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ऊर्जा संकट ने खोली सरकार की आंख, अब ‘समुद्र मंथन’ के जरिए गहरे पानी में तेल व गैस खोजेगा भारत

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ईंधन आयात पर निर्भरता कम करने के लिए सरकार 'समुद्र मंथन' कार्यक्रम के तहत गहरे समुद्री क्षेत्रों में तेल और गैस की खोज के लिए भूकंपीय डेटा जुटाने पर जोर दे रही है

Last Updated- May 03, 2026 | 10:16 PM IST
crude oil
प्रतीकात्मक तस्वीर | फाइल फोटो

पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष से पता चल गया है कि भारत ईंधन के आयात पर कितना अ​धिक निर्भर है। इसे ध्यान में रखते हुए सरकार ने घरेलू ऊर्जा अन्वेषण प्रयासों को तेज करने की योजना बनाई है। इसके तहत विशेष रूप से गहरे और अति गहरे समुद्री क्षेत्रों में भूकंपीय डेटा एकत्र करने पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इस मामले से अवगत दो लोगों ने यह जानकारी दी।

सरकार समुद्र मंथन कार्यक्रम के तहत भूकंपीय डेटा हासिल करने के लिए धन उपलब्ध कराएगी। इस प्रक्रिया का नेतृत्व उत्खनन नियामक हाइड्रोकार्बन महानिदेशालय (डीजीएच) करेगा। मगर फिलहाल यह खुलासा नहीं किया गया है कि इस मद में कितनी रकम खर्च करने की योजना है। 

एक सूत्र ने बताया, ‘डेटा जुटाने के लिए कुओं की खुदाई पर भारी खर्च होगा और इसके लिए केंद्र सरकार के समर्थन की आवश्यकता है। फिलहाल यह निर्णय लिया जाना बाकी है कि सरकार इस काम के लिए पूरी रकम उपलब्ध कराएगी अथवा आंशिक तौर पर वित्त पोषण  करेगी।’

सरकार का लक्ष्य इन अनछुए अपतटीय क्षेत्रों में डेटा संग्रह को प्राथमिकता देकर भारत के अन्वेषण क्षेत्र में विदेशी निवेश को आकर्षित करना है। यह वैश्विक कंपनियों द्वारा भारत के ब्लॉकों के लिए पर्याप्त डेटा के अभाव के बारे में बार-बार जताई गई चिंताओं को दूर करने का भी एक प्रयास है।

इस मामले से अवगत एक अन्य सूत्र ने कहा, ‘तेल एवं गैस अन्वेषण में पर्याप्त डेटा हासिल करना उस दिशा में उठाया गया पहला कदम है। इनमें से कई ब्लॉक पहले नो-गो क्षेत्र के रूप में नामित थे जिसके कारण डेटा की उपलब्धता काफी सीमित थी। मगर अब इस कमी को दूर किया जा रहा है।’

नो-गो क्षेत्र से तात्पर्य भारत के उन तलहटी ब्लॉकों से है जिन पर रक्षा, अंतरिक्ष, पर्यावरण और रणनीतिक एजेंसियों की चिंताओं के कारण दशकों से तेल एवं गैस अन्वेषण का काम प्रतिबंधित था। मगर अब सरकार ने लगभग 10 लाख वर्ग किलोमीटर के ऐसे अपतटीय क्षेत्रों को अन्वेषण के लिए खोल दिया है जो नीतिगत बदलाव का एक महत्त्वपूर्ण संकेत है।

पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय और डीजीएच ने इस संबंध में जानकारी के लिए भेजे गए सवालों पर खबर लिखे जाने तक कोई जवाब नहीं दिया।

पश्चिम एशिया संकट के कारण भारत की ऊर्जा आपूर्ति में बाधा आई है। इससे कच्चे तेल और पेट्रोलियम उत्पादों के आयात पर देश की उच्च भारी निर्भरता पर चर्चा तेज हो गई है। ऊर्जा की बढ़ती मांग और घरेलू उत्पादन में ठहराव के कारण आयात पर भारत की निर्भरता लगातार बढ़ रही है।

आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, साल 2025-26 में भारत के कच्चे तेल के उत्पादन में लगातार ग्यारहवें वर्ष गिरावट दर्ज की गई जबकि प्राकृतिक गैस का उत्पादन लगातार दूसरे वर्ष घटा। इसका मुख्य कारण तेल क्षेत्रों में प्राकृतिक गिरावट और नई बड़ी खोजों का अभाव रहा। वित्त वर्ष 2026 में कच्चे तेल के लिए भारत की आयात पर निर्भरता 89 फीसदी और प्राकृतिक गैस के लिए आयात पर निर्भरता 51 फीसदी थी।

घरेलू उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने हाल में ओपन एक्रेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (ओएएलपी 11) का ग्यारहवां दौर शुरू किया है। इसमें 80,228 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले 21 तेल एवं गैस अन्वेषण ब्लॉकों की पेशकश की गई है। इस बीच, ओएएलपी-10 दौर का पूरा होना अभी बाकी है। इस दौर में 1.82 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को कवर करने वाले 25 ब्लॉक पेश किए गए थे। यह दौर अब तक का भारत का सबसे बड़ा अपतटीय बोली दौर है जिसमें 12 ब्लॉक अति-गहरे समुद्र में और एक गहरे समुद्र में है।

सरकार ने एक प्रेस विज्ञप्ति में कहा है कि 46,313 टन एलपीजी ले आ रहा मार्शल आइलैंड्स के ध्वज वाला एलपीजी वाहक पोत एमटी सर्वशक्ति 2 मई को होर्मुज स्ट्रेट को सुरक्षित रूप से पार कर चुका है और उसके13 मई को विशाखापत्तनम पहुंचने की उम्मीद है।

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First Published - May 3, 2026 | 10:15 PM IST

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