Rupee Depreciation FY26: वित्त वर्ष 2025-26 रुपये के लिए 2011-12 के बाद का सबसे खराब साल रहा। इसकी वजह विदेशी निवेशकों की निकासी रही जिससे भारतीय मुद्रा 9.85 फीसदी फिसल गई। मार्च में पश्चिम एशिया संकट ने रुपये की मुश्किलें और बढ़ा दीं। इस कारण डॉलर के मुकाबले भारतीय मुद्रा में करीब 4 फीसदी कमजोरी आई और आखिरी कारोबारी दिन तो प्रति डॉलर 95 का आंकड़ा पार कर गई। केंद्रीय बैंक के दखल के बाद यह 94.81 पर बंद हुई।
इस वित्त वर्ष में केंद्रीय बैंक की दर तय करने वाली कमेटी ने नीतिगत रीपो रेट में 100 आधार अंकों की कटौती की। लेकिन इसके बावजूद सरकारी बॉन्ड पर यील्ड बढ़ गई। इसकी मुख्य वजह राज्यों की तरफ से आपूर्ति बढ़ना थी। 10 साल के बेंचमार्क सरकारी बॉन्ड पर यील्ड वित्त वर्ष 26 के आखिर में 7.04 फीसदी पर रहा जो जुलाई 2024 के बाद का इसका सबसे ऊंचा स्तर है।
बाजार के जानकारों का कहना है कि इस साल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) के साथ-साथ पोर्टफोलियो से पैसे निकलने का असर रुपये और बॉन्ड दोनों पर पड़ा। साथ ही, राज्यों के अधिक कर्ज लेने से आपूर्ति ज्यादा रही, जिससे यील्ड में कोई नरमी नहीं आई और उसमें इजाफा होता गया।
करेंसी की कमजोरी की शुरुआत पूंजी के बाहर जाने से हुई थी, लेकिन बाद में वैश्विक घटनाओं, जिनमें टैरिफ से जुड़े तनाव और ईरान संघर्ष का बढ़ना शामिल है, ने इसमें और इजाफा कर दिया। बाजार के जानकारों का कहना है कि फिलहाल यील्ड में बढ़ोतरी और रुपये में गिरावट ज्यादातर हिस्सा ईरान युद्ध की वजह से है और इसका असर जल्द खत्म होने की संभावना नहीं है।
एक प्राइवेट बैंक के ट्रेजरी प्रमुख ने कहा, मौजूदा वित्त वर्ष काफी हद तक एफडीआई का बाहर जाना अहम बात रही जिसने बॉन्ड और रुपये दोनों पर असर डाला। फिर राज्यों की ज्यादा उधारी ने यील्ड को नीचे नहीं जाने दिया और यह यील्ड के ऊपर जाने का बड़ा कारण बनी। उन्होंने कहा, रुपये में गिरावट पहले ट्रंप के टैरिफ संकट और फिर ईरान संकट की वजह से ज्यादा बढ़ गई।
बॉन्ड यील्ड को लेकर उम्मीद थी कि इस साल वह घटकर लगभग 6.80 फीसदी से 6.85 फीसदी के बीच आ जाएगी। लेकिन इसके बजाय वैश्विक अनिश्चितता बढ़ने से यह 7 फीसदी से भी ऊपर चली गई। बॉन्ड और रुपये दोनों को लेकर नजरिया फिलहाल सतर्क बना हुआ है। मजबूत डॉलर के माहौल के बीच पूंजी की आवक भी सीमित है।