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क्या अभी बॉन्ड खरीदने का सही समय? Axis MF को उम्मीद RBI ने सख्ती नहीं बढ़ाई तो आ सकती है तेजी

एक्सिस म्युचुअल फंड ने फिक्स्ड इनकम निवेशकों को लंबी अवधि (ड्यूरेशन) वाले निवेश से पीछे नहीं हटने की सलाह दी है

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निकिता वशिष्ठ   
Last Updated- May 25, 2026 | 5:42 PM IST

पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी का असर अब भारत के बॉन्ड बाजार पर भी दिखने लगा है। एक्सिस म्युचुअल फंड के अनुसार, इससे महंगाई और ब्याज दरों को लेकर बाजार की उम्मीदें बदल रही हैं, जिससे निवेशकों के लिए माहौल चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि, फंड हाउस का मानना है कि निवेशकों को घबराने के बजाय बाजार में उतार-चढ़ाव का फायदा उठाकर धीरे-धीरे लंबी अवधि वाले बॉन्ड में निवेश बढ़ाना चाहिए।

अपनी हालिया फिक्स्ड इनकम रणनीति रिपोर्ट में फंड हाउस ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था अब 2013, 2018 और 2022 जैसे पिछले तेल संकट वाले दौरों से अलग परिस्थितियों का सामना कर रही है। रिपोर्ट के अनुसार, पश्चिम एशिया में जारी तनाव और कच्चे तेल की कीमतों का RBI के अनुमान से ज्यादा समय तक ऊंचे स्तर पर बने रहना महंगाई, रुपये की स्थिति, आर्थिक विकास और सरकारी वित्तीय संतुलन पर एक साथ दबाव बढ़ा रहा है।

ऊर्जा आयात पर भारत की निर्भरता चुनौती

एक्सिस म्युचुअल फंड के अनुसार, भारत के लिए यह चुनौती इसलिए और बढ़ जाती है क्योंकि देश ऊर्जा आयात पर काफी हद तक निर्भर है।

भारत अपनी कुल कच्चे तेल की जरूरत का लगभग 85 फीसदी आयात करता है। ऐसे में तेल की कीमतों में तेज बढ़ोतरी का असर भारतीय अर्थव्यवस्था पर जल्दी पड़ता है। फंड हाउस के अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 10 डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोतरी से चालू खाता घाटा (CAD) जीडीपी के लगभग 40-45 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकता है। साथ ही, महंगाई 45-60 बेसिस प्वाइंट तक बढ़ सकती है और यदि सरकार झटके को कम करने के लिए ईंधन पर टैक्स घटाती है तो राजकोषीय दबाव भी बढ़ सकता है।

हालांकि, फंड हाउस का कहना है कि पिछली बार के मुकाबले इस बार भारत अपेक्षाकृत मजबूत स्थिति में है। इसकी वजह निजी क्षेत्र पर कम कर्ज बोझ, बैंकों की बेहतर स्थिति, मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, वित्तीय अनुशासन में सुधार, ग्लोबल बॉन्ड इंडेक्स में भारत का शामिल होना और घरेलू वित्तीय बचत में बढ़ोतरी है।

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लॉन्ग टर्म निवेश पर फोकस

इन परिस्थितियों के बीच एक्सिस म्युचुअल फंड ने फिक्स्ड इनकम निवेशकों को लंबी अवधि (ड्यूरेशन) वाले निवेश से पीछे नहीं हटने की सलाह दी है। फंड हाउस का कहना है कि निवेशकों को फिक्स्ड इनकम एसेट्स में निवेश करना चाहिए, लेकिन इसे धीरे-धीरे बढ़ाना बेहतर रहेगा।

रिपोर्ट में कहा गया है कि फिलहाल बाजार निकट अवधि को लेकर जरूरत से ज्यादा निराश नजर आ रहा है। यदि RBI सीमित सख्ती के बाद ब्याज दरों में विराम देता है, अचानक लिक्विडिटी सख्त करने से बचता है या आर्थिक वृद्धि को समर्थन देने के संकेत देता है, तो निकट अवधि में बॉन्ड यील्ड्स में 20-25 बेसिस प्वाइंट तक की तेजी आ सकती है।

फंड हाउस के अनुसार, निवेशक तीन परिस्थितियों में धीरे-धीरे लंबी अवधि (ड्यूरेशन) वाले निवेश बढ़ाने पर विचार कर सकते हैं। पहली, यदि RBI घबराहट में सख्त मौद्रिक कदम उठाने से बचता है। दूसरी, कच्चे तेल की कीमतें स्थिर हो जाती हैं। और तीसरी, नीति निर्माता डॉलर निवेश को आकर्षित करने के लिए नए कदम उठाते हैं।

बॉन्ड बाजार क्या संकेत दे रहा है?

