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एक शेयरधारक की शिकायत और खुल गया ₹15 लाख करोड़ का राज! SEBI की जांच में राजेश एक्सपोर्ट्स पर बड़े सवाल

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एक शेयरधारक की शिकायत के बाद सेबी की जांच में राजेश एक्सपोर्ट्स के ₹15.15 लाख करोड़ के राजस्व, विदेशी सहायक कंपनियों और फंड ट्रांसफर से जुड़े गंभीर सवाल सामने आए हैं।

Last Updated- June 04, 2026 | 2:51 PM IST
SEBI
Representative image

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL) के खिलाफ 11 मार्च 2024 को एक ईमेल के जरिए शिकायत मिली। यह शिकायत किसी व्हिसलब्लोअर, पूर्व कर्मचारी या एक्टिविस्ट निवेशक ने नहीं, बल्कि कंपनी के एक शेयरधारक ने की थी। शिकायत में कंपनी की बैलेंस शीट में वर्षों से बकाया पड़े बड़े ट्रेड रिसीवेबल्स यानी ग्राहकों से मिलने वाली रकम को लेकर सवाल उठाए गए थे।

करीब दो साल बाद यह मामला सेबी के एक कड़े अंतरिम आदेश तक पहुंच गया है। सेबी ने आरोप लगाया है कि कंपनी ने अपने राजस्व (revenue) के आंकड़ों को गलत तरीके से पेश किया हो सकता है। इसके अलावा कंपनी पर महत्वपूर्ण सहायक कंपनियों (सब्सिडियरी) से जुड़ी जानकारी का पूरा खुलासा नहीं करने, प्रमोटर से जुड़े संस्थानों के जरिए फंड ट्रांसफर करने और विदेशों में अपने कारोबार की जांच व सत्यापन में बाधा डालने के भी आरोप लगाए गए हैं।

मामला कैसे आगे बढ़ा?

  • 11 मार्च 2024: सेबी को एक शेयरधारक की शिकायत प्राप्त हुई।
  • 23 अक्टूबर 2024: मामले की जांच के लिए जांच अधिकारी नियुक्त किया गया।
  • 3 दिसंबर 2024: फोरेंसिक ऑडिट के लिए बीडीओ इंडिया सर्विसेज को नियुक्त किया गया।
  • पूरे वर्ष 2025 के दौरान: कंपनी और संबंधित पक्षों को कई समन और जानकारी उपलब्ध कराने के नोटिस भेजे गए।
  • 3 जून 2026: सेबी ने राजेश एक्सपोर्ट्स और इसके प्रमोटर राजेश मेहता के खिलाफ अंतरिम आदेश जारी किया।

जांच आगे बढ़ी तो उठने लगे बड़े सवाल

जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी, सेबी ने राजेश एक्सपोर्ट्स से ग्राहकों के हिसाब से बिक्री का ब्योरा, सप्लायर्स से की गई खरीदारी का रिकॉर्ड, देनदारों और लेनदारों की जानकारी, सहायक कंपनियों के वित्तीय दस्तावेज, लेनदेन से जुड़े रिकॉर्ड और अन्य जरूरी दस्तावेज मांगे। इसके अलावा कंपनी के अकाउंटिंग सिस्टम और खातों तक पहुंच भी मांगी गई।

हालांकि, सेबी के अनुसार कंपनी ने कई सवालों के जवाब नहीं दिए या फिर अधूरी जानकारी उपलब्ध कराई। जांच के लिए नियुक्त फॉरेंसिक ऑडिटर ने भी कहा कि उसे कंपनी के एंटरप्राइज रिसोर्स प्लानिंग (ERP) सिस्टम, खातों की पुस्तकों और जर्नल डेटा तक पहुंच नहीं दी गई।

ऑडिटर ने यह भी बताया कि जिन लेनदेन की जांच की जा रही थी, उनमें से बड़ी संख्या की पुष्टि नहीं हो सकी क्योंकि उनसे जुड़े दस्तावेज या तो अधूरे थे या उपलब्ध ही नहीं कराए गए।

सेबी के अंतरिम आदेश के मुताबिक, 7,000 करोड़ रुपये से अधिक के लेनदेन के नमूनों की जांच की गई, लेकिन इनमें से केवल एक छोटे हिस्से के लिए ही पूरे दस्तावेज उपलब्ध कराए गए।

इसी के बाद जांच का दायरा सिर्फ बकाया रकम (रिसीवेबल्स) तक सीमित नहीं रहा। सेबी ने यह भी जांच शुरू कर दी कि कंपनी द्वारा पेश किए गए वित्तीय आंकड़ों और कारोबारी दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि की जा सकती है या नहीं।

स्विस सहायक कंपनियां क्यों हैं सेबी की जांच के केंद्र में?

