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वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का वादा: विदेशी निवेश आकर्षित करने के लिए उठाए जाएंगे और कदम

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हीरो माइंडमाइन समिट 2026 को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ज्यादा विदेशी पूंजी की जरूरत को समझती है और इस दिशा में आरबीआई के साथ मिलकर काम कर रही है

Last Updated- June 15, 2026 | 10:55 PM IST
Union Finance Minister Nirmala Sitharaman
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आज कहा कि विदेशी पूंजी आकर्षित करने के लिए और कदम उठाए जाएंगे। उन्होंने संकेत दिया कि बॉन्ड बाजार के लिए हाल ही में घोषित उपाय निवेश लाने की बड़ी पहल की शुरुआत भर है। हीरो माइंडमाइन समिट 2026 को संबोधित करते हुए वित्त मंत्री ने कहा कि सरकार ज्यादा विदेशी पूंजी की जरूरत को समझती है और इस दिशा में भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के साथ मिलकर काम कर रही है।

सीतारमण ने कहा कि सरकार ने बॉन्ड को ज्यादा आकर्षक बनाने के लिए कदम उठाए हैं। उन्होंने 5 जून को हुई उस घोषणा का जिक्र किया जिसमें सरकारी बॉन्डों में विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (एफपीआई) की भागीदारी को आसान बनाने और सरकारी ऋण प्रतिभूतियों में एफपीआई के निवेश से होने वाली ब्याज आय और पूंजीगत लाभ पर कर छूट देने की बात कही गई थी। सरकार ने अंतरराष्ट्रीय निपटान बैंक (बीआईएस) को भी इसी तरह की कर राहत दी है।

वित्त मंत्री ने कहा, ‘निश्चित तौर पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती। हम और भी उपाय करेंगे।’ सीतारमण ने कहा कि आरबीआई ने एक ऐसा ढांचा बनाया है जिसके तहत सरकारी क्षेत्र की कंपनियां और बैंक विदेश से पूंजी जुटा सकते हैं और मुद्रा हेजिंग का जोखिम आरबीआई उठाएगा। विदेशी निवेश को आकर्षित करने के लिए और कदम उठाने का वादा ऐसे समय में किया गया है जब पश्चिम एशिया संकट के कारण जिंसों के दाम से पैदा हुए झटके ने भारत की आर्थिक मजबूती की परीक्षा ली है। मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन के शब्दों में ‘यह भुगतान संतुलन का वास्तविक दबाव परीक्षण साबित हुआ है’।

28 फरवरी को युद्ध शुरू होने के बाद से उर्वरक सब्सिडी का खर्च बढ़ गया है, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित खुदरा मुद्रास्फीति मार्च के 3.4 फीसदी से बढ़कर मई में 3.93 फीसदी हो गई है और डॉलर के मुकाबले रुपये में 3.94 फीसदी की गिरावट आई है। पश्चिम एशिया में युद्ध खत्म होने की उम्मीद के बीच डॉलर के मुकाबले रुपया 94.72 पर बंद हुआ।

कच्चे तेल में तेजी की वजह से सरकार को पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क कम करनी पड़ी ताकि तेल कंपनियों पर बोझ कम हो सके। सोने पर आयात शुल्क में भी इजाफा किया गया। वित्त मंत्रालय ने मई की अपनी मासिक आर्थिक समीक्षा में कहा था कि वित्त वर्ष 2027 में आगे बढ़ने के लिए मौद्रिक, राजकोषीय और संरचनात्मक मोर्चों पर कुशलता और लचीलेपन की जरूरत होगी।

बैंक ऑफ बड़ौदा के मुख्य अर्थशास्त्री मदन सबनवीस ने कहा कि सरकार और आरबीआई पहले ही पूंजीगत खाते के मोर्चे पर कदम उठा चुके हैं इसलिए प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) को तेजी से बढ़ाने के लिए और उपायों की गुंजाइश कम है। उन्होंने कहा कि ऐसा इसलिए है क्योंकि मुनाफा या निवेश की रकम को वापस ले जाने की रफ्तार भी ज्यादा है और भारतीय कंपनियां तेजी से विदेश में निवेश कर रही हैं।

