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‘लाइसेंस राज’ खत्म करने की तैयारी, सरकार लाएगी अगली पीढ़ी के बड़े सुधार : राजीव गौबा

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अनुपालन बोझ घटाने, निरीक्षण व्यवस्था बदलने और कारोबार आसान बनाने पर सरकार का बड़ा फोकस

Last Updated- May 13, 2026 | 9:19 AM IST
Rajiv Gauba
राजीव गौबा, सदस्य, नीति आयोग (फाइल फोटो)

नीति आयोग के सदस्य राजीव गौबा ने कहा कि ‘1991 के सुधारों ने औद्योगिक लाइसेंसिंग को तो खत्म कर दिया लेकिन ‘लाइसेंस राज’ को नहीं’। गौबा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पिछले साल स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले की प्राचीर से किए गए वादे के अनुसार लाइसेंसिंग के नए ‘अवतारों’ को खत्म करने और अगली पीढ़ी के सुधारों को लाने के लिए कई सरकारी समितियों का नेतृत्व कर रहे हैं।

गौबा ने कहा कि आज किसी भी कारोबार के लिए जरूरी हर अनावश्यक परमिट ‘लाइसेंस राज’ का ही एक रूप है। उन्होंने कहा कि सरकार अब ‘जब तक मना न हो तब तक अनुमति है’ के सिद्धांत पर आगे बढ़ेगी।

गौबा ने भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के वार्षिक व्यापार सम्मेलन में आज कहा, ‘नियामक परिवर्तनों को बेतरतीब रूप में पेश नहीं किया जाना चाहिए बल्कि आपातकालीन परिवर्तन के ठोस कारणों को छोड़कर एक निश्चित वार्षिक कैलेंडर का पालन करना चाहिए। सभी मौजूदा और भविष्य के नियमों को नियामक प्रभाव आकलन और कार्यान्वयन लागत के आकलन के तहत लाया जाना चाहिए।’

गौबा ने कहा कि ये उन शुरुआती सिद्धांतों या ‘जन विश्वास सिद्धांतों’ में से हैं जिनके आधार पर अगली पीढ़ी के सुधारों पर बनी सरकारी समितियां काम कर रही हैं। इसका मकसद व्यवस्था को उसके नियामकीय हस्तक्षेप से मुक्त करना है। उन्होंने कहा कि किसी भी रूप में लाइसेंसिंग की जरूरत केवल राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए या उन गतिविधियों के लिए होनी चाहिए जिनसे मनुष्यों की सेहत या पर्यावरण को गंभीर खतरा हो। साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि स्वचालित स्वत: पंजीकरण सामान्य नियम होना चाहिए।

गौबा ने कहा कि जो लाइसेंस जरूरी हैं, उनकी वैधता स्थायी या लंबी अवधि की होनी चाहिए। उन्हें बार-बार नवीनीकृत कराने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। सरकार अपने सुधार एजेंडे में जो बड़ा बदलाव लाने पर विचार कर रही है, वह है निरीक्षण से सरकार के दखल को हटाना। गौबा ने कहा कि निरीक्षण जोखिम-आधारित होने चाहिए और सामान्य तौर पर यह केवल तीसरे पक्ष की संस्थाओं द्वारा किया जाना चाहिए।
गैर-वित्तीय क्षेत्र में सुधार पर गठित गौबा की अध्यक्षता वाली समिति ने नवंबर में 200 से अधिक गुणवत्ता नियंत्रण आदेशों के निलंबन या स्थगन की सिफारिश की थी। समिति का तर्क था कि यह अनुपालन लागत को बढ़ाता है।

गौबा ने उद्योग से आग्रह किया कि वे भारत के लिए उभर रहे नए अवसर को न गंवाएं। सरकार ने 42,000 से अधिक अनुपालनों को समाप्त कर दिया है और 3,700 प्रावधानों को अपराधमुक्त कर दिया है।

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First Published - May 13, 2026 | 9:19 AM IST

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