राजनीति

विधानसभा चुनाव नतीजों में बदलाव की लहर: बंगाल-तमिलनाडु-केरल में सत्ता परिवर्तन, असम-पुदुच्चेरी में NDA बरकरार

पांच राज्यों के विधान सभा चुनावों में से तीन के नतीजों से साफ तौर पर पता चलता है कि मतदाताओं ने मौजूदा सरकारों को पूरी तरह नकार दिया

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अर्चिस मोहन   
संजीब मुखर्जी   
Last Updated- May 04, 2026 | 11:05 PM IST

अप्रैल में हुए 5 विधान सभा चुनावों के आज आए नतीजों से मतदाताओं में बदलाव की चाहत साफ तौर पर दिखी। मतदाताओं ने 3 राज्यों- पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और केरल में मौजूदा सरकारों को पूरी तरह नकार दिया। इनमें से किसी भी राज्य में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) सत्ता में नहीं था। वहीं राजग शासित असम और केंद्र शासित प्रदेश पुदुच्चेरी में मतदाताओं ने मौजूदा सरकारों पर अपना भरोसा बनाए रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाजपा मुख्यालय में अपने भाषण में इन चुनावी नतीजों का श्रेय लोकतंत्र और काम की राजनीति में लोगों के विश्वास को दिया।

बंगाल के मतदाताओं ने तृणमूल कांग्रेस के 15 साल लंबे शासन को समाप्त कर दिया। पार्टी की जुझारू नेता और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी अपनी भवानीपुर सीट पर भाजपा के शुभेंदु अधिकारी के हाथों 15,000 से अ​धिक वोटों से हार गईं। भाजपा ने बंगाल में ऐतिहासिक जीत दर्ज करते हुए पूर्वी भारत में अपनी स्थिति को और मजबूत किया है। उसने असम में भी अब तक के अपने सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के साथ लगातार तीसरी बार जीत दर्ज की है। भाजपा के नेतृत्व वाला राजग पुदुच्चेरी में भी सत्ता बरकरार रखने में कामयाब रहा।

अगर बंगाल में मतदाताओं ने 71 वर्षीय मुख्यमंत्री को नकार दिया तो तमिलनाडु में बदलाव की चाहत का नतीजा यह हुआ कि अभिनेता से नेता बने विजय की अगुआई वाली तमिलगा वेट्री कषगम (टीवीके) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वह बहुमत के जादुई आंकड़े 118 से महज 11 सीटें पीछे रह गई। तमिलनाडु के मतदाताओं ने सत्ताधारी द्रविड़ मुन्नेत्र कषगम (डीएमके) के मुखिया और राज्य के मुख्यमंत्री 73 वर्षीय एमके स्टालिन के मुकाबले 51 साल के विजय को चुना। 

पड़ोसी राज्य केरल में 80 साल के पिनाराई विजयन की अगुआई वाला लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एलडीएफ) कांग्रेस की अगुआई वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यूडीएफ) से हार गया। केरल में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) की अगुआई वाले एलडीएफ की हार के साथ ही 1977 के बाद पहली बार ऐसा होगा कि देश में कहीं भी वाम मोर्चा की सरकार नहीं होगी। इससे वामपंथी राजनीति में संकट का पता चलता है। 

First Published : May 4, 2026 | 11:02 PM IST