Banking Stocks: दुनियाभर में बढ़ती अनिश्चितता, भू-राजनीतिक तनाव और पश्चिम एशिया संघर्ष के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को जारी अपनी मौद्रिक नीति में सतर्क रुख अपनाया है। नए वित्त वर्ष की पहली मौद्रिक नीति जारी करते हुए आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा ने रीपो रेट को 5.25 फीसदी पर बरकरार रखा है। साथ ही पॉलिसी रुख को भी ‘न्यूट्रल’ बनाए रखा है। रिजर्व बैंक के फैसले के बाद अर्थशास्त्रियों का मानना है कि केंद्रीय बैंक ने धैर्य दिखाया और पॉलिसी रेट को स्थिर रखा। किसी तरह की सख्ती के संकेत नहीं दिये। वहीं, मार्केट एनालिस्ट मानना है कि आरबीआई की ‘वेट एंड वॉच’ रणनीति का सीधा असर बैंकिंग सेक्टर और उससे जुड़े शेयरों पर देखने को मिलेगा।
HDFC बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री साक्षी गुप्ता का कहना है कि रिजर्व बैंक ने जल्दबाजी में कोई कदम उठाने की जगह संतुलित नजरिया अपनाया है। भू-राजनीतिक तनाव और तेल की कीमतों में तेजी के चलते महंगाई में उछाल आने के जोखिम को देखते हुए केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष 2027 के लिए अपने अनुमान को बढ़ाया है। हालांकि जीडीपी ग्रोथ पर रुख सतर्क बना हुआ है। हालांकि, आरबीआई ने यह भी संकेत दिया कि भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियाद मजबूत है।
उन्होंने कहा कि वित्त वर्ष 2027 में महंगाई करीब 4.9% और विकास दर 6.8 से 7% के बीच रह सकती है, बशर्ते मौजूदा पश्चिम एशिया संघर्ष ज्यादा लंबा न चले। ऐसे आउटलुक में ब्याज दरें पूरे साल स्थिर रह सकती हैं। इससे आने वाले दिनों में रुपये में स्थिरता आ सकती है और 10 साल के बॉन्ड यील्ड 6.8–7% के दायरे में रह सकते हैं।
एमके ग्लोबल की चीफ इकोनॉमिस्ट माधवी अरोड़ा का मानना है कि अगर पश्चिम एशिया संकट जारी रहता है, तो आरबीआई के लिए सिर्फ महंगाई नहीं बल्कि वित्तीय स्थिरता भी बड़ा फोकस बन सकती है। फिलहाल ब्याज दरें बढ़ने की संभावना कम है। उन्होंने बैंकिंग सिस्टम पर पड़ने वाले असर के बारे में कहा कि आरबीआई ने बैंकों के लिए पूंजी नियम (CRAR) और रिजर्व नियम आसान किए हैं। NBFC और हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों को फंडिंग के बेहतर विकल्प दिए गए हैं।
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एक्सिस सिक्युरिटीज पीएमएस के चीफ इन्वेस्टमेंट अफसर नवीन कुलकर्णी का मानना है कि दरों में कटौती का चक्र अब खत्म हो सकता है और आरबीआई आगे दरों को स्थिर रखेगा। उनका कहना है कि भले ही पश्चिम एशिया में दो हफ्ते का युद्धविराम घोषित हुआ हो, लेकिन जोखिम अभी भी बरकरार हैं, जो जीडीपी ग्रोथ को प्रभावित कर सकते हैं और महंगाई को ऊपर ले जा सकते हैं।
कुलकर्णी का कहना है कि बैंकिंग सेक्टर की बात करें तो चौथी तिमाही (Q4) मजबूत रहने की उम्मीद है, क्योंकि क्रेडिट ग्रोथ में सुधार देखा गया है। हालांकि, डिपॉजिट जुटाने के लिए प्रतिस्पर्धा अभी भी तेज बनी हुई है, जो बैंकों के लिए एक चुनौती है। अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि भू-राजनीतिक अनिश्चितता का असर MSME, ऑटो फाइनेंस और तेल से जुड़े सेक्टर के कॉर्पोरेट लोन पर कितना पड़ता है।
उनका कहना है कि हालांकि दो हफ्ते का युद्धविराम हुआ है, लेकिन अगर तनाव बढ़ता है, तो वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में क्रेडिट ग्रोथ प्रभावित हो सकती है। मार्जिन अलग-अलग रहेंगे, जहां छोटे और मिड-साइज प्राइवेट बैंक बड़े बैंकों से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। NIM (नेट इंटरेस्ट मार्जिन) पर अगले कुछ महीनों में खास ध्यान रहेगा, क्योंकि फंडिंग लागत (CoD) अभी भी ऊंची बनी हुई है। चौथी तिमाही आमतौर पर एसेट क्वालिटी के लिए अच्छी होती है और इस बार भी ऐसा ही रहने की उम्मीद है।
हालांकि, भू-राजनीतिक जोखिमों का असर बैंकों की एसेट क्वालिटी पर पड़ सकता है, जिस पर मैनेजमेंट की कमेंट्री अहम होगी। निवेश के लिए चुनिंदा बैंक बेहतर रहेंगे, जिनके पास डायवर्सिफाइड पोर्टफोलियो, मजबूत डिपॉजिट बेस, पर्याप्त पूंजी और आकर्षक वैल्यूएशन हो।
कुलकर्णी का कहना है कि मौजूदा समय में बड़े Banking stocks में ICICI बैंक, कोटक महिंद्रा बैंक और SBI पसंदीदा हैं, जबकि मिड और छोटे बैंकों में फेडरल बैंक, AU स्मॉल फाइनेंस बैंक और उज्जीवन स्मॉल फाइनेंस बैंक बेहतर विकल्प माने जा रहे हैं।