प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो
पश्चिम एशिया में संघर्ष एक महीने से अधिक खिंचने के कारण लघु, सूक्ष्म और मझोले उद्यमों (एमएसएमई) की कार्यशील पूंजी ऋण की मांग बढ़ गई है। निर्धारित लागत के भुगतान और प्राप्तियों में देर होने की वजह से छोटे उद्योगों के नकदी प्रवाह पर दबाव बढ़ रहा है, जिससे बैंकों से कर्ज की मांग बढ़ गई है।
बैंकरों का कहना है कि पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध का सबसे अधिक असर एमएसएमई पर पड़ने की आशंका है। वित्त वर्ष 2026 की जनवरी-मार्च तिमाही में इसका असर सीमित रहा है मगर वित्त वर्ष 2027 में बैंकों के ऋण पोर्टफोलियो की गुणवत्ता पर इसका दबाव दिखाई देगा। बैंकों का कहना है कि यह क्षेत्र प्रमुख चिंता का विषय बन सकता है।
निजी क्षेत्र के एक बैंक के वरिष्ठ बैंकर ने कहा, ‘कुछ हद तक दबाव अभी से दिख रहा है। निश्चित रूप से ऋण की मांग बढ़ी है। संभवतः यह वर्तमान स्थिति से निपटने के लिए है। हालांकि साल के समापन के समय भी अक्सर ऐसे ही रुझान देखे जाते हैं। ऐसे में प्रभाव को स्पष्ट रूप से अलग करना मुश्किल है।’ उन्होंने कहा, ‘हमें थोड़ा इंतजार करना और देखना होगा कि आगे किस तरह के हालात बनते हैं।’
पश्चिम एशिया युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित होने से कुछ क्षेत्रों पर गंभीर असर पड़ा है। इसमें गुजरात के मोरबी में सिरेमिक क्लस्टर शामिल है। कांच और चूड़ी उद्योग पर भी व्यापक असर पड़ा है। विशेष रूप से पश्चिम एशिया के बाजारों पर निर्भर रहने वाले चावल निर्यातक भी प्रभावित हो रहे हैं। साथ ही उर्वरक जैसे क्षेत्रों को भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
निजी क्षेत्र के बैंक के एक अन्य वरिष्ठ बैंकर ने कहा, ‘यदि आप इसे देखें तो कार्यशील पूंजी की मांग बहुत अधिक नहीं रही है। मगर मुझे लगता है कि यह अंततः काफी बढ़ सकती है। यदि मैं अपने पोर्टफोलियो को देखूं तो फिलहाल उपयोगिता ज्यादा नहीं बढ़ी है।’
जब कामकाज का स्तर कम होता है तो कार्यशील पूंजी की जरूरत बहुत ज्यादा नहीं होनी चाहिए। लेकिन जब गतिविधियां सुस्त होती हैं तो नियत लागत को पूरा करना ज्यादा मुश्किल हो जाता है। दूसरे शख्स ने कहा कि इस नजरिये से देखें तो, ‘जो कुछ मैं सुन रहा हूं उसके आधार पर कुछ दबाव हो सकता है।’उन्होंने आगाह किया कि अगले 6 से 12 महीनों में कुछ और दबाव देखने को मिल सकता है। उन्होंने कहा, ‘मौजूदा हालात का पूरा असर शायद अप्रैल के आखिर या मई में दिखाई देगा क्योंकि ऐसे असर सामने आने में थोड़ा समय लगता है।’
बैंकरों के अनुसार कच्चे माल, माल ढुलाई और शिपिंग जैसे इनपुट लागत में वृद्धि चुनौती हो सकती है। साथ ही डीजल की कीमतें बढ़ने से घरेलू परिवहन लागत में संभावित वृद्धि हो सकती है। पैकेजिंग सामग्री की लागत पहले ही बढ़ चुकी है और प्लास्टिक तथा रसायन जैसे कच्चे तेल से जुड़े उद्योगों में लागत का दबाव स्पष्ट रूप से दिख रहा है। इसके परिणामस्वरूप कार्यशील पूंजी की मांग बढ़ सकती है। उदाहरण के लिए यदि इनपुट लागत 20 से 30 फीसदी बढ़ती है तो भले ही उत्पादन की मात्रा कम हो जाए मगर कुल पूंजी की आवश्यकता बढ़ सकती है।