अमेरिका ने गुरुवार को एक अहम फैसला करते हुए कई देशों को रूस से प्रतिबंधित कच्चा तेल और पेट्रोलियम उत्पाद खरीदने के लिए 30 दिन की छूट देने की घोषणा की है। यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगभग 100 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई हैं।
अमेरिका का मकसद तेल की कीमतों को नियंत्रित करना है। अमेरिकी वित्त विभाग के ऑफिस ऑफ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (ओएफएसी) द्वारा जारी आदेश के अनुसार, यह छूट रूस के उन तेल खेप वाले जहाजों पर लागू होगी जिन्हें 12 मार्च से पहले लादा गया था और यह छूट 11 अप्रैल तक जारी रहेगी।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसंट ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर कहा, ‘यह एक सीमित और अल्पकालिक व्यवस्था है जो केवल पहले से समुद्र में जा रही तेल की खेप पर लागू होगी। इससे रूस सरकार को कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं होगा क्योंकि उसकी ऊर्जा आय का बड़ा हिस्सा तेल के उत्पादन के समय लगाए जाने वाले करों से आता है।’
बेसंट ने यह भी कहा कि अमेरिका, वैश्विक ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने और कच्चे तेल की कीमतों को कम रखने के लिए काम कर रहा है।
इससे पहले 5 मार्च को अमेरिका ने भारत को भी 30 दिन की अस्थायी छूट दी थी ताकि वह रूस से तेल खरीद सके। इसके बाद भारत ने रूस से तेल की खरीद में तेजी दिखानी शुरू कर दी। समुद्री इंटेलिजेंस कंपनी केप्लर के आंकड़ों के अनुसार, मार्च में अब तक भारत ने रूस से रोजाना लगभग 16.3 लाख बैरल कच्चा तेल खरीदा है। 1 मार्च तक समुद्र में लगभग 13.6 करोड़ बैरल रूसी कच्चा तेल जहाजों पर मौजूद था। इनमें से बड़ी मात्रा हिंद महासागर, लाल सागर, स्वेज मार्ग और सिंगापुर के आसपास के समुद्री क्षेत्रों में थी।
अमेरिका की तरफ से छूट दिए जाने के बाद भारत द्वारा रूस से खरीद बढ़ाने के बाद यह मात्रा घटकर लगभग 12 करोड़ बैरल रह गई है। केप्लर के अनुसार, मार्च महीने में अब तक रूस से लगभग 2 करोड़ बैरल कच्चा तेल भारत पहुंच चुका है। वहीं अनुमान है कि पूरे मार्च महीने के दौरान रूस से करीब 2.5 से 3 करोड़ बैरल तेल भारत पहुंच सकता है।
केप्लर के वरिष्ठ विश्लेषक निखिल दुबे ने बताया, ‘अमेरिका द्वारा अन्य देशों को भी रूस से तेल खरीदने की छूट देने से भारत के लिए बहुत अधिक प्रतिस्पर्धा नहीं बढ़ेगी। यह केवल उन तेल खेपों पर लागू होगा जिन्हें निर्धारित तारीख से पहले जहाजों पर लादा गया है और इसकी वैधता मध्य अप्रैल तक ही रहेगी। भारत और चीन पहले से ही रूस से तेल खरीदते रहे हैं हालांकि कुछ खेपों का रुख अन्य देशों की ओर भी हो सकता है।’
अमेरिका के राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन ने यह फैसला ऐसे समय लिया है जब पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष के कारण तेल की कीमतों में तेज उछाल आई है और अमेरिका में मध्यावधि चुनाव भी नजदीक हैं।