सेबी की चिंताओं को समझने के लिए राजेश एक्सपोर्ट्स के विदेशी कारोबारी ढांचे को समझना जरूरी है।

इस पूरी संरचना के शीर्ष पर भारत स्थित राजेश एक्सपोर्ट्स लिमिटेड (REL) है। इसके नीचे कंपनी की पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी REL सिंगापुर है। कंपनी के अनुसार, REL सिंगापुर मुख्य रूप से एक होल्डिंग कंपनी है और इसकी रोजमर्रा के कारोबार में कोई बड़ी भूमिका नहीं है।

REL सिंगापुर के पास स्विट्जरलैंड स्थित ग्लोबल गोल्ड रिफाइनरीज एजी (GGR) का स्वामित्व है। राजेश एक्सपोर्ट्स ने GGR को भी एक होल्डिंग कंपनी बताया है, जिसका काम समूह की अन्य कंपनियों में हिस्सेदारी रखना है।

GGR के तहत वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) आती है, जो स्विट्जरलैंड की एक प्रमुख गोल्ड रिफाइनरी है। राजेश एक्सपोर्ट्स लंबे समय से वैलकैम्बी को अपने समूह की सबसे महत्वपूर्ण परिचालन इकाई बताती रही है। कंपनी का दावा है कि समूह के अधिकांश अंतरराष्ट्रीय कारोबार का संचालन इसी इकाई के जरिए होता है।

इसी विदेशी ढांचे और उससे जुड़े वित्तीय लेनदेन को लेकर सेबी सवाल उठा रही है। नियामक यह समझने की कोशिश कर रहा है कि समूह की विभिन्न विदेशी कंपनियों के बीच कारोबार और धन का प्रवाह किस तरह हुआ और क्या निवेशकों को इससे जुड़ी सभी महत्वपूर्ण जानकारियां समय पर उपलब्ध कराई गई थीं।

सेबी के मुताबिक, राजेश एक्सपोर्ट्स की विदेशी सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियां समूह के कारोबार का अहम हिस्सा थीं। नियामक का कहना है कि ये कंपनियां केवल सहायक इकाइयां नहीं थीं, बल्कि समूह के अधिकांश कारोबार का आधार थीं।

वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच राजेश एक्सपोर्ट्स ने करीब 15.45 लाख करोड़ रुपये का समेकित राजस्व (कंसोलिडेटेड रेवेन्यू) दिखाया। इसमें से लगभग 15.18 लाख करोड़ रुपये का राजस्व सहायक और स्टेप-डाउन सहायक कंपनियों से जुड़ा बताया गया। हालांकि, सेबी का आरोप है कि इनमें से करीब 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व को पहली नजर में गलत तरीके से दर्शाया गया हो सकता है।

जांच के दौरान सेबी ने स्विट्जरलैंड स्थित कंपनी वैलकैम्बी एसए (Valcambi SA) के ऑडिटेड स्टैंडअलोन वित्तीय आंकड़ों का भी अध्ययन किया। नियामक के अनुसार, संबंधित वर्षों में वैलकैम्बी का वार्षिक राजस्व लगभग 427 करोड़ रुपये से 743 करोड़ रुपये के बीच रहा। दूसरी ओर, जीजीआर (GGR) और राजेश एक्सपोर्ट्स ने कई लाख करोड़ रुपये के राजस्व का दावा किया, जिससे दोनों आंकड़ों के बीच बड़ा अंतर दिखाई दिया।

इस पर राजेश एक्सपोर्ट्स ने सेबी को बताया कि वैलकैम्बी के स्टैंडअलोन खातों में केवल प्रोसेसिंग शुल्क और वैल्यू एडिशन से होने वाली आय दर्ज की गई थी, जबकि जीजीआर ने सोने के लेनदेन का पूरा मूल्य राजस्व के रूप में दर्ज किया था।

हालांकि, सेबी का कहना है कि कंपनी अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज, अकाउंटिंग विशेषज्ञों की राय, स्वामित्व संबंधी रिकॉर्ड, मिलान विवरण (रिकंसिलिएशन स्टेटमेंट) या लेनदेन स्तर के सबूत उपलब्ध नहीं करा सकी।

