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Gold investment: डॉलर छोड़ सोने की तरफ दौड़े बड़े देश! क्या आपकी बचत सही जगह लगी है? जानें एक्सपर्ट्स की राय

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अमेरिकी डॉलर लंबे समय से दुनियाभर की सबसे मजबूत मुद्रा रहा है, लेकिन अब कई देश इससे दूरी बनाना चाहते हैं।

Last Updated- April 08, 2025 | 6:07 PM IST
Electronic Gold Receipts

पिछले कुछ सालों में दुनिया के बड़े सेंट्रल बैंकों ने अपने विदेशी रिज़र्व में सोने की हिस्सेदारी बढ़ा दी है। साल 2024 में कुल 1,045 टन सोना खरीदा गया, जो दिखाता है कि अब देश अपनी अर्थव्यवस्था को सुरक्षित करने के लिए सोने को ज़रूरी बना रहे हैं। इसका सबसे बड़ा कारण ये है कि दुनियाभर में आर्थिक हालात अस्थिर हैं—ब्याज दरें गिर रही हैं, महंगाई बढ़ रही है और कई देशों के बीच तनाव बना हुआ है। ऐसे में सोना एक ऐसा ज़रिया बन गया है, जो किसी भी सरकार या मुद्रा पर निर्भर नहीं होता।

डॉलर से दूरी बनाने की मुहिम में सोना बना सबसे बड़ा सहारा

अमेरिकी डॉलर लंबे समय से दुनियाभर की सबसे मजबूत मुद्रा रहा है, लेकिन अब कई देश इससे दूरी बनाना चाहते हैं। इस “डॉलर पर निर्भरता कम करो” अभियान की शुरुआत चीन ने की थी। चीन चाहता है कि उसका विदेशी पैसा सिर्फ डॉलर में न हो, इसलिए उसने सोने की खरीद बढ़ाई। अब चीन के साथ-साथ भारत, रूस, तुर्की और कज़ाखस्तान जैसे देश भी इसी राह पर हैं। सोना इसलिए भी पसंद किया जा रहा है क्योंकि इसकी कीमतें किसी एक देश की नीतियों पर निर्भर नहीं होतीं।

क्यों बैंकों के लिए इतना जरूरी हो गया है सोना?

जब दुनियाभर में हालात खराब होते हैं—जैसे कि युद्ध, व्यापार विवाद या आर्थिक मंदी—तो सबसे पहले असर मुद्रा पर पड़ता है। ऐसे वक्त में सोना एक ऐसा विकल्प है, जिसकी मांग हमेशा बनी रहती है। यही वजह है कि सेंट्रल बैंक इसे अब बड़ी मात्रा में खरीद रहे हैं। उन्हें यकीन है कि इससे उनके रिज़र्व सुरक्षित रहेंगे और विदेशी मुद्रा में उतार-चढ़ाव का असर कम पड़ेगा।

क्या आम निवेशकों को भी सोने में निवेश करना चाहिए?

सोना सिर्फ सरकारों या बैंकों के लिए ही नहीं, आम लोगों के लिए भी हमेशा से एक भरोसेमंद निवेश रहा है। इस बारे में कमल ज्वेलरी के मैनेजिंग डायरेक्टर कॉलिन शाह कहते हैं कि जब भी दुनिया में किसी तरह का संकट आता है, निवेशक सबसे पहले सोने की तरफ भागते हैं। यही वजह है कि इसे “सेफ हेवन” यानी सुरक्षित ठिकाना कहा जाता है।

हालांकि, आनंद राठी वेल्थ के डायरेक्टर चेतन शेनॉय का मानना है कि सोना पूरी निवेश रणनीति का सिर्फ एक हिस्सा होना चाहिए। उनके मुताबिक, एक संतुलित पोर्टफोलियो में 80 फीसदी निवेश शेयर बाजार में और बाकी 20 फीसदी डेट यानी फिक्स्ड इनकम और सोने में होना चाहिए। सोने की हिस्सेदारी कुल निवेश का 5 से 10 फीसदी से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

सोने की कमाई में उतार-चढ़ाव, शेयर बाज़ार से पीछे

हालांकि सोना एक सुरक्षित विकल्प है, लेकिन हर बार ये बहुत अच्छा मुनाफा नहीं देता। पिछले पांच सालों में कई बार ऐसा हुआ जब सोने का रिटर्न सिर्फ 1.73 फीसदी ही रहा। वहीं दूसरी तरफ, शेयर बाजार का Nifty 50 इंडेक्स लगातार अच्छा और स्थिर मुनाफा देता आया है। इससे पता चलता है कि अगर आप ज्यादा मुनाफा चाहते हैं और थोड़ी रिस्क ले सकते हैं, तो इक्विटी यानी शेयरों में निवेश ज़्यादा बेहतर हो सकता है।

भारत में सोने से जुड़ी भावनाएं और ज्यादा निवेश

भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं, एक परंपरा है। त्योहारों, शादियों और खास मौकों पर सोना खरीदना आम बात है। यही वजह है कि भारतीय घरों में सोने की हिस्सेदारी बाकी दुनिया के मुकाबले कहीं ज़्यादा है। लेकिन जानकारों की मानें तो भावनाओं से ज़्यादा जरूरी है निवेश में समझदारी। सोना पोर्टफोलियो का हिस्सा हो सकता है, लेकिन पूरा भरोसा सिर्फ उसी पर नहीं किया जाना चाहिए।

क्या आने वाले समय में सोने की कीमतें और बढ़ेंगी?

कॉलिन शाह का मानना है कि आने वाले दिनों में सोने की कीमतों में और उछाल आ सकता है। उनके मुताबिक, इसके पीछे चार बड़े कारण होंगे — अमेरिका और चीन के बीच चल रहा व्यापार युद्ध, मंदी की आशंका, रूस-यूक्रेन और मिडिल ईस्ट में तनाव, और सेंट्रल बैंकों की लगातार हो रही खरीद। उन्होंने यह भी कहा कि अगर यह हालात बने रहे, तो भारत में सोना ₹1 लाख प्रति 10 ग्राम और अंतरराष्ट्रीय बाजार में $3,200 प्रति औंस तक पहुंच सकता है।

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First Published - April 8, 2025 | 6:04 PM IST

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