10 साल की सरकारी बॉन्ड यील्ड 7 फीसदी के स्तर के आसपास बनी हुई है। इससे संकेत मिलता है कि बॉन्ड बाजार काफी आक्रामक नीतिगत सख्ती की आशंका को ध्यान में रखकर चल रहा है।

एक्सिस म्युचुअल फंड के अनुसार, ओवरनाइट इंडेक्स्ड स्वैप (OIS) बाजार लगभग 75-100 बेसिस प्वाइंट तक ब्याज दर बढ़ोतरी की संभावना दिखा रहे हैं। वहीं, सरकारी बॉन्ड्स में टर्म प्रीमियम ऊंचे स्तर पर हैं, कॉरपोरेट बॉन्ड्स में लिक्विडिटी सख्त होने की आशंका झलक रही है और मनी मार्केट भी संभावित लिक्विडिटी सख्ती के संकेत दे रहा है। हालांकि, फंड हाउस का मानना है कि बाजार शायद जरूरत से ज्यादा सख्ती का अनुमान लगा रहा है।

रिपोर्ट के मुताबिक, RBI रुपये की कमजोरी से निपटने के लिए 2013 जैसी आक्रामक ब्याज दर बढ़ोतरी की रणनीति अपनाने की संभावना कम है।

इसके बजाय, केंद्रीय बैंक सीमित स्तर पर 25-75 बेसिस प्वाइंट तक ब्याज दरों में बदलाव, लिक्विडिटी मैनजमेंट, विदेशी मुद्रा बाजार में हस्तक्षेप और डॉलर निवेश आकर्षित करने वाले प्रशासनिक कदमों का मिक्स इस्तेमाल कर सकता है।

इन उपायों में NRI जमा पर प्रोत्साहन, सरकार जैसी डॉलर जुटाने की योजनाएं और बैंकों व सरकारी कंपनियों द्वारा विदेशी बाजारों में बॉन्ड जारी करना शामिल हो सकता है।

फंड हाउस ने यह भी कहा कि केवल आक्रामक सख्ती से मौजूदा समस्या का समाधान नहीं होगा।

रिपोर्ट के अनुसार, रुपये में कमजोरी को सिर्फ ब्याज दरें बढ़ाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता। क्योंकि तेल की कीमतों में बढ़ोतरी सप्लाई से जुड़ी समस्या है, मांग से नहीं। ऐसे में अत्यधिक ब्याज दर बढ़ोतरी आर्थिक विकास को नुकसान पहुंचा सकती है, जबकि रुपये को स्थिर करने में इसका असर सीमित रह सकता है।

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पिछले तेल संकटों के दौरान RBI ने क्या कदम उठाए थे?

2013 के “टेपर टैंट्रम” संकट के दौरान रुपये में स्थिरता केवल लिक्विडिटी सख्त करने से नहीं आई थी। उस समय RBI ने विदेशी मुद्रा फ्लो बढ़ाने के लिए FCNR डिपॉजिट से जुड़े विशेष उपाय लागू किए थे, जिसके बाद स्थिति में सुधार आया।

वहीं, 2018 में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी आने पर RBI ने रीपो रेट और मार्जिन स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) समेत ब्याज दरों में 50 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी की थी। इसके बाद 2022 में RBI ने रीपो रेट में कुल 250 बेसिस प्वाइंट की तेज बढ़ोतरी करते हुए कोविड काल के कम ब्याज दर वाले दौर को खत्म कर दिया था।

हालांकि, फंड हाउस ने निवेशकों को लंबी अवधि वाले बॉन्ड्स में बहुत ज्यादा आक्रामक रुख अपनाने से भी सावधान किया है।

फंड हाउस के अनुसार, भारत अब उस “गोल्डीलॉक्स मैक्रो” दौर से बाहर निकल सकता है, जहां कच्चे तेल की कीमतें कम, महंगाई नियंत्रित और वित्तीय घाटे स्थिर थे। अब 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बना कच्चा तेल, बढ़ते राजकोषीय जोखिम, रुपये में संभावित कमजोरी और आयातित महंगाई जैसी चुनौतियां व्यापक आर्थिक जोखिमों को बढ़ा सकती हैं।

इसी वजह से फंड हाउस का मानना है कि निकट अवधि में ड्यूरेशन को लेकर रणनीतिक रूप से पॉजिटव रुख रखा जा सकता है, लेकिन लंबी अवधि के लिए बहुत मजबूत भरोसा अभी नहीं बनता।

Axis MF ने सुझाव दिया है कि निवेशक अगले तीन महीनों तक न्यूट्रल से हल्का लंबी अवधि वाला पोर्टफोलियो बनाए रखें। इसके बाद RBI की पहली कार्रवाई के बाद तीन से छह महीनों में धीरे-धीरे ड्यूरेशन बढ़ाया जा सकता है। वहीं, यदि कच्चे तेल की कीमतें 75 डॉलर प्रति बैरल से नीचे आती हैं या लंबी अवधि वाले बॉन्ड की यील्ड 7.9 फीसदी से ऊपर जाती है, तो छह से बारह महीनों के दौरान पोर्टफोलियो की ड्यूरेशन और बढ़ाई जा सकती है।

First Published : May 25, 2026 | 5:40 PM IST