एचडीएफसी ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी में इक्विटी प्रमुख चिराग सीतलवाड का कहना है कि इक्विटी बाजारों में गिरावट के बाद मूल्यांकन अब काफी अनुकूल हो गए हैं। इससे पहले के मुकाबले खास शेयरों को चुनने के मौके भी बढ़ गए हैं। अभिषेक कुमार के साथ ईमेल बातचीत में सीतलवाड ने निवेशकों को सलाह दी है कि वे बाजार की मौजूदा अस्थिरता से निपटने के लिए थोड़ा-थोड़ा और एकमुश्त निवेश दोनों तरह के तरीकों का मिलाजुला इस्तेमाल करें। बातचीत के अंश:
इस समय घरेलू बाजार को आप कैसे देखते हैं? पश्चिम एशिया संघर्ष शुरू होने के बाद से आपने पोर्टफोलियो में किस तरह के बदलाव किए हैं?
अमेरिका-ईरान संघर्ष से पहले और बाद दोनों ही समय में पूरे बाजार में ठीक-ठाक गिरावट देखने को मिली। युद्ध विराम के बाद बाजार में शानदार तेजी आई है। असल में, मिडकैप और स्मॉलकैप, दोनों ही सूचकांक अब जंग से पहले के अपने स्तरों से ऊपर कारोबार कर रहे हैं। कुल मिलाकर, आज मूल्यांकन कहीं ज्यादा समझदारी भरे हैं और हमें पहले के मुकाबले अब ज्यादा शेयर-विशिष्ट अवसर दिखाई दे रहे हैं। हालांकि इस संघर्ष का असर व्यापक हो सकता है। लेकिन यह संभवतः कम समय के लिए ही रहेगा। हम लंबी अवधि का दृष्टिकोण अपनाते हैं। इसलिए अपने पोर्टफोलियो में कोई भी तात्कालिक बदलाव नहीं करते हैं। हमारा नकदी स्तर व्यापक आर्थिक संकेतों के बजाय विशिष्ट शेयरों से जुड़े अवसरों पर आधारित होता है। इसलिए इसमें भी कोई बदलाव नहीं किया गया है।
चालू वित्त वर्ष के लिए कमाई में वृद्धि पर आपके क्या अनुमान हैं? क्या मूल्यांकन अभी भी आकर्षक बने हुए हैं?
पिछली 6-8 तिमाहियों में आय में बढ़ोतरी धीमी रही है और युद्ध से पहले इस साल ठीक-ठाक बढ़ोतरी की उम्मीद थी। हालांकि, इस संघर्ष ने कमाई की संभावनाओं पर संदेह खड़ा कर दिया है, जिसकी वजह कच्चे माल की बढ़ती कीमतें, सामग्री की कमी और लोगों के मूड पर असर और नतीजतन मांग में कमी है। कम समय में बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि यह लड़ाई कितनी जल्दी और किस रूप में खत्म होगी। लेकिन, इससे भी ज्यादा अहम बात यह कि इससे लंबी अवधि की बढ़त के नजरिये में कोई बदलाव नहीं आया है, वह अभी भी मजबूत बना हुआ है। 2023-2024 में जबरदस्त तेजी के बाद, भारतीय बाजार अपने लंबी अवधि के औसत के मुकाबले काफी ज्यादा प्रीमियम पर कारोबार कर रहा था, खासकर छोटे और मझोले शेयरों के मामले में, जिनमें यह बढ़त बहुत अधिक थी। लेकिन पिछले 2 साल में हमने इनमें गिरावट देखी है।
अगर तेल की कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो किन सेक्टर पर सबसे ज्यादा असर पड़ने की आशंका है?
तेल की बढ़ती कीमतें कम समय के लिए अर्थव्यवस्था को कई मोर्चों पर नुकसान पहुंचा सकती हैं। ये राजकोषीय और चालू खाता, दोनों तरह के घाटे को बढ़ा सकती हैं, महंगाई के दबाव में इजाफा कर सकती हैं और कुल मिलाकर विकास की गति को धीमा कर सकती हैं। हालांकि, असर किस हद तक होगा, यह अभी स्पष्ट नहीं है और यह इस पर निर्भर करेगा कि यह लड़ाई कब तक चलती है और इसका क्या समाधान निकलता है।
फिलहाल कौन से क्षेत्र या थीम ज्यादा आकर्षक लग रहे हैं?
इस समय आईटी और वित्तीय क्षेत्र दोनों ऐसे मूल्यांकन पर कारोबार कर रहे हैं जो उनके दीर्घावधि औसत से कम है। आईटी सेक्टर को एआई के मोर्चे पर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और इस बात को भी ध्यान में रखना जरूरी है। बैंकिंग सेक्टर में, जहां एक तरफ ऋण वितरण कुछ धीमा है, वहीं परिसंपत्ति गुणवत्ता अभी भी अच्छी बनी हुई है। हालांकि इन सेक्टरों का मूल्यांकन काफी आकर्षक है, फिर भी हम अपने पोर्टफोलियो में ‘टॉप-डाउन’ अप्रॉच के बजाय ‘बॉटम-अप’ नजरिया अपनाना ज्यादा पसंद करते हैं।