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सरकारी बैंकों में प्रमोशन के पीछे की कहानी और सुधार की बढ़ती जरूरत

अधिकांश बैंकों में वार्षिक पदोन्नति प्रक्रिया मार्च में पूरी होती है और स्थानांतरण का मौसम अप्रैल में शुरू होता है

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तमाल बंद्योपाध्याय   
Last Updated- March 26, 2026 | 9:54 PM IST

सरकारी क्षेत्र के बैंकर्स के लिए मार्च का महीना बहुत थकाने वाला और भावनात्मक रूप से परेशान करने वाला होता है। उन पर कारोबारी लक्ष्य हासिल करने का दबाव होता है। अप्रैल में भी यह सिलसिला जारी रहता है ताकि सांविधिक लेखा परीक्षण सहज ढंग से हो सके। अधिकांश बैंकों में वार्षिक पदोन्नति प्रक्रिया मार्च में पूरी होती है और स्थानांतरण का मौसम अप्रैल में शुरू होता है। अधिकारी 31 मार्च की अंतिम शाम पदोन्नति परिणामों की प्रतीक्षा चिंतित होकर करते हैं, जबकि उनके परिजन एक और स्थानांतरण के लिए तैयार होते हैं। परिणाम 1 अप्रैल की सुबह बैंक के आंतरिक पोर्टल पर भी जारी किए जा सकते हैं।

बैंकों में रिक्तियां नियमित सेवानिवृत्तियों और व्यापार के विस्तार के साथ नेतृत्व प्रतिभा की बढ़ती आवश्यकता के कारण उत्पन्न होती हैं। पदोन्नतियां उन अधिकारियों की पहचान करने के लिए बनाई जाती हैं जो उच्च जिम्मेदारियां संभालने में सक्षम हों। हर बैंक कर्मचारी मान्यता और इनाम चाहता है, लेकिन कई सरकारी बैंकों में पदोन्नति प्रक्रिया कर्मचारियों का विश्वास अर्जित करने में विफल रही है।

बेशक, कुछ बैंक इस प्रक्रिया को पारदर्शी तरीके से संभालते हैं, एक मजबूत तंत्र के साथ जो भीड़ में से वास्तविक लीडर्स को पहचान सके। ऐसे सरकारी बैंक अपने समकक्षों से बेहतर प्रदर्शन करते हैं और कर्मचारियों की अधिक निष्ठा हासिल करते हैं। अधिकांश सरकारी बैंक तीन हिस्से वाले खाके की मदद से पदोन्नति की वरीयता सूची बनाते हैं: पिछले पांच साल में सालाना प्रदर्शन, बैंकिंग के ज्ञान और निर्णय प्रकिया को लेकर लिखित परीक्षा और विशेषज्ञों व बोर्ड निदेशकों के साथ साक्षात्कार। कुछ बैंक समूह चर्चा भी करते हैं।

कागज पर देखें तो पिछला प्रदर्शन, तकनीकी सक्षमता और व्यवहार का आकलन संतुलित रवैया लगता है। लेकिन हकीकत में इनके डिजाइन और क्रियान्वयन में खामी है। इससे अक्सर प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर असर होता है।

वार्षिक प्रदर्शन का स्कोर प्राय: पिछले पांच वर्षों में प्रमुख जिम्मेदारी क्षेत्रों, ईमानदारी और व्यक्तिगत गुणों पर आधारित होता है। सामान्यतः यह खंड कुल पदोन्नति अंकों का 40 से 50 फीसदी हिस्सा होता है। प्रत्येक वर्ष की रिपोर्ट इन गुणों को दर्ज करने के लिए होती है, जिसे तत्काल रिपोर्टिंग अधिकारी द्वारा लिखा जाता है और अगले उच्च अधिकारी द्वारा इसकी समीक्षा की जाती है।

यदि कोई मूल्यांकन से असंतुष्ट हो, तो वह अपील कर सकता है। वरिष्ठ अधिकारियों के स्वतंत्र समूह ऐसी अपीलों को संभालते हैं। यह प्रक्रिया किसी वास्तविक प्रदर्शनकर्ता को फिर से अवसर दिला सकती है, लेकिन ‘पसंदीदा’ अधिकारियों को असमान्य रूप से अधिक अंक देने की संभावना को कैसे समाप्त किया जाए? ऐसे उदाहरण हैं जहां एक ही अधिकारी को एक वर्ष बहुत अधिक अंक मिले और अगले वर्ष बहुत कम। ऐसे उतार-चढ़ाव व्यक्तिगत पक्षपात की ओर इशारा करते हैं। वरिष्ठ अधिकारी अक्सर इसे संरक्षण या दंड के साधन के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

सरकारी बैंकों में पहले पदोन्नति पिछले प्रदर्शन और वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा साक्षात्कार पर निर्भर करता था। इसके बाद वित्त मंत्रालय के वित्तीय सेवा विभाग ने उन्हें यकीन दिलाया कि निष्पक्ष लिखित परीक्षा के जरिये बैंकिंग, वित्त और ताजा घटनाक्रम को लेकर उनकी पेशेवर जानकारी का भी आकलन किया जाए। इसके साथ ही उनकी निर्णय लेने की क्षमता का आकलन करने का प्रयास भी शुरू किया गया। इन परीक्षाओं की जटिलता पदोन्नति के स्तर पर निर्भर करती है। शीर्ष पदों मसलन महाप्रबंधक या मुख्य महाप्रबंधक जैसे पदों के लिए अक्सर ये परीक्षा नहीं ली जाती है।