अंतरिम आदेश में सेबी ने कहा है कि केवल राजस्व का आकार ही चिंता का विषय नहीं है, बल्कि समस्या यह है कि बार-बार मांग किए जाने के बावजूद इन राजस्व आंकड़ों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी।

अपने विश्लेषण के आधार पर सेबी ने आरोप लगाया है कि वित्त वर्ष 2020-21 से 2024-25 के बीच सहायक कंपनियों से जुड़े लगभग 15.15 लाख करोड़ रुपये के राजस्व को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया हो सकता है।

एफलुएंस से जुड़े लेनदेन पर सेबी के सवाल

सेबी के मुताबिक, वित्त वर्ष 2021-22 से 2023-24 के बीच राजेश एक्सपोर्ट्स ने Affluence Shares and Stocks Pvt Ltd के साथ करीब 11,487 करोड़ रुपये की बिक्री और 11,488 करोड़ रुपये की खरीदारी दिखाई थी। कंपनी के कुल स्टैंडअलोन कारोबार का लगभग दो-तिहाई हिस्सा इन्हीं लेनदेन से जुड़ा बताया गया।

हालांकि, जांच के दौरान एफलुएंस ने सेबी को बताया कि राजेश एक्सपोर्ट्स कभी उसकी ग्राहक नहीं रही और कंपनी के साथ ऐसा कोई लेनदेन नहीं किया गया था।

प्रमोटर के निजी खातों से कारोबार का आरोप

सेबी के अनुसार, एफलुएंस ने यह भी कहा कि उसका कारोबार केवल कंपनी के प्रमोटर राजेश मेहता के साथ व्यक्तिगत स्तर पर था। जांच में यह भी सामने आया कि राजेश मेहता ने अपने निजी खातों के जरिए सोने के डेरिवेटिव्स में ट्रेडिंग की और इन गतिविधियों से जुड़े कुछ लेनदेन में कंपनी के धन का इस्तेमाल किया गया।

सेबी ने आरोप लगाया है कि राजेश एक्सपोर्ट्स से 339 करोड़ रुपये राजेश मेहता को ट्रांसफर किए गए थे। इनमें से केवल 232 करोड़ रुपये ही कंपनी को वापस मिले। नियामक के मुताबिक, इन लेनदेन के लिए न तो बोर्ड की मंजूरी ली गई और न ही ऑडिट समिति की स्वीकृति प्राप्त की गई। साथ ही, इनकी उचित जानकारी भी सार्वजनिक नहीं की गई।

सेबी के अंतरिम आदेश में Elese Pvt Ltd से जुड़े कुछ अन्य लेनदेन का भी जिक्र किया गया है। नियामक इन सौदों की प्रकृति और उनके उद्देश्य की भी जांच कर रहा है।

कंपनी ने क्या कहा?

सेबी के अंतरिम आदेश के मुताबिक, राजेश एक्सपोर्ट्स ने उसके कई निष्कर्षों और टिप्पणियों का विरोध किया है। कंपनी का कहना है कि उसके स्टैंडअलोन और कंसोलिडेटेड वित्तीय विवरणों में पर्याप्त जानकारी दी गई थी और सहायक कंपनियों (सब्सिडियरी) से जुड़ी जानकारी भी इन्हीं खुलासों से समझी जा सकती थी। हालांकि, सेबी ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि सहायक कंपनियों के वित्तीय विवरणों का अलग से खुलासा करना कानूनी रूप से जरूरी है।

विदेशी सहायक कंपनियों से जुड़ी कुछ जानकारी साझा न करने पर कंपनी ने स्विट्जरलैंड के गोपनीयता और डेटा सुरक्षा कानूनों का हवाला दिया। इस पर सेबी ने कहा कि ऐसे कानून भारतीय नियामकों को जरूरी जानकारी देने से बचने का आधार नहीं बन सकते।

राजस्व (रेवेन्यू) के लेखांकन को लेकर भी कंपनी ने अपना पक्ष रखा। राजेश एक्सपोर्ट्स का कहना है कि सोने की रिफाइनिंग के कारोबार की प्रकृति को देखते हुए उसके लेखांकन का तरीका उचित था और इसमें प्रोसेसिंग आय तथा कुल लेनदेन मूल्य के बीच अंतर को ध्यान में रखा गया था। लेकिन सेबी का कहना है कि कंपनी अपने दावों के समर्थन में पर्याप्त दस्तावेज और सबूत पेश नहीं कर सकी।