सबनवीस ने कहा, ‘अब हम बाह्य वाणिज्यिक उधारी (ईसीबी) पर नजर रखने, राज्य स्तर पर कारोबार को सुगम बनाने और दिवाला समाधान से जुड़े सुधारों को आगे बढ़ाने पर ध्यान दे सकते हैं।’

सीतारमण ने कहा कि दुनिया भर के व्यवसायों की तरह भारत भी ऐसी वजहों से अनिश्चितता का सामना कर रहा है जो उसके नियंत्रण से बाहर है। इनमें शुल्क, जिसों की कीमतों में उतार-चढ़ाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान शामिल हैं। उन्होंने कहा कि भले ही भारत के बड़े घरेलू बाजार ने एक सुरक्षा कवच प्रदान किया लेकिन देश कई अहम कच्चे माल के आयात पर निर्भर बना रहा, जिससे यह बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशील रहा।

सीतारमण के अनुसार कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, बीमा की बढ़ी लागत और शिपिंग से जुड़े जोखिम उन वजहों में शामिल थे, जिनका असर भारत के आयात बिल और विदेशी मुद्रा की जरूरतों पर पड़ा।

अल-नीनो की वजह से पैदा हुई चिंता के बीच उन्होंने मॉनसून को नीति-निर्माताओं के लिए सालाना चुनौती बताई। उन्होंने कहा कि खाद्य पदार्थों की कमी को रोकने के लिए पर्याप्त बफर स्टॉक मौजूद है लेकिन अगर बारिश कम हुई तो किसानों की आय पर दबाव पड़ सकता है।

उर्वरक बाजार में उतार-चढ़ाव का उल्लेख करते हुए सीतारमण ने कहा कि आम बजट पेश किए जाने के बाद से वैश्विक आपूर्ति की स्थिति कई बार बदली है। कुछ पारंपरिक आपूर्तिकर्ताओं द्वारा अपने देश में स्टॉक बढ़ाने के लिए निर्यात घटाने से आपूर्ति की कमी की चिंता पैदा हुई मगर लगभग एक साल बाद निर्यात बाजार में चीन की वापसी ने उन चिंताओं को कुछ हद तक कम कर दिया है।

उन्होंने कहा, “आपूर्ति की कमी की जो चिंता थी उसे दूर कर लिया गया है। एक हफ्ते आपके सामने कोई चुनौती होती है, अगले हफ्ते उस चुनौती का समाधान हो जाता है। लेकिन फिर कोई नई चुनौती सामने आ जाती है। इसलिए ऐसी हर स्थिति के लिए तैयार रहना जरूरी है।’

सीतारमण ने कहा कि भारत में डेटा सेंटर और ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर (जीसीसी) में निवेश तेजी से बढ़ रहा है और राज्य सरकारों में ऐसी परियोजनाएं आकर्षित करने के लिए होड़ है। उन्होंने कहा, ‘हम डेटा सेंटर और जीसीसी के लिए नीति बनाने को लेकर केवल केंद्र ही नहीं बल्कि राज्यों के साथ भी बातचीत कर रहे हैं।’ उन्होंने कहा कि इन निवेश से आने वाले दशक में रोजगार पैदा होने और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।

वित्त मंत्री ने कहा कि इस क्षेत्र का विकास अब बेंगलूरु, हैदराबाद और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र जैसे पारंपरिक टेक्नॉलजी केंद्रों तक ही सीमित नहीं है बल्कि छोटे शहर भी निवेश के लिए पसंदीदा जगह बनकर उभर रहे हैं। सीतारमण ने कहा कि राज्यों ने न सिर्फ नीतियां बनाई हैं बल्कि जीसीसी और डेटा सेंटर परियोजनाओं को आकर्षित करने के लिए निवेशकों के साथ सक्रिय रूप से जुड़ भी रहे हैं।

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First Published - June 15, 2026 | 10:52 PM IST

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