राज्य की सत्ता की कमान भी अपने काबू में कर ली।

4 मई की देर रात भवानीपुर के नतीजे घोषित होने के बाद अधिकारी ने अपनी जीत का प्रमाण पत्र लहराते हुए जनादेश को ‘हिंदुत्व की जीत’ बताया। उन्होंने कहा,‘सभी मुसलमानों ने ममता को वोट दिया।’अधिकारी नंदीग्राम में भी जीत गए मगर जीत का अंतर 9,665 वोट ही रहा। जब अधिकारी से पूछा गया कि भवानीपुर की तुलना में नंदीग्राम में जीत का अंतर कम क्यों था तो उन्होंने निर्वाचन क्षेत्र की अधिक मुस्लिम आबादी का हवाला दिया।

पिछले पांच वर्षों में विपक्ष के नेता रहे अधिकारी पश्चिम बंगाल में भाजपा की हिंदुत्व राजनीति के सबसे मुखर चेहरे के रूप में उभरे थे। अधिकारी 19 दिसंबर 2020 को राज्य विधान सभा चुनाव से ठीक पहले पश्चिम मेदिनीपुर में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की उपस्थिति में एक रैली में औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल हुए। उस समय तृणमूल के कई विधान सभा सदस्यों ने पाला बदला था और भाजपा का दामन थाम लिया था मगर अधिकारी का दल-बदल बंगाल में भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में सामने आया।

अधिकारी ने कांग्रेस का दामन थाम कर राजनीति में कदम रखा और फिर तृणमूल कांग्रेस के गठन के कुछ ही वर्षों के भीतर उसमें शामिल हो गए। उनका राजनीतिक उदय कई मायनों में तृणमूल कांग्रेस के उदय का प्रतिबिंब था जो इंडोनेशिया स्थित सलीम समूह की प्रस्तावित रसायन केंद्र परियोजना के खिलाफ नंदीग्राम भूमि आंदोलन की उथल-पुथल में आकार लिया था।

कई लोग उन्हें भूमि उच्छेद प्रतिरोध समिति (बीयूपीसी) के पीछे प्रेरक शक्ति के रूप में याद करते हैं। अगर ममता आंदोलन का चेहरा थीं तो अधिकारी को व्यापक रूप से आंदोलन का जमीनी स्तर का प्रतिनिधि माना जाता था। यह आंदोलन 2007 में उस समय एक खूनी मोड़ पर पहुंच गया जब हिंसक प्रदर्शनों के दौरान पुलिस की गोलीबारी में 14 लोग मारे गए। यह एक ऐसी घटना जिसने पश्चिम बंगाल की राजनीति की दिशा बदल दी और तृणमूल के सत्ता में आने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। इसके साथ ही पश्चिम बंगाल में 34 साल के वाम मोर्चा के शासन का अंत हुआ।

सोमवार को नंदीग्राम में मिली जीत इस निर्वाचन क्षेत्र से उनकी लगातार तीसरी जीत थी। उन्होंने 2016 और 2021 में भी इस सीट से जीत हासिल की थी। इससे पहले वह तमलुक लोक सभा सीट का लगातार दो बार संसद में प्रतिनिधित्व कर चुके थे जिसमें नंदीग्राम विधान सभा क्षेत्र भी शामिल है।

हालांकि, अधिकारी परिवार का प्रभाव नंदीग्राम तक ही सीमित नहीं था बल्कि उनका दबदबा पूर्वी मेदिनीपुर, पश्चिम मेदिनीपुर, पुरुलिया और बांकुरा तक फैला था।

उनके पिता शिशिर अधिकारी मनमोहन सिंह सरकार में ग्रामीण विकास राज्य मंत्री रह चुके थे। वर्ष  2009 से वह तृणमूल की तरफ से कांथी लोक सभा सीट का प्रतिनिधित्व कर रहे थे और बाद में भाजपा में शामिल हो गए।

अधिकारी (शुभेंदु) के भाई दिव्येंदु और सोमेंदु अधिकारी भी तृणमूल छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। दिव्येंदु विधान सभा में भाजपा के सदस्य हैं जबकि सोमेंदु लोक सभा में भाजपा के सदस्य हैं। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि जब तक अधिकारी तृणमूल में रहे तब तक उनका प्रभाव निर्णायक रूप से पार्टी के पक्ष में रहा। पश्चिम बंगाल के राजनीतिक हलकों में यह व्यापक रूप से माना जाता था कि ममता के बाद अधिकारी शायद पार्टी के एकमात्र ऐसे नेता थे जिन्हें जनता का महत्त्वपूर्ण समर्थन हासिल था।

First Published : May 8, 2026 | 9:36 PM IST