कुछ बेहतरीन फील्ड प्रदर्शनकर्ता जो रोजमर्रा के ग्राहकों की भीड़ को संभालते हैं, प्रधानमंत्री जनधन योजना जैसी सरकारी योजनाओं को लागू करते हैं, वसूली को आगे बढ़ाते हैं और अन्य आक्रामक लक्ष्यों को पूरा करते हैं, वे क्विज-शैली की परीक्षाओं में अंक हासिल करने की क्षमता नहीं रखते। इसके विपरीत, लेखा परीक्षण और प्रशासन में लगे अधिकारी जिनका समय अधिक नियोजित होता है और जिनके पास संदर्भ सामग्री तक आसान पहुंच होती है, ये परीक्षाएं आराम से पास कर लेते हैं।

ऐसी परीक्षाएं प्रतियोगी परीक्षाओं जैसी होती हैं और बैंकरों की व्यावहारिक क्षमता का आकलन नहीं करतीं। हाल ही में एक सरकारी बैंक की लिखित परीक्षा इतनी कठिन थी कि कुछ ही अधिकारी उत्तीर्ण हो पाए। बैंक को अपने मानक कम करने पड़े ताकि कुछ और लोग उत्तीर्ण हो सकें। सामूहिक चर्चा में अक्सर अफरातफरी मच जाती है।

साक्षात्कार के रूप में अंतिम चरण को करीब 30 फीसदी हिस्सा दिया जाता है। यह पूरी प्रक्रिया का सबसे अस्पष्ट हिस्सा है जिसे बंद दरवाजों के पीछे अंजाम दिया जाता है। अगर कोई इसके परिणाम से नाखुश हो तो कहीं आपत्ति नहीं कर सकता। किसी का साक्षात्कार पांच मिनट चल सकता है तो किसी का आधे घंटे। साक्षात्कारों में अंक देने के लिए खास पदों से संकेत का इंतजार किया जाता है।

साक्षात्कार से पहले से लेकर परिणाम आने तक जमकर लॉबीइंग की जाती है। इस बात की कोई गारंटी नहीं होती कि बेहतर प्रदर्शन करने वाले खुद को सफल सूची में पाएंगे ही। अगर दूसरों के संपर्क बेहतर हुए तो वे सफल हो जाएंगे। वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो जो बोर्ड स्तरीय प्रत्याशियों यानी सरकारी बैंकों के चेयरपर्सन, प्रबंध निदेशक और कार्यकारी निदेशकों की खोज, चयन और अनुशंसा करता है वह अक्सर प्रक्रिया समाप्त होने के दिन ही परिणाम जाहिर कर देता है। परंतु बैंकों की आंतरिक पदोन्नति के नतीजों में एक माह तक का समय लग जाता है। यह एक महीने की अवधि अटकलों का अवसर देती है। साक्षात्कार प्रक्रिया रिकॉर्ड की जानी चाहिए और भविष्य के लिए उपलब्ध होनी चाहिए।

वर्ष 2022 में वित्तीय सेवा संस्थान ब्यूरो ने बैंक्स बोर्ड ब्यूरो नामक स्वायत्त गैर सांविधिक संस्था की जगह ली थी। उम्मीदवारों के लिए एक और बाधा होती है विजिलेंस क्लियरेंस की। अगर किसी के खिलाफ अनुशासन की कोई कार्रवाई चल रही है फिर तो मामला फंसने वाला है। कुछ अधिकारी वर्षों तक ‘विचाराधीन’ स्थिति में बने रह सकते हैं, जिससे वे पदोन्नति प्रक्रिया से प्रभावी रूप से बाहर हो जाते हैं। वहीं, जिनके मजबूत संबंध होते हैं, वे आसानी से प्रक्रिया को पार कर फाइलें जल्दी बंद करवा लेते हैं। यहां तक कि जब अनुशासनात्मक प्रक्रिया पूरी हो जाती है और किसी अधिकारी को अपेक्षाकृत छोटे उल्लंघन के लिए भी दोषी पाया जाता है, तो दंड केवल औपचारिक फटकार या सजा तक सीमित नहीं रहता।

ऐसे कई अधिकारियों को एक अतिरिक्त ‘कठिनाई अवधि’ से गुजरना पड़ता है, जिसमें एक वर्ष तक वे पदोन्नति के पात्र नहीं होते। जो बैंक पारदर्शी और निष्पक्ष प्रक्रिया का पालन नहीं करते, वे न केवल सक्षम कर्मचारियों का करियर नष्ट करते हैं, बल्कि उनके वरिष्ठतम अधिकारी प्रबंध निदेशक और कार्यकारी निदेशक के पद तक पदोन्नत नहीं हो पाते। कुछ वर्ष पहले, वित्तीय सेवा विभाग ने सरकारी बैंकों को निर्देश दिया कि वे डीजीएम से जीएम और जीएम से सीजीएम तक की पदोन्नति उन कर्मचारियों तक सीमित रखें जिनकी सेवा अवधि कम से कम दो वर्ष शेष हो। तर्क यह था कि ऐसे अधिकारी शीर्ष पदों के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं कर पाएंगे, तो उन्हें आंतरिक रूप से क्यों पदोन्नत किया जाए?

सरकारी बैंकों को पदोन्नति प्रक्रिया को इस तरह तैयार करना चाहिए है कि वे उन लोगों की पहचान कर सकें जो व्यवसाय को बढ़ाने, संतुलित जोखिम लेने, पहल करने और नियामक व आंतरिक जांच का पालन करने में सक्षम हों। जो अधिकारी जोखिम से बचते हैं, केवल संबंधों पर निर्भर रहते हैं और आंतरिक छवि प्रबंधन में निपुण होते हैं, वे ऊपर तक पहुंच सकते हैं, लेकिन संस्थान की वृद्धि में योगदान नहीं देते।

First Published : March 26, 2026 | 9:29 PM IST