Cotton Price Surge: कपास की कीमतें हर दिन तेजी से मजबूत हो रही है। चालू महीने में कपास के दाम करीब 10 फीसदी मजबूत हो चुके हैं। बेमौसम बारिश से फसल को हुए नुकसान के कारण उत्पादन में कमी आने की आशंका और अंतरराष्ट्रीय बाजार के संकेत के कारण घरेलू बाजार में कपास महंगी हो रही है। इसने टेक्सटाइल उद्योग के सामने गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है। चुनौती से निटपने के लिए टेक्सटाइल उद्योग ने सरकार से ड्यूटी फ्री कपास आयात की अनुमति की मांग की है।
कपास कमी की बढ़ती आशंका का असर वायदा कारोबार में साफ नजर आ रहा है। चालू महीने में कपास का भाव लगातार बढ़ता जा रहा है। एमसीएक्स में आज कॉटन चार फीसदी उछल कर 29,550 रुपये प्रति बेल्स (170 किलोग्राम) पहुंच गया जो कि एक अप्रैल को 26,000 रुपये के नीचे कारोबार कर रहा था।
हाजिर बाजार में भी कपास लगातार महंगा हो रहा है। चालू महीने में हाजिर बाजार में कपास के भाव 10 फीसदी से ज्यादा चढ़ चुके हैं और इस साल जनवरी से अभी तक करीब 14 फीसदी कीमतें मजबूत हो चुकी हैं। पिछले साल की अपेक्षा इस साल कपास 13.2 फीसदी महंगा बिक रहा है। हाजिर बाजार में कपास (कॉटन 29एमएम) की कीमत बढ़कर 29,270 रुपये प्रति गांठ हो गई। जबकि मार्च के आखिर में इसका भाव 25,979 रुपये बोला जा रहा था।
Also Read: बिल्डरों का इस साल भी जमीन पर दांव, Q1 में ₹18,000 करोड़ के सौदे; टियर-1 शहरों का दबदबा
कपास की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी से सबसे ज्यादा निर्यातक प्रभावित हैं, जो लंबे समय के अनुबंध के तहत काम करते हैं और अचानक बढ़ी लागत को कीमतों में शामिल नहीं कर पा रहे हैं। उद्योग जगत के लोगों का कहना है कि तत्काल निर्यातक प्रभावित हुए है लेकिन इसका पूरे टेक्सटाइल वैल्यू चेन पर पड़ेगा। स्पिनिंग मिलों से लेकर गारमेंट निर्यातकों तक, सभी पर लागत का दबाव बढ़ रहा है, जिससे उद्योग की वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता पर असर पड़ने की आशंका गहराती जा रही है। यदि यह रुझान जारी रहता है, तो आने वाले महीनों में गारमेंट सेक्टर में उत्पादन लागत और बढ़ सकती है, जिससे निर्यात ऑर्डर प्रभावित हो सकते हैं।
द साउदर्न इंडिया मिल्स एसोसिएशन (SIMA) के महासचिव के. सेल्वराजू ने कहा कपास की कीमतों में यह उछाल ऐसे समय आया है, जब भारत का टेक्सटाइल निर्यात पहले से ही चुनौतियों का सामना कर रहा है। पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण प्रमुख बाजारों में मांग प्रभावित हुई है। हालांकि, यार्न निर्यात अभी चीन की मांग के चलते स्थिर बना हुआ है, लेकिन गारमेंट और फैब्रिक सेगमेंट में अनिश्चितता बढ़ रही है।
उद्योग जगत के मुताबिक इस साल कपास का अनुमानित उत्पादन लगभग 290 लाख गांठ रहा, जबकि घरेलू मांग लगभग 330 लाख गांठ की है। यह अंतर उद्योग को आयात पर निर्भर बनने के लिए मजबूर कर रहा है। इस अंतर को देखते हुए उद्योग ने मई से अक्टूबर के बीच 11 फीसदी आयात शुल्क हटाने की मांग की है, ताकि नए सीजन से पहले आपूर्ति संतुलित रखी जा सके। उद्योग से जुड़े लोगों का तर्क है कि किसानों के पास मार्च के बाद स्टॉक नहीं बचता, इसलिए अस्थायी ड्यूटी छूट से किसानों को नुकसान नहीं होगा। इससे कीमतों में स्थिरता आएगी और निर्यात प्रतिस्पर्धा बनी रहेगी।
Also Read: पश्चिम एशिया संकट से लिकर इंडस्ट्री पर मार, मार्जिन और ग्रोथ दोनों पर दबाव
सरकार पहले 31 दिसंबर 2025 तक ड्यूटी-फ्री आयात की अनुमति दे चुकी है, जिसके तहत करीब 30 लाख गांठ कपास आयात हुआ था, जबकि एडवांस ऑथराइजेशन के जरिए अतिरिक्त 7 लाख गांठ भी आई थी। इसके बावजूद उद्योग को इस साल भी करीब 30 लाख गांठ अतिरिक्त आयात की जरूरत होगी। अप्रैल खत्म होने को है और उद्योग ने सरकार से जल्द फैसला लेने की मांग की है। यदि सरकार समय रहते निर्णय नहीं लेती, तो आने वाले महीनों में कपास की कीमतों में और तेजी आ सकती है। स्पिनिंग मिलों की उत्पादन क्षमता प्रभावित हो सकती है और गारमेंट निर्यात में गिरावट देखने को मिल सकती है।