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मिडिल ईस्ट में तनाव के बीच तेल और गैस की सप्लाई पर सरकार की पैनी नजर, कहा: घबराने की जरूरत नहीं

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मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध के बीच भारत सरकार तेल सप्लाई और कीमतों पर नजर रख रही है, ताकि आम जनता पर महंगाई की मार न पड़े

Last Updated- March 02, 2026 | 6:54 PM IST
crude oil
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य टकराव के बीच भारत के तेल मंत्रालय ने सोमवार को कहा कि वह हालात पर लगातार नजर रख रहा है। मंत्रालय ने साफ किया कि देश में जरूरी पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता और उनकी कीमत काबू में रखने के लिए हर जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

बता दें कि भारत अपनी जरूरत का करीब 88 फीसदी कच्चा तेल (क्रूड ऑयल) आयात करता है और प्राकृतिक गैस की लगभग आधी जरूरत भी बाहर से पूरी करता है। इनमें से ज्यादातर आपूर्ति ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) के रास्ते आती है। हाल ही में अमेरिका और इजरायल के हमलों के बाद ईरान ने इस रास्ते को बंद करने की धमकी दी है।

पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने मंत्रालय और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों के साथ कच्चे तेल, LPG और अन्य पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति की स्थिति की समीक्षा की। मंत्रालय ने एक्स (X) पर एक पोस्ट में कहा, “हम हालात पर लगातार नजर बनाए हुए हैं और देश में प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता और उनकी कीमत आम लोगों की पहुंच में रहे, इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएंगे।”

Also Read: West Asia Conflict: तेल से लेकर बाहर से आने वाले पैसों तक, इस संकट का भारत पर कितना असर पड़ेगा?

भारत कहां से कितना तेल मंगा रहा?

भारत को अपनी जरूरत का 88 प्रतिशत कच्चा तेल बाहर से मंगाना पड़ता है। इसलिए मध्य पूर्व में कोई भी हलचल भारत को प्रभावित करती है।

पिछले एक साल में भारत ने अपनी तेल खरीद की रणनीति बदली है। रूस अभी भी भारत के लिए एक बड़ा सप्लायर है, लेकिन उसकी हिस्सेदारी ऊपर-नीचे होती रहती है। फरवरी में भारत ने 5.22 मिलियन बैरल प्रति दिन (BPD) कच्चा तेल आयात किया, जो अब तक का दूसरा सबसे ज्यादा रिकॉर्ड है। इसमें रूस की हिस्सेदारी करीब 20 प्रतिशत थी, जबकि मिडिल ईस्ट की हिस्सेदारी बढ़कर 51 प्रतिशत हो गई।

2025 की शुरुआत तक भारतीय रिफाइनर रूस से 37 प्रतिशत और मध्य पूर्व से 45 प्रतिशत तेल ले रहे थे। मार्च 2025 में रिकॉर्ड आयात के दौरान रूस की हिस्सेदारी 36 प्रतिशत थी, जबकि खाड़ी देशों की 38 प्रतिशत थी। लेकिन जनवरी 2026 के पहले तीन हफ्तों में रूसी सप्लाई घटकर 1.1 मिलियन BPD रह गई, जो दिसंबर के औसत से कम है और 2025 के मध्य के 2 मिलियन BPD से काफी नीचे। ये सब डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाली अमेरिकी सरकार के दबाव की वजह से हुआ, जो भारत को रूस से तेल खरीद कम करने के लिए कह रही है।

रूसी सप्लाई कम होने पर पारंपरिक मिडिल ईस्ट सप्लायर आगे आए। इराक की सप्लाई रूस के बराबर पहुंच गई। सऊदी अरब ने जनवरी 2026 में भारत को 924,000 BPD तेल भेजा, जो दिसंबर के 710,000 BPD से ज्यादा है और अप्रैल 2025 के 539,000 BPD के निचले स्तर से काफी ऊपर है।

अब नई मुसीबत ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ के आसपास आ रही है। ये ईरान और ओमान के बीच का एक संकरा जलमार्ग है। अमेरिका-इजरायल के हमलों के बाद ईरान की धमकियों से यहां से तेल और गैस की शिपमेंट्स धीमी हो गई हैं।

दुनिया का करीब 20 प्रतिशत तेल इसी स्ट्रेट से गुजरता है। रोजाना औसतन 20 मिलियन बैरल से ज्यादा कच्चा तेल और ईंधन यहां से जाता है। भारत के लिए तो यहां से 2.5-2.7 मिलियन BPD कच्चा तेल आता है, जिसमें ज्यादातर इराक, सऊदी अरब, UAE और कुवैत से आता है।

इसके अलावा भारत अपनी 80-85 प्रतिशत LPG जरूरत खाड़ी देशों से पूरी करता है, और ज्यादातर शिपमेंट्स इसी चोकपॉइंट से होकर आती हैं। अगर कोई रुकावट आई, तो दुनिया भर में तेल के दाम बढ़ जाएंगे, घरेलू ईंधन महंगा हो जाएगा और महंगाई भी चढ़ेगी।

(एजेंसी के इनपुट के साथ)

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First Published - March 2, 2026 | 6:43 PM IST

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