डिजिटल लेनदेन में रिकॉर्ड बढ़ोतरी के बावजूद देश में वित्त वर्ष 2025-26 के अंत तक चलन में मौजूद मुद्रा या नकदी 11.9 फीसदी बढ़कर 41.68 लाख करोड़ रुपये हो गई। यह वृद्धि कोविड-19 महामारी वाले वित्त वर्ष 2020-21 के बाद सबसे अधिक है। चलन में मुद्रा की मात्रा बढ़ने का मुख्य कारण नकद आधारित ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार और सतत एहतियाती मांग है।
आंकड़ों के आधार पर देखें तो वित्त वर्ष 2026 में चलन में रही मुद्रा 4.44 लाख करोड़ रुपये बढ़ी जो नोटबंदी के बाद वाले साल 2017-18 के बाद से सबसे अधिक है। वित्त वर्ष 2017-18 में चलन में रही मुद्रा में 4.94 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुई थी। इससे पहले नवंबर 2016 में नोटबंदी के दौरान 500 और 1,000 रुपये के नोटों को सरकार ने वापस लेकर चलन में मौजूद 86 फीसदी नकदी को अमान्य कर दिया था।
इसके बाद 2,000 रुपये का बैंक नोट जारी किया गया था, जिसे मई 2023 में वापस लेने का निर्णय लिया गया मगर यह अभी भी वैध मुद्रा बनी हुई है। ताजा आंकड़ों से पता चलता है कि 19 मई 2023 तक चलन में मौजूद 2,000 रुपये के नोटों में से 98.45 फीसदी भारतीय रिजर्व बैंक के पास वापस आ चुके हैं।
रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित नवीनतम आंकड़ों के अनुसार इस साल 15 मार्च तक लोगों के पास मौजूद नकदी बढ़कर 40.52 लाख करोड़ रुपये हो गई और वित्त वर्ष 2026 में यह 4.2 लाख करोड़ रुपये बढ़ी है। महामारी वाले वित्त वर्ष 2021 में इसमें 4.6 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि देखी गई थी।
डिजिटल लेनदेन में रिकॉर्ड वृद्धि के बावजूद चलन में रही मुद्रा बढ़ी है। भारतीय स्टेट बैंक के समूह मुख्य आर्थिक सलाहकार सौम्य कांति घोष ने कहा, ‘डिजिटल भुगतान भारत के लेनदेन के तरीके को बदल रहे हैं, न कि पैसों की बचत करने के तरीके को।’ घोष ने बिज़नेस स्टैंडर्ड को बताया, ‘यूपीआई लेनदेन में जबरदस्त उछाल के साथ-साथ चलन में रहने वाली मुद्रा में हो रही बढ़ोतरी, लोगों की एहतियाती मांग और अनौपचारिक क्षेत्र की गतिविधियों को दर्शाती है।’
वित्त वर्ष 2026 में मूल्य के हिसाब से यूपीआई लेनदेन 21 फीसदी बढ़कर 314.23 लाख करोड़ रुपये रहा जबकि लेनदेन की संख्या 30 फीसदी बढ़कर 241.616 अरब रही। घोष ने कहा, ‘लोगों के पास चलन में रही मुद्रा का करीब 97.6 फीसदी नकदी है।
वित्त वर्ष 2026 में यह 12 फीसदी बढ़कर 40.6 लाख करोड़ रुपये के सर्वकालिक उच्च स्तर पर पहुंच गई।’ साथ ही उन्होंने बताया कि सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में चलन में मुद्रा रही मुद्रा वित्त वर्ष 2026 में 12.1 फीसदी घट गई।
भारतीय स्टेट बैंक ने इस साल फरवरी में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कहा था कि जब चलन में रही मुद्रा 40 लाख करोड़ रुपये के आंकड़े पर पहुंच गई थी तब कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में एटीएम से नकद निकासी का चलन बढ़ा था।
कुछ राज्य सरकारों के कर विभागों ने छोटे व्यापारियों और विक्रेताओं को माल एवं सेवा कर नोटिस जारी किए हैं क्योंकि 2022 से 2025 के बीच उनके यूपीआई लेनदेन 40 लाख रुपये की पंजीकरण सीमा से ज्यादा हो गए थे। इस वजह से शायद यूपीआई लेनदेन के प्रति लोगों का उत्साह कम हुआ हो।
कुछ तिमाही पहले शुरू हुई ग्रामीण अर्थव्यवस्था में सुधार ने भी नकदी की मांग को बढ़ावा दिया। आईडीएफसी फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री गौरा सेन गुप्ता ने कहा, ‘चलन वाली मुद्रा में वृद्धि लगातार दो वर्षों तक सामान्य मॉनसून द्वारा समर्थित ग्रामीण सुधार से प्रेरित है।’
उन्होंने कहा, ‘ग्रामीण अर्थव्यवस्था में नकद का चलन ज्यादा होता है। मुद्रा के चलन में इजाफा ऐसे समय में हुआ है जब यूपीआई लेनदेन लगातार बढ़ रहे हैं।’ दिसंबर 2025 में नाबार्ड द्वारा किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि पिछले एक वर्ष के दौरान ग्रामीण मांग में व्यापक स्तर पर सुधार हुआ है, आय में वृद्धि हुई है और परिवारों की खुशहाली में भी सुधार आया है।
आरबीआई ने हालिया रिपोर्ट में उल्लेख किया कि शहरी और ग्रामीण दोनों बाजारों में मांग बढ़ी है। आयकर और जीएसटी दरों में कटौती, खरीफ की फसल से नकदी प्रवाह और शादी के मौसम के कारण नकदी की मांग बढ़ी है।