पश्चिम एशिया संकट के कारण उर्वरकों की वैश्विक कीमतों में तेज बढ़ोतरी के बीच केंद्रीय मंत्रिमंडल ने खरीफ 2026 के लिए गैर-यूरिया उर्वरकों पर प्रति किलो सब्सिडी दरों में 10 से 21 फीसदी तक वृद्धि को मंजूरी दी है। यह वृद्धि खरीफ 2025 की तुलना में पोषक आधारित सब्सिडी स्कीम (एनबीएस) व्यवस्था के तहत की गई है। इससे सरकारी खजाने पर लगभग 41,534 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा, जो पिछले सीजन के बोझ से करीब 12 फीसदी ज्यादा है।
इसका अर्थ है कि यदि यूरिया, डीएपी और अन्य जटिल उर्वरकों की वैश्विक कीमतों में उल्लेखनीय कमी नहीं आती या फॉस्फेटिक एवं पोटाशिक (पीऐंडके) उर्वरकों के घरेलू उत्पादन में प्रयुक्त कच्चे माल सल्फर, अमोनिया और सल्फ्यूरिक एसिड की कीमतें नहीं घटतीं, तो वित्त वर्ष 2027 के लिए उर्वरक सब्सिडी बजट अनुमान से अधिक जा सकती है।
खाड़ी क्षेत्र भारत की यूरिया जरूरत का 20 से 30 फीसदी और डीएपी आयात का 30 फीसदी हिस्सा पूरा करता है। साथ ही, भारत के एलएनजी आयात का लगभग 50 फीसदी भी इसी क्षेत्र से आता है, जो यूरिया उत्पादन के लिए प्रमुख कच्चे माल के रूप में काम आता है। उच्च सब्सिडी का यह भी मतलब है कि देश में दूसरे सबसे अधिक उपभोग वाले उर्वरक डीएपी की कीमत 1,350 रुपये प्रति बोरी (50 किलो) पर स्थिर रखी जाएगी और अतिरिक्त लागत केंद्र सरकार वहन करेगी।
वित्त वर्ष 2027 में केंद्र ने कुल 1,70,781 करोड़ रुपये के उर्वरक सब्सिडी प्रावधान में से 54,000 करोड़ रुपये गैर-यूरिया उर्वरकों के लिए निर्धारित किए थे, जो वित्त वर्ष 2026 के संशोधित अनुमान 60,000 करोड़ रुपये से लगभग 10 फीसदी कम था। बुधवार के फैसले के बाद नाइट्रोजन पर प्रति किलो सब्सिडी पिछले खरीफ के मुकाबले 10 फीसदी बढ़ी है, जबकि फॉस्फोरस पर 21 फीसदी और सल्फर पर 21.07 फीसदी की वृद्धि की गई है। पोटाश पर सब्सिडी पिछले वर्ष के स्तर 2.38 रुपये प्रति किलो पर यथावत रखी गई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में ये दरें 1 अप्रैल से 30 सितंबर 2026 तक लागू करने का निर्णय लिया गया।
एनबीएस योजना के तहत पीएंडके उर्वरकों की 28 ग्रेड पर यह सब्सिडी लागू होती है। यह योजना अप्रैल 2010 से लागू है। वैश्विक स्तर पर पश्चिम एशिया में संघर्ष शुरू होने के बाद यूरिया की कीमतें संकट पूर्व स्तर से 200–250 डॉलर बढ़कर लगभग 700 डॉलर प्रति टन पहुंच गई हैं। वहीं डीएपी की कीमतें 650–670 टन से बढ़कर 750–770 डॉलर प्रति टन हो गई हैं। वित्त वर्ष 2025 में भारत ने लगभग 56.5 लाख टन यूरिया, 45.7 लाख टन डीएपी और 25.4 लाख टन अमोनिया का आयात किया। डीएपी, एमओपी और एनपीके जैसे गैर-यूरिया उर्वरकों की खुदरा कीमतें विनियंत्रित हैं और इन्हें निर्माता तय करते हैं, जबकि केंद्र सरकार हर वर्ष निश्चित सब्सिडी देती है।
अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर भारतीय अनुसंधान परिषद (इक्रियर) के एक हालिया अध्ययन के अनुसार भारत चीन के बाद उर्वरक उत्पादन और खपत में दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। वर्ष 2024-25 में भारत ने लगभग 707 लाख टन उर्वरकों का उपभोग किया, जो लगभग 330 लाख टन पोषक तत्वों के बराबर है। हालांकि मजबूत घरेलू उद्योग के बावजूद भारत का उर्वरक क्षेत्र वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भर है।
यूरिया उत्पादन में उपयोग होने वाली प्राकृतिक गैस का लगभग 85 फीसदी आयातित है, जबकि फॉस्फेटिक रॉक फॉस्फेट का 90 से 95 फीसदी और फॉस्फोरिक एसिड का लगभग आधा हिस्सा विदेश से आता है। मध्यवर्ती कच्चे माल के आयात को जोड़ने पर भारत की उर्वरक आपूर्ति श्रृंखला पर प्रभावी वैश्विक निर्भरता 68-70 फीसदी तक पहुंच जाती है। जिससे उर्वरक क्षेत्र और देश की खाद्य सुरक्षा भू-राजनीतिक व्यवधानों और आपूर्ति झटकों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है।