भारत में पेट्रोल और डीजल के विकल्प तलाशने की कोशिश अब एक नए मोड़ पर पहुंच गई है। पिछले हफ्ते देश की दो बड़ी वाहन कंपनियों मारुति सुजुकी और हीरो मोटोकॉर्प ने अपने पहले फ्लेक्स-फ्यूल वाहन लॉन्च करने का ऐलान किया। मारुति ने फ्लेक्स-फ्यूल वैगनआर पेश की, जबकि हीरो ने स्प्लेंडर प्लस और एचएफ डीलक्स के फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल उतारे। फ्लेक्स-फ्यूल वाहन ऐसी गाड़ियां होती हैं जो एक ही टैंक में पेट्रोल-एथेनॉल मिश्रण या फिर सिर्फ एथेनॉल यानी E100 पर भी चल सकती हैं।
लॉन्च के मौके पर सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी भी मौजूद थे। गडकरी ने इसे भारत के ऊर्जा बदलाव की दिशा में एक नया अध्याय बताया, जबकि पुरी ने वाहन कंपनियों से ज्यादा फ्लेक्स-फ्यूल मॉडल लाने और तेल कंपनियों से देशभर में E85 ईंधन की उपलब्धता तेजी से बढ़ाने की अपील की।
इस सवाल का जवाब पश्चिम एशिया में छिपा है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हुई हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत भले आगे बढ़ी हो, लेकिन होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। यही वह समुद्री रास्ता है, जहां से भारत अपने आयातित तेल का बड़ा हिस्सा मंगाता है।
भारत अपनी जरूरत का करीब 90 फीसदी कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। इसलिए तेल की कीमत बढ़ने का सीधा असर देश के आयात बिल और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। यही वजह है कि सरकार ऐसे ईंधनों को बढ़ावा देना चाहती है जिन्हें देश में ही बनाया जा सके। इससे विदेशी मुद्रा की बचत होगी और ऊर्जा के मामले में भारत ज्यादा आत्मनिर्भर बन सकेगा।
यही सबसे बड़ा सवाल है। भारत इस मामले में काफी देर से मैदान में उतरा है। ब्राजील ने 1970 के दशक के तेल संकट के बाद फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देना शुरू कर दिया था। आज वहां बिकने वाली करीब 80 फीसदी नई कारें फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक पर चलती हैं।
भारतीय कंपनी बजाज ऑटो भी 2023 से ब्राजील में फ्लेक्स-फ्यूल दोपहिया वाहन (27.5% एथनॉल मिक्स) बेच रही है। कंपनी पूरी तरह एथेनॉल से चलने वाली पल्सर NS160 भी दिखा चुकी है। इसके अलावा टाटा पंच, हुंडई क्रेटा, टोयोटा इनोवा हाईक्रॉस और टीवीएस रेडर जैसे मॉडल भी फ्लेक्स-फ्यूल तकनीक के साथ पेश किए जा चुके हैं।
अब तक देश के पेट्रोल पंपों पर E85 जैसे ईंधन उपलब्ध नहीं थे। लेकिन 5 जून को सरकार ने घोषणा की कि E85, जिसमें 85 फीसदी एथेनॉल होता है, देश के 49 सरकारी पेट्रोल पंपों पर मिलेगा। इसकी कीमत 82.12 रुपये प्रति लीटर रखी गई है, जो पेट्रोल से करीब 20 फीसदी सस्ती है। सरकार की योजना है कि दिसंबर तक ऐसे पंपों की संख्या 500 और 2027 के अंत तक 5,000 कर दी जाए।
सुनने में यह संख्या बड़ी लग सकती है, लेकिन देश में कुल करीब 1 लाख पेट्रोल पंप हैं। यानी 2027 तक भी E85 सिर्फ 5 फीसदी पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध होगा। ऊपर से इनमें से ज्यादातर बड़े शहरों में होंगे। यही वजह है कि कई वाहन कंपनियां इस योजना को लेकर अभी पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं।
एक बड़ी कार कंपनी के वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं कि अगर ईंधन ही आसानी से उपलब्ध नहीं होगा तो फ्लेक्स-फ्यूल वाहन एक सीमित बाजार तक ही सिमट कर रह जाएंगे। वे किसी बड़े बदलाव की वजह नहीं बन पाएंगे।
दिलचस्प बात यह है कि सीएनजी का नेटवर्क फ्लेक्स-फ्यूल से कहीं ज्यादा बड़ा है। देश में 8,600 से ज्यादा सीएनजी स्टेशन हैं। इसके बावजूद कुल पंजीकृत वाहनों में सीएनजी की हिस्सेदारी सिर्फ 2.5 फीसदी है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब इतने बड़े नेटवर्क के बावजूद सीएनजी की पहुंच सीमित है, तो फ्लेक्स-फ्यूल कितनी तेजी से आगे बढ़ पाएगा? वैश्विक स्तर पर भी फ्लेक्स-फ्यूल अभी एक छोटा बाजार है। दुनिया के कुल वाहनों में इनकी हिस्सेदारी सिर्फ 3 फीसदी है। इनमें से भी 55 से 60 फीसदी वाहन अकेले ब्राजील में हैं।
ग्रेन एथेनॉल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन (GEMA) के अध्यक्ष सी.के. जैन का दावा है कि भारत में एथेनॉल की कोई कमी नहीं है। उनके मुताबिक देश में हर साल करीब 22 अरब लीटर एथेनॉल उत्पादन की क्षमता है। लेकिन E20 कार्यक्रम के बावजूद इसका सिर्फ आधा हिस्सा ही इस्तेमाल हो रहा है। जैन का कहना है कि अगर सरकार पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट 20 फीसदी से बढ़ाकर 30 फीसदी कर देती है, तो अतिरिक्त 5 अरब लीटर एथेनॉल की मांग पैदा हो जाएगी।
उनका दावा है कि अगले 2 से 3 साल में नए प्लांट लगने से उत्पादन क्षमता में 10 अरब लीटर और जोड़ना मुश्किल नहीं होगा। यानी अगर फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की मांग बढ़ती है, तो उसकी आपूर्ति भी की जा सकती है। उनका अनुमान है कि अगले कुछ वर्षों में 10 से 20 फीसदी वाहन फ्लेक्स-फ्यूल के अनुकूल हो सकते हैं।
भारत में बनने वाले करीब 70 फीसदी एथेनॉल का उत्पादन मक्का, टूटे चावल और दूसरे अनाजों से होता है। बाकी एथेनॉल गन्ने से तैयार किया जाता है। कुछ कंपनियां फसल के अवशेष यानी कृषि कचरे से भी एथेनॉल बनाने की कोशिश कर रही हैं। हालांकि ऐसी परियोजनाओं में निवेश अभी काफी महंगा है।
मारुति सुजुकी के चेयरमैन आर.सी. भार्गव का कहना है कि तकनीक तैयार है, लेकिन कई बुनियादी सवालों के जवाब अभी बाकी हैं। उनके मुताबिक सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि भविष्य में इतनी बड़ी मात्रा में एथेनॉल उपलब्ध होगा या नहीं। दूसरा सवाल यह है कि एथेनॉल और बायोगैस में से कौन बेहतर विकल्प है। तीसरी चिंता पानी को लेकर है। एथेनॉल उत्पादन में कितना पानी खर्च होता है और इसका पर्यावरण पर क्या असर पड़ेगा, इस पर भी गंभीर चर्चा की जरूरत है।
यहीं पर कहानी थोड़ी पेचीदा हो जाती है। E85 पेट्रोल से करीब 20 फीसदी सस्ता है। लेकिन एथेनॉल की ऊर्जा क्षमता पेट्रोल से कम होती है। इसलिए गाड़ी को उतनी ही दूरी तय करने के लिए ज्यादा ईंधन चाहिए होता है। यानी भले ईंधन सस्ता हो, लेकिन माइलेज कम मिलने के कारण प्रति किलोमीटर खर्च बढ़ सकता है। अनुमान है कि E85 पर चलने वाली गाड़ियों की रनिंग कॉस्ट E20 के मुकाबले 7 से 14 फीसदी तक ज्यादा हो सकती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो पर्यावरण के लिए बेहतर विकल्प चुनने पर ग्राहक को कुछ अतिरिक्त पैसा खर्च करना पड़ सकता है। वाहन कंपनियों का कहना है कि अगर E85 की कीमत 77 रुपये प्रति लीटर या उससे कम हो जाए, तभी इसकी रनिंग कॉस्ट पेट्रोल से कम होगी।
ब्राजील में स्थिति अलग है। वहां फ्लेक्स-फ्यूल की कीमत पेट्रोल से 65 से 70 फीसदी तक कम होती है। भारत में यह अंतर सिर्फ 20 फीसदी है।
सी.के. जैन का कहना है कि एथेनॉल उत्पादक कंपनियां औसतन 70 रुपये प्रति लीटर की दर से तेल कंपनियों को एथेनॉल बेचती हैं। ऐसे में अगर कीमत और घटाई जाती है, तो उसका सीधा असर किसानों और एथेनॉल उत्पादकों की आय पर पड़ेगा।
शुरुआत में फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों की कीमत सामान्य पेट्रोल गाड़ियों से ज्यादा हो सकती है। ब्राजील में भी ऐसा ही हुआ था, जहां दोनों के बीच 6 से 8 फीसदी का अंतर था। इसकी वजह यह है कि एथेनॉल पेट्रोल के मुकाबले ज्यादा संक्षारक होता है। इसलिए फ्यूल पंप, इंजेक्टर और दूसरे कई हिस्सों को नए सिरे से डिजाइन करना पड़ता है। इसके अलावा एथेनॉल सेंसर और कुछ खास सील जैसे पुर्जे अभी आयात करने पड़ते हैं।
हालांकि अच्छी खबर यह है कि जैसे-जैसे उत्पादन बढ़ेगा और पुर्जों का स्थानीयकरण होगा, कीमतों का यह अंतर कम हो सकता है। हीरो मोटोकॉर्प के मामले में फ्लेक्स-फ्यूल और पेट्रोल मॉडल के बीच कीमत का अंतर सिर्फ 172 रुपये से लेकर करीब 2,400 रुपये तक है।
सरकार का कहना है कि एथेनॉल मिश्रण कार्यक्रम की वजह से देश करीब 1.84 लाख करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा बचा चुका है। इसी बीच भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने E30 मानकों को भी मंजूरी दे दी है। यानी भविष्य में पेट्रोल में 30 फीसदी तक एथेनॉल मिलाने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि इसके लिए वाहन कंपनियों को अपने इंजन में बदलाव करने होंगे और तेल कंपनियों को अतिरिक्त भंडारण क्षमता तैयार करनी होगी।
सवाल यह नहीं है कि भारत इलेक्ट्रिक वाहनों को चुनेगा या फ्लेक्स-फ्यूल को। असल में सरकार अब कई विकल्पों पर एक साथ दांव लगाना चाहती है। फिलहाल उसका सबसे बड़ा फोकस इलेक्ट्रिक वाहनों पर है। 2030 तक सभी श्रेणियों में बिकने वाले नए वाहनों में 30 फीसदी हिस्सेदारी ईवी की करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन वित्त वर्ष 2026 में ईवी की हिस्सेदारी सिर्फ 8.5 फीसदी रही। ऐसे में लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं दिखता। यही वजह है कि सरकार अब प्लग-इन हाइब्रिड, सीएनजी, बायोगैस और फ्लेक्स-फ्यूल जैसे सभी विकल्पों को साथ लेकर चलना चाहती है।
क्रिसिल रेटिंग्स की निदेशक पूनम उपाध्याय का कहना है कि E100 और फ्लेक्स-फ्यूल वाहनों को बढ़ावा देने का मकसद आयातित जीवाश्म ईंधन पर भारत की निर्भरता कम करना है। हालांकि फ्लेक्स-फ्यूल कार और दोपहिया वाहन लॉन्च हो चुके हैं, लेकिन उनकी डिलीवरी अभी शुरू नहीं हुई है और ईंधन उपलब्ध कराने का ढांचा भी अभी तैयार किया जा रहा है।
उनके मुताबिक ऑटो उद्योग के लिए यह ईवी और सीएनजी के साथ एक नया अवसर है। लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ईंधन का नेटवर्क कितनी तेजी से फैलता है और ग्राहक इसे कितनी जल्दी अपनाते हैं।
यानी फिलहाल फ्लेक्स-फ्यूल भारत के लिए एक बड़ा प्रयोग है। यह प्रयोग कितना सफल होगा, इसका फैसला सिर्फ वाहन कंपनियां नहीं, बल्कि पेट्रोल पंपों का नेटवर्क, एथेनॉल की उपलब्धता, कीमतें और सबसे बढ़कर ग्राहक करेंगे।