डिजिटल गोल्ड कारोबार को लेकर कंपनी ने बताया कि वह इसे एमसीएक्स (MCX) के जरिए संचालित करना चाहती थी, लेकिन एक्सचेंज के साथ चल रहे कानूनी विवाद के कारण लेनदेन प्रमोटर राजेश मेहता के व्यक्तिगत खाते के माध्यम से किए गए। कंपनी का दावा है कि राजेश मेहता केवल माध्यम की भूमिका निभा रहे थे और सभी लेनदेन कंपनी की ओर से किए गए थे, इसलिए उन्हें कंपनी के खातों में दर्ज किया गया। हालांकि, सेबी ने कहा कि इस दावे के समर्थन में जरूरी दस्तावेज, मंजूरियां या औपचारिक समझौते उपलब्ध नहीं कराए गए।

सेबी ने स्पष्ट किया है कि जांच अभी जारी है और आगे की कार्यवाही के दौरान कंपनी को अपना पक्ष विस्तार से रखने का पूरा अवसर दिया जाएगा।

यह मामला कितना अहम है?

भारतीय पूंजी बाजार में हाल के वर्षों में सामने आए लेखांकन मामलों में यह सबसे असामान्य और महत्वपूर्ण मामलों में से एक है। इस मामले की गंभीरता इसलिए भी अधिक मानी जा रही है क्योंकि कंपनी में बड़े संस्थागत निवेशकों की हिस्सेदारी है।

हालिया शेयरहोल्डिंग आंकड़ों के अनुसार, Life Insurance Corporation of India (LIC) के पास राजेश एक्सपोर्ट्स में करीब 10.8 प्रतिशत हिस्सेदारी है, जिससे वह कंपनी के सबसे बड़े शेयरधारकों में शामिल है। ऐसे में सेबी की जांच और उसके निष्कर्षों पर निवेशकों और बाजार की नजर बनी हुई है।

अब आगे क्या होगा?

फिलहाल यह ध्यान रखना जरूरी है कि सेबी की ओर से जारी किए गए ये निष्कर्ष शुरुआती जांच (प्राइमा फेसी) पर आधारित हैं। इन्हें अंतिम फैसला नहीं माना जा सकता।

सेबी ने राजेश एक्सपोर्ट्स और कंपनी के प्रमोटर राजेश मेहता को जांच में पूरा सहयोग देने और नए फोरेंसिक ऑडिट में मदद करने का निर्देश दिया है। इसके अलावा, अगले आदेश तक राजेश मेहता को राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयरों की खरीद-बिक्री या किसी भी तरह का लेनदेन करने से रोक दिया गया है।

जांच के अगले चरण में क्या होगा?

अब मामले में कई अहम कदम उठाए जाएंगे, जिनमें शामिल हैं:

  • राजेश एक्सपोर्ट्स और राजेश मेहता की ओर से जवाब दाखिल किया जाएगा।
  • फोरेंसिक जांच को आगे बढ़ाया जाएगा।
  • कंपनी की सहायक (सब्सिडियरी) कंपनियों के रिकॉर्ड की समीक्षा होगी।
  • लेनदेन और वित्तीय खुलासों का सत्यापन किया जाएगा।
  • यदि नियमों के उल्लंघन की पुष्टि होती है तो सेबी सख्त कार्रवाई कर सकती है।
  • एक शिकायत से शुरू हुई बड़ी जांच

जो मामला शुरुआत में पुराने बकाया भुगतान (रिसीवेबल्स) को लेकर एक शेयरधारक की शिकायत तक सीमित था, वह अब भारतीय शेयर बाजार के इतिहास की सबसे बड़ी वित्तीय रिपोर्टिंग जांचों में से एक बन गया है। आने वाले समय में यह साफ होगा कि सेबी के आरोप जांच की कसौटी पर कितने खरे उतरते हैं।

हालांकि, एक साधारण शिकायत से शुरू होकर ₹15.15 लाख करोड़ के राजस्व से जुड़े सवालों तक पहुंचने वाला यह मामला इस बात का बड़ा उदाहरण बन गया है कि लेखांकन से जुड़ी छोटी दिखने वाली गड़बड़ियां भी नियामकों को कहीं बड़े सवालों तक ले जा सकती हैं।

शेयर में दिखा असर

सेबी के अंतरिम आदेश के बाद बाजार ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी। गुरुवार को राजेश एक्सपोर्ट्स के शेयर 5 फीसदी के लोअर सर्किट पर पहुंच गए और बीएसई पर ₹104.65 के स्तर पर बंद हुए।

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First Published - June 4, 2026 | 2:05 PM IST

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