Oil Prices: पिछले कुछ हफ्तों में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की जेब पर दबाव बढ़ाया है। ऐसे में अमेरिका और ईरान के बीच हुए शांति समझौते ने एक नई उम्मीद जगाई है। इस समझौते के बाद माना जा रहा है कि वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों पर दबाव कम होगा और तेल की आपूर्ति भी धीरे-धीरे सामान्य हो जाएगी। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या इसका फायदा जल्द ही भारतीय ग्राहकों को मिलेगा?
फिलहाल इसका जवाब आसान नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने के बावजूद पेट्रोल, डीजल और एलपीजी के दाम तुरंत कम होने की संभावना नहीं है।
पिछले कुछ महीनों में पश्चिम एशिया में बढ़े तनाव ने वैश्विक तेल बाजार को हिला कर रख दिया। कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर पहुंच गईं। भारत जैसे देश के लिए यह चिंता की बात थी, क्योंकि देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयातित कच्चे तेल से पूरा करता है।
तेल महंगा होने का सीधा असर सरकारी तेल कंपनियों पर पड़ा। इंडियन ऑयल, भारत पेट्रोलियम और हिंदुस्तान पेट्रोलियम जैसी कंपनियों को महंगे दाम पर कच्चा तेल खरीदना पड़ रहा था, जबकि खुदरा कीमतों में उतनी तेजी से बढ़ोतरी नहीं की गई थी। नतीजा यह हुआ कि पेट्रोल, डीजल और एलपीजी की बिक्री पर उनका घाटा बढ़कर करीब 30 हजार करोड़ रुपये प्रति महीने तक पहुंच गया।
शुरुआत में तेल कंपनियों ने बढ़ी हुई लागत का बोझ खुद उठाने की कोशिश की। लेकिन जब घाटा लगातार बढ़ता गया, तो उन्हें कीमतों में बढ़ोतरी करनी पड़ी। मई 2026 में सरकारी तेल कंपनियों ने पेट्रोल और डीजल की कीमतों में 3 रुपये प्रति लीटर की बढ़ोतरी की। यह चार साल में पहली बढ़ोतरी थी। इसके बाद 26 मई को एक और संशोधन किया गया, जिसमें पेट्रोल 2.61 रुपये और डीजल 2.71 रुपये प्रति लीटर महंगा हुआ।
इन दोनों बढ़ोतरी को मिलाकर 15 मई के बाद से पेट्रोल की कीमत 7.38 रुपये और डीजल की कीमत 7.52 रुपये प्रति लीटर बढ़ चुकी है। दिल्ली में पेट्रोल का भाव 102.12 रुपये प्रति लीटर और डीजल का भाव 95.20 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गया। राहत सिर्फ यहीं नहीं रुकी। 7 जून को घरेलू एलपीजी सिलेंडर की कीमत में भी 29 रुपये की बढ़ोतरी कर दी गई। पश्चिम एशिया संकट शुरू होने के बाद यह दूसरी बार था जब रसोई गैस महंगी हुई।
अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौते के बाद तेल बाजार में कुछ स्थिरता लौटती दिखाई दे रही है। इसका असर तेल कंपनियों के घाटे पर भी दिखने लगा है। 15 जून तक पेट्रोल पर तेल कंपनियों की अंडर-रिकवरी घटकर लगभग 3 रुपये प्रति लीटर रह गई, जबकि एक सप्ताह पहले यह करीब 6 रुपये प्रति लीटर थी। डीजल पर भी घाटा 30 रुपये प्रति लीटर से घटकर 27 रुपये प्रति लीटर रह गया। इसका मतलब है कि हालिया मूल्य वृद्धि और कच्चे तेल में आई नरमी ने तेल कंपनियों की वित्तीय स्थिति को कुछ हद तक संभालने में मदद की है।
यही वह सवाल है जो हर वाहन मालिक और हर परिवार पूछ रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि तेल कंपनियां अभी कीमतें घटाने की जल्दी में नहीं होंगी। ब्रिकवर्क रेटिंग्स के रिसर्च प्रमुख राजीव शरण का कहना है कि तेल कंपनियां पहले अपनी बैलेंस शीट मजबूत करना चाहेंगी। हाल के महीनों में हुए नुकसान की भरपाई उनके लिए प्राथमिकता होगी। इसलिए कच्चे तेल की कीमतों में नरमी का पूरा फायदा तुरंत ग्राहकों तक पहुंचना मुश्किल है।
बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस भी इसी राय से सहमत हैं। उनका कहना है कि युद्ध के दौरान यूएई, कुवैत, ओमान और सऊदी अरब जैसे देशों की कुछ उत्पादन सुविधाएं प्रभावित हुई थीं। वैश्विक सप्लाई को पूरी तरह सामान्य होने में अभी 3 से 6 महीने तक लग सकते हैं।
अब बाजार की नजर कुछ अहम संकेतकों पर होगी। सबसे पहला फैक्टर रहेगा कच्चे तेल की वैश्विक कीमत। दूसरा, अमेरिका और ईरान के बीच हुआ शांति समझौता कितना टिकाऊ साबित होता है। तीसरा, डॉलर के मुकाबले रुपये की स्थिति कैसी रहती है।
अगर कच्चे तेल की कीमतें नियंत्रित रहती हैं और पश्चिम एशिया में दोबारा कोई बड़ा संकट नहीं आता, तो ईंधन की कीमतों में स्थिरता बनी रह सकती है। लेकिन अगर भू-राजनीतिक तनाव फिर बढ़ता है, तो तेल बाजार में एक बार फिर उथल-पुथल देखने को मिल सकती है।
कच्चे तेल की कीमतों में नरमी आने के बावजूद महंगाई का असर तुरंत खत्म नहीं होगा। हाल में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में जो बढ़ोतरी हुई है, उसका असर परिवहन और लॉजिस्टिक्स लागत के जरिए कई क्षेत्रों में दिखाई देगा। जब ट्रांसपोर्ट महंगा होता है, तो खाने-पीने की चीजों से लेकर रोजमर्रा के सामान तक की लागत बढ़ जाती है। इसलिए महंगाई पर इसका असर कुछ समय तक बना रह सकता है।
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका-ईरान समझौते ने लंबे समय तक बने रहने वाले तेल संकट की आशंका को कम कर दिया है। इससे महंगाई पर दूसरा बड़ा झटका लगने का जोखिम भी घटा है।
अक्सर लोग Brent Crude की कीमतों को देखकर यह मान लेते हैं कि पेट्रोल और डीजल भी जल्द सस्ते हो जाएंगे। लेकिन तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। भारत जिस कच्चे तेल का आयात करता है, उसकी वास्तविक लागत, उपलब्धता और सप्लाई कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण होती है। इसलिए सिर्फ Brent Crude में गिरावट आने से घरेलू ईंधन कीमतों में तुरंत राहत नहीं मिलती।
मदन सबनवीस का कहना है कि थोक महंगाई पर इसका असर जल्दी दिख सकता है, क्योंकि एटीएफ, नैफ्था और कई अन्य पेट्रोलियम उत्पाद सीधे आयातित कच्चे तेल की कीमतों से जुड़े होते हैं। लेकिन खुदरा महंगाई और ईंधन कीमतों में बदलाव इस बात पर निर्भर करेगा कि तेल कंपनियां अपने घाटे की भरपाई कब तक कर लेती हैं।