सोमवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के सामने बुरी तरह लुढ़क गया। दिन के अंत में ये 92.35 पर बंद हुआ, जो अब तक का सबसे निचला स्तर है। पिछले बंद से ये 53 पैसे नीचे गिरा। विदेशी मुद्रा बाजार में रुपया 92.22 पर खुला था, थोड़ी देर के लिए 92.15 तक चढ़ा, लेकिन फिर लगातार गिरता चला गया। शुक्रवार को यह 91.82 पर बंद हुआ था, तब भी 18 पैसे की गिरावट आई थी।
ट्रेडर्स का कहना है कि मिडल ईस्ट में बढ़ते तनाव की वजह से दुनिया भर में कच्चे तेल की कीमतें तेजी से बढ़ रही हैं। इसके साथ ही डॉलर भी मजबूत होता जा रहा है। घरेलू शेयर बाजार में भारी बिकवाली और विदेशी निवेशकों के पैसे निकालने से रुपये पर और दबाव पड़ गया है।
रिपोर्ट लिखे जाने के वक्त ब्रेंट क्रूड, जिसे वैश्विक तेल का बेंचमार्क माना जाता है, 15.18% बढ़कर 106.8 डॉलर प्रति बैरल के आसपास कारोबार कर रहा था। एशियाई कारोबार के दौरान तेल की कीमतों में करीब 25% तक उछाल देखा गया। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ते सैन्य तनाव की वजह से यह स्थिति बनी है। तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई हैं, जो 2022 के बाद पहली बार देखने को मिला है।
छह बड़ी मुद्राओं के मुकाबले डॉलर की मजबूती को दिखाने वाला ‘डॉलर इंडेक्स’ 0.35% बढ़कर 99.33 पर पहुंच गया। इन सभी वजहों से रुपये पर दबाव बढ़ गया है।
मिरे एसेट शेयरखान के रिसर्च एनालिस्ट अनुज चौधरी ने कहा कि कमजोर वैश्विक बाजारों और रातोंरात कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल की वजह से रुपया नए रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। मजबूत डॉलर और विदेशी संस्थागत निवेशकों की निकासी ने भी रुपये पर दबाव बढ़ाया है।
उन्होंने आगे कहा कि मिडल ईस्ट में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण डॉलर मजबूत हो रहा है, इसलिए आने वाले समय में भी रुपये पर इसका उल्टा असर रह सकता है। हालांकि, अगर भारतीय रिजर्व बैंक बाजार में हस्तक्षेप करता है तो इससे रुपये को निचले स्तरों पर सहारा मिल सकता है। उनका अनुमान है कि डॉलर-रुपया स्पॉट रेट 92 से 92.80 के दायरे में रह सकता है।
जबकि मुथूट फिनकॉर्प के मुख्य अर्थशास्त्री अपूर्व जावड़ेकर का कहना है कि कम समय में भारतीय रिजर्व बैंक रुपये को सहारा देता रहेगा, ताकि इसकी ज्यादा गिरावट से तेल आयात का बिल और न बढ़े। हालांकि, इसके साथ ही इस बीच एक अच्छी खबर यह भी है कि भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 4.885 अरब डॉलर बढ़कर 728.494 अरब डॉलर के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है। यह आंकड़ा 27 फरवरी को खत्म हुए हफ्ते का है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार रुपये को सहारा दे सकते हैं, लेकिन कमजोर वैश्विक बाजार और महंगे कच्चे तेल की कीमतें आगे भी चुनौती बनी रह सकती हैं।
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घरेलू शेयर बाजार की बात करें तो आज सेंसेक्स 1,352.74 अंक गिरकर 77,566.16 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी भी 422.40 अंक लुढ़ककर 24,028.05 पर आ गया। यह निफ्टी में पिछले एक महीने का सबसे बड़ा एक दिन का गिरावट वाला सत्र रहा। विदेशी संस्थागत निवेशकों ने शुक्रवार को 6,030.38 करोड़ रुपये के शेयर बेचे।
एशिया-प्रशांत क्षेत्र के शेयरों का MSCI सूचकांक करीब 4% गिर गया, जबकि वॉल स्ट्रीट के फ्यूचर्स भी कमजोर शुरुआत का संकेत दे रहे थे। बॉन्ड बाजार में भी दबाव दिखा। 10 साल की बेंचमार्क बॉन्ड यील्ड लगभग 4 आधार अंक बढ़ गई। टोक्यो से लेकर ब्रिटेन तक बॉन्ड बाजारों में गिरावट देखी गई, क्योंकि कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों से महंगाई बढ़ने का डर बढ़ गया है।
मिडल ईस्ट में बढ़ते संघर्ष का असर सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि दूसरे एशियाई देशों की मुद्राओं पर भी पड़ा है। इंडोनेशियाई रुपिया और फिलीपींस का पेसो भी रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गए। तेल आयात करने वाली एशियाई अर्थव्यवस्थाओं पर इसका खासा दबाव पड़ रहा है।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि दुनिया भर में तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद भारत में महंगाई पर इसका बड़ा असर पड़ने की उम्मीद नहीं है। जनवरी में उपभोक्ता मूल्य मुद्रास्फीति (कंज्यूमर प्राइस इन्फ्लेशन) 2.75% रही, जो भारतीय रिजर्व बैंक के 2% से 6% वाले लक्ष्य दायरे के निचले हिस्से के करीब है। हालांकि इसके बावजूद रुपये पर दबाव साफ नजर आ रहा है। डॉलर-रुपया फॉरवर्ड प्रीमियम बढ़ गए हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि बाजार में आगे रुपये के कमजोर होने का जोखिम माना जा रहा है।
(एजेंसी के इनपुट के साथ)