भारतीय शेयर बाजार के कुल मूल्यांकन का हिस्सा कुछ बड़ी कंपनियों से अब उतना नहीं आता, जितना 30 साल पहले आता था और अब यह बाजार दुनिया के सबसे बड़े शेयर बाजार अमेरिका के मुकाबले कम केंद्रित है। नैशनल स्टॉक एक्सचेंज (एनएसई) के मार्केट पल्स पब्लिकेशन के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि यह बदलाव 2020 के बाद आया, जब अमेरिकी बाजार और ज्यादा केंद्रित हो गए थे जबकि भारतीय बाजार का केंद्रीकरण काफी कम हो गया था।
2020 और 2025 के बीच, भारत का हरफिनडहल हिर्समेन इंडेक्स (एचएचआई) स्कोर 167.9 से घटकर 80.9 रह गया। एचएचआई एकाग्रता का एक पैमाना है, जिसका इस्तेमाल बाजार पूंजीकरण के संदर्भ में किया जाता है। ज्यादा संख्याएं ज्यादा एकाग्रता को दर्शाती हैं। अमेरिका का एचएचआई स्कोर 2020 के 95 से बढ़कर 2025 में 164 पर पहुंच गया।
भारत के एचएचआई में बड़े संकटों वाले दौर में भी लगातार गिरावट देखने को मिली है। 2005-2010 के बीच इसमें गिरावट आई, जो वैश्विक वित्तीय संकट का दौर था। 2010-2015 और 2020-2025 के दौरान भी इसमें गिरावट दर्ज की गई। इस अवधि में बाजार क्रमशः टेपर टैंट्रम और कोविड-19 महामारी से प्रभावित हुए थे। अमेरिकी शेयर बाजार के लिए 2020 के बाद बड़ी तकनीकी कंपनियों में संकेंद्रण बढ़ गया, जिसके चलते 2023 में माइक्रोसॉफ्ट, एनवीडिया, अल्फाबेट, एमेजॉन, ऐपल, मेटा और टेस्ला को उनके बेहतरीन प्रदर्शन की वजह से “मैग्निफिसेंट सेवन” का नाम दिया गया।
यह बात सभी विकसित बाजारों पर लागू नहीं होती। उदाहरण के लिए, जापान में इसी दौरान एचएआई में 83.9 से 75.9 तक की गिरावट देखी गई।
उभरते बाजारों में इस दौरान चीन का एचएचआई इंडेक्स 1995 के 301.2 से गिरकर 2025 में 37.7 पर आ गया। चीन के एचएचआई में यह गिरावट रियल एस्टेट सेक्टर से दूर हटकर विविधता लाने की वजह से हुई। 1995 में देश के बाजार पूंजीकरण में इस सेक्टर का हिस्सा 34 फीसदी था, जो 2025 में घटकर सिर्फ 2 फीसदी रह गया। वहीं, आईटी का हिस्सा 1995 के 2 फीसदी से बढ़कर 2025 में 18 फीसदी हो गया, जबकि इंडस्ट्रियल सेक्टर का योगदान 16 फीसदी रहा।
भारत ने जिंस आधारित बाजार से हटकर विविधीकरण देखा है, जहां मैटीरियल्स (1995 में 25 फीसदी) का वर्चस्व अब वित्तीय क्षेत्र (2025 में 25 फीसदी) को जगह दे रहा है। औद्योगिक क्षेत्र, उपभोक्ता विवेकाधीन वस्तुएं और आईटी भी इसमें प्रमुख योगदानकर्ता हैं।
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मैनेजमेंट, अहमदाबाद के प्रोफ़ेसर जोशी जेकब ने बताया कि भारत की 10 अग्रणी कंपनियां मुख्य रूप से बैंकिंग और फाइनैंशियल सर्विसेज़, एनर्जी, आईटी सर्विसेज़ और एफएमसीजी सेक्टर से हैं। इन ज्यादा पूंजी वाली कंपनियों के लिए मुनाफ़ा बढ़ाकर अपना विस्तार करने की काफ़ी सीमाएं हैं, जिससे भारत में बाजार पूंजीकरण के एक जगह जमा होने की गुंजाइश ढांचागत रूप से सीमित हो जाती है। इसके अलावा, जेकब का मानना है कि बाजार में सूचीबद्ध बड़ी संख्या में टेक आधारित स्टार्टअप और मिडकैप कंपनियों की मौजूदगी ने एमकैप के एक जगह जमा होने की प्रवृत्ति को कम किया है।