बुधवार को एशियाई मुद्राओं में गिरावट और कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के साथ-साथ पश्चिम एशिया संकट को लेकर बनी अनिश्चितता के बीच रुपया कमजोर हो गया। स्थानीय मुद्रा पिछले बंद भाव 93.50 प्रति डॉलर के मुकाबले 93.80 प्रति डॉलर पर बंद हुई। डीलरों के अनुसार अत्यधिक उतार-चढ़ाव को रोकने के लिए आरबीआई ने संभवतः डॉलर बेचकर हस्तक्षेप किया।
एचडीएफसी सिक्योरिटीज के शोध विश्लेषक दिलीप परमार ने कहा, भारतीय रुपया लगातार तीसरे दिन कमजोर हुआ। राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा संघर्ष विराम आगे बढ़ाने के बाद भी कच्चे तेल की कीमतें मजबूत बनी रहीं। इस भू-राजनीतिक तनाव, आरबीआई द्वारा मुद्रा संबंधी कुछ पाबंदियों में ढील देने के कदम और बाजार में आम तौर पर जोखिम से बचने के माहौल के कारण रुपया दबाव में बना हुआ है। तकनीकी रूप से हाजिर रुपये के लिए 94.15 पर प्रतिरोध और 93.40 पर समर्थन है।
बाजार के कारोबारियों ने बताया कि घरेलू शेयरों में लगातार बिकवाली के दबाव और विदेशी पूंजी के लगातार बाहर जाने की वजह से रुपया और कमजोर हो गया। एक सरकारी बैंक के डीलर ने कहा, युद्ध के माहौल में विदेशी निवेशकों की बिकवाली को देखते हुए रुपया एशियाई मुद्राओं के अनुरूप ही रहा। उन्होंने कहा, अनिश्चितता के माहौल में हम रुपये को और नीचे जाते हुए देखेंगे। सरकारी बैंको के साथ आरबीआई भी बाजार में मौजूद था।
इस हफ्ते रुपया दबाव में रहा। पिछले चार दिनों से ट्रेडरों को उम्मीद थी कि तेल से जुड़ी डॉलर मांग में फिर से तेजी आएगी। पिछले शुक्रवार के बाद से, जब रुपया 92.93 प्रति डॉलर पर बंद हुआ था, घरेलू मुद्रा में लगभग एक रुपये की गिरावट आई है। केंद्रीय बैंक के कई उपाय करने के बावजूद इस महीने की शुरुआत में 92.50 प्रति डॉलर तक मजबूत होने के बाद से स्थानीय मुद्रा में लगातार गिरावट जारी है।
फिनरेक्स ट्रेजरी एडवाइजर्स एलएलपी के ट्रेजरी प्रमुख और कार्यकारी निदेशक अनिल कुमार भंसाली ने कहा, एसबीआई को तेल कंपनियों की ओर से डॉलर खरीदते हुए देखा गया, जिससे रुपया कमजोर हुआ। ऐसा लगता है कि आरबीआई इन डॉलरों की आपूर्ति के लिए 93.87 के स्तर पर मौजूद था। उन्होंने कहा, यह भी संभावना थी कि कोई पेट्रोकेमिकल कंपनी रूस से तेल की आपूर्ति के लिए डॉलर खरीद रही हो।
चालू कैलेंडर वर्ष में रुपया अब तक 4.18 फीसदी कमज़ोर हुआ है। हालांकि अप्रैल में स्थानीय मुद्रा 1.08 फीसदी मजबूत हुई है।