पश्चिम बंगाल में एक दीवार पर बना TMC का प्रचार चित्र | फोटो: PTI
अगल-बगल के इलाकों में गली-नुक्कड़ों पर पार्टी के झंडे लहराते नजर आ रहे हैं। सड़कों के किनारे उम्मीदवारों की तस्वीरें (कटआउट) भी माहौल को एक अलग ही पहचान दे रही हैं। घर-घर जाकर प्रचार अभियान जोर पकड़ चुका है और चुनावी शोर लगातार बढ़ता ही जा रहा है। यह नजारा पश्चिम बंगाल का है जहां विधान सभा चुनाव का मौसम आ चुका है। सड़कें पहले से ही चुनावी रंग में चुकी हैं और प्रदेश जबरदस्त चुनावी मुकाबले के लिए सांसे थामे इंतजार कर रहा है।
सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस ने 23 और 29 अप्रैल को होने वाले विधान सभा चुनावों के लिए उम्मीदवार सूची जारी कर दी है। इसमें एक महत्त्वपूर्ण फेरबदल करते हुए पार्टी ने लगभग 74 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए हैं और 15 विधायकों के निर्वाचन क्षेत्र बदले गए हैं। इस कदम को ममता बनर्जी के चौथे कार्यकाल की चाहत में सत्ता विरोधी लहर का मुकाबला करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है।
टीएमसी के इस दांव की तुलना वर्ष 2006 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के कदम से की जा रही है जब उसने 7 मंत्रियों सहित 52 विधायकों के टिकट काट दिए थे। माकपा को इसका फायदा भी हुआ और वाम मोर्चा सातवीं बार भारी बहुमत से सत्ता में लौटा और गठबंधन 50 प्रतिशत से अधिक वोट हासिल करने में कामयाब रहा।
अब यह देखना बाकी है कि टीएमसी की रणनीति कारगर साबित होती है या भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) सत्ता-विरोधी लहर को वोटों में बदल पाती है। राजनीतिक विश्लेषक सव्यसाची बसु राय चौधरी ने कहा,‘टीएमसी ने नए चेहरों को मौका दिया है मगर कई विवादित विधायकों को बरकरार रखा है। पार्टी कुछ और नए उम्मीदवारों को मैदान में उतार सकती थी।’ विश्लेषकों का मानना है कि 291 उम्मीदवारों की सूची में पुराने और नए चेहरों का मिश्रण ममता बनर्जी और पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी दोनों के प्रभाव को दर्शाता है।
लगभग 60 प्रतिशत विधायकों को फिर मौका दिया गया है। आयु वर्ग की बात करें तो लगभग 13 प्रतिशत उम्मीदवार 31-40 आयु वर्ग, 31 प्रतिशत 41-50 आयु वर्ग के और 32 प्रतिशत 51-60 आयु वर्ग के हैं।
294 विधान सभा सीटों में से तीन सीटों पर सहयोगी पार्टी अनित थापा के नेतृत्व वाली भारतीय गोरखा प्रजातांत्रिक मोर्चा दार्जिलिंग पहाड़ियों में चुनाव लड़ेगी।
टीएमसी की प्रमुख प्रतिद्वंद्वी भाजपा ने 255 उम्मीदवारों की सूची जारी की है। इसमें लगभग एक चौथाई 40 वर्ष से कम आयु के हैं। माकपा ने भी अपने कई छात्र नेताओं को मैदान में उतारा है। चुनाव प्रचार जोर पकड़ने के साथ ही भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र सुर्खियों में आ चुका है।
इस विधान सभा क्षेत्र में 2021 की तरह ही चुनावी मुकाबला फिर से देखने को मिल सकता है जहां ममता बनर्जी का सामना उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी शुभेंदु अधिकारी से होगा। यह मुकाबला नंदीग्राम से भवानीपुर में हो रहा है।
पिछले विधान सभा चुनाव में बनर्जी ने पार्टी को भारी बहुमत से जीत दिलाई थी मगर नंदीग्राम सीट पर उन्हें अधिकारी से मात्र 1,956 वोटों के मामूली अंतर से हार का सामना करना पड़ा था।
अधिकारी (जो नंदीग्राम से चुनाव लड़ रहे हैं) अब भवानीपुर में भी वैसा ही प्रदर्शन दोहराने और जीत का अंतर और बढ़ाने की कोशिश में लगे हैं। विपक्ष के नेता ने विधान सभा क्षेत्र में प्रचार शुरू कर दिया है और 25,000 वोटों के अंतर से जीत का दावा पहले ही ठोक दिया है।
वर्ष 2021 में बनर्जी ने भवानीपुर उप-चुनाव में 58,000 से अधिक वोटों के अंतर से जीत हासिल कर मुख्यमंत्री पद की कुर्सी बरकरार रखी थी।
भवानीपुर निर्वाचन क्षेत्र में कई समुदायों के लोग रहते हैं जिनमें मारवाड़ी, गुजराती, पंजाबी और अन्य गैर-बंगाली मतदाताओं की संख्या 40 प्रतिशत से अधिक है। बनर्जी ने पिछले चुनाव में सीट जीतने के बाद कहा था कि इस निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 46 प्रतिशत लोग गैर-बंगाली हैं और उन सभी ने मुझे वोट दिया है।
क्या एसआईआर से स्थिति बिगड़ जाएगी? मतदाता सूची संशोधन में 47,000 से अधिक नाम हटा दिए गए हैं और लगभग 14,000 नामों की समीक्षा की जा रही है।
अगर पिछले विधान सभा चुनावों में एनआरसी, सीएए और ‘कट मनी’ राजनीतिक चर्चा पर हावी रहे थे तो इस बार ध्यान एसआईआर पर केंद्रित हो गया है। यह धर्म की तरह ही मतदाताओं के बीच ध्रुवीकरण और विभाजन पैदा करने वाला है।
राजनीतिक विश्लेषक विश्वनाथ चक्रवर्ती ने कहा कि एसआईआर इस चुनाव में एक अहम मुद्दा बनकर उभरा है। चक्रवर्ती कहते हैं,‘भाजपा का लक्ष्य मतदाता सूची को छोटा करना है जबकि टीएमसी अपना मतदाता आधार बनाए रखना चाहती है।’
विश्लेषक बसु राय चौधरी के अनुसार इस बार का ध्रुवीकरण केवल हिंदुत्व के आधार पर ही नहीं है बल्कि एसआईआर को लागू करने के तरीके को लेकर भी है। हालांकि, माकपा पश्चिम बंगाल राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि टीएमसी और भाजपा दोनों ने एसआईआर की आड़ में समाज को बांटने वाली और दोतरफा मुकाबले को बढ़ावा देने की हरकत की है।
सलीम कहते हैं,‘ वामपंथी नेतृत्व वाली धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक ताकतों ने इसका विरोध किया है। हमारी प्रतिक्रिया मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा पर केंद्रित है।’
28 फरवरी को एसआईआर के बाद जारी मतदाता सूची में पश्चिम बंगाल में मतदाताओं की संख्या में लगभग 8 प्रतिशत की कमी आई है और यह घटकर 7.04 करोड़ रह गई है जिसमें 60 लाख से अधिक नाम ‘विचाराधीन’ श्रेणी में रखे गए हैं। विचारणीय समीक्षा के बाद पूरक सूचियां प्रकाशित की जाएंगी।
शनिवार को ईद के अवसर पर आयोजित एक सभा में ममता बनर्जी ने कहा कि वह नागरिकों के मताधिकार की रक्षा के संघर्ष में उनके साथ खड़ी रहेंगी। उन्होंने साथ ही उन्होंने एसआईआर प्रक्रिया को लेकर चिंता भी जताई। मगर एसआईआर इस चुनाव में उनका एकमात्र मुद्दा नहीं है। कल्याणकारी योजनाएं भी उनके चुनाव प्रचार अभियान के केंद्र में बनी हुई हैं।
माकपा के सलीम के अनुसार इस बार सत्ता-विरोधी लहर तीन गुना ज्यादा मजबूत है। उन्होंने कहा,‘पहले यह सरकार के खिलाफ थी, मुख्यमंत्री के खिलाफ नहीं मगर अब यह प्रशासन और मुख्यमंत्री दोनों तक फैली हुई है।’
वरिष्ठ भाजपा नेता दिलीप घोष का कहना है कि सरकार रोजगार सृजन से लेकर स्वास्थ्य एवं शिक्षा तक कई मोर्चों पर नाकाम रही है। वह कहते हैं, ‘हम सरकार बनाने के लिए जरूरी संख्या हासिल कर लेंगे।’
घोष का यह आत्मविश्वास पिछले एक दशक में बंगाल में भाजपा के लगातार बढ़ते प्रभाव पर आधारित है। भगवा पार्टी 2021 में 38 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 77 सीटों पर विजयी रही जो 2016 में सिर्फ तीन सीटों और 10.3 प्रतिशत वोट शेयर से काफी अधिक है। 2011 में उसे 4.1 प्रतिशत वोट मिले थे और वह एक भी सीट नहीं जीत पाई थी।
क्या यह पार्टी अपने पिछले प्रदर्शन से बेहतर प्रदर्शन कर पाएगी यह 4 मई को पता चलेगा। टीएमसी ने 2021 में 48.59 प्रतिशत वोट शेयर के साथ 215 सीटें जीती थीं।
हालांकि, बसु राय चौधरी के अनुसार शहरी अभिजात वर्ग में टीएमसी के खिलाफ सत्ता-विरोधी लहर कहीं अधिक प्रबल है। उन्होंने कहा,‘निम्न वर्ग, कल्याणकारी योजनाओं के लाभार्थी टीएमसी के साथ जुड़े रह सकते हैं।’
मगर अभी तो चुनावी रण की बस शुरूआत है और एसआईआर के नतीजे कई मान्यताओं एवं अनुमानों की कड़ी परीक्षा ले सकते